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    हिंसा भी एक बीमारी है

    News DeskBy News DeskJuly 25, 2025No Comments5 Mins Read
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    हिंसा भी एक बीमारी है

    हिंसा- ईर्ष्या एक भयंकर संक्रामक रोग हैं। मानवीय दीनता, ईर्ष्या, संदेह, पद के अभिमान ,लोभ-लालसा से ही हिंसा-फसाद उत्पन्न और विकसित होती है। हिंसा मनुष्य को पतन की उस हद तक पहुँचा देती है जिसकी कोई सीमा नहीं है। ईर्ष्या और हिंसा लगभग एक ही भावनाएँ हैं, लेकिन हिंसा ईर्ष्या की चरम अभिव्यक्ति है। इस स्तर तक पहुँच कर लोग हत्या की षड़यंत्र करने में भी संकोच नहीं करते।

     

    यह सिद्ध हो चुका है कि हिंसा एक खतरनाक जज्बात है। यह आपका मन बदल सकती है, दूसरों के साथ आपके रिश्ते बिगाड़ सकती है, आपके परिवार को तबाह कर सकती है और यहाँ तक कि आपको एक हत्यारा भी बना सकती है। फिर भी, हिंसा एक बहुत पुरानी,प्राकृतिक और स्वाभाविक मानवीय संवेग है। असल में, हर कोई अपने जीवन में किसी न किसी मोड़ पर हिंसा का वोध करता है। लेकिन अनियंत्रित हिंसा-विद्वेष समाज का सबसे बड़ा शत्रु है, जो लोगों को अत्यधिक नुकसान पहुँचा सकता है और उनके अपने एवं दूसरों के सुनहरे परिवारों को पल भर में नष्ट कर सकता है। मूलतः, हिंसा मानवीय मूल्यों की हत्यारे है।

     

    वर्तमान समाज में बढ़ रही हिंसा-हत्या मानव समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। हिंसा और घृणा एक भयानक संक्रामक विकार है। हिंसा का प्रभाव सर्वत्र है। एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर के विरुद्ध, एक अधिकारी दूसरे अधिकारी के विरुद्ध, एक लेखक दूसरे लेखक के विरुद्ध, विपक्ष सत्ताधारी दल के विरुद्ध, सत्ताधारी दल विपक्ष के विरुद्ध, एक समाज दूसरे समाज के विरुद्ध, एक धर्म दूसरे धर्म के विरुद्ध, एक जाति दूसरी जाति के विरुद्ध, बहन बहन के विरुद्ध, भाई भाई के विरुद्ध , कौन किससे घृणा नहीं करता ? हमारे समाज में से कई लोग इस ज़हरीली भावना के शिकार होकर मौत प्राप्त कर चूके है । लेकिन यही मानव जाति हिंसा और नफ़रत के माहौल को काबू पाने में भी कई हद तक कामयाब हो चूके है । इसीलिए तो मानव सभ्यता आज इस मुकाम तक पहुँच पाई है।

     

    हालाँकि, दुनिया भर में हिंसा और हत्या की बढ़ती मात्रा अब मानव समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन चूका है। असम राज्य भी इससे अछूता नहीं है। कुछ महीने पहले, एक बहू ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर अपने पति और सास की हत्या कर दी, उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उन्हें जंगल में फेंक दिया । फिर पुलिस स्टेशन जाकर उनके गुम होने का रिपोर्ट दे दिया । एक काटिल की इतनी साहस देखकर लोग तो अचंभित रह गए । सवाल यह बनता है कि एक महिला किस मानसिक स्तर तक पहुँचकर ऐसा कर सकती है ? हाल ही में रहस्यपूर्ण तरीके से पुलिस अधिकारी जोनमणि राभा ने सोमवार आधी रात को एक दुर्घटना में अपनी जान गवाई। नगांव में उन्होंने ड्रग्स, जुआ, अवैध शराब, भू-माफिया, मवेशी तस्करी, कोयला आदि के तस्करों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था। कई लोगों ने उन्हें हिंदी फिल्म सिंघम की नकल में लेडी सिंघम भी कहने लगा था । क्या आज हमारे समाज में अपराधियों और असामाजिक गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई अपनाने के लिए किसी को कोई

     

     

    अधिकार नहीं है? क्या आज हमारे बीच मानवीय मूल्यों का पतन इसी तरह हुआ है? मेरे मन में ऐसे कई सवालों के हिल्लोल उठते हैं। आजकल हम लोग अन्याय के खिलाफ लड़ने से डरते हैं। कौन जाने कब किसकी साजिश का शिकार हो जाए? पुलिस अधिकारी जोनमणि राभा की मौत असामान्य है, इसके कई कारण हैं। मिडिया के दौरान चल रहे बातचीत से कुछ हद तक यह स्वीकार किया जा चूका हैं कि पुलिस अधिकारी जोनमणि राभा की मौत साधारण नहीं है। इसके कई कारण हैं ।मैं भी निश्चित रूप से कह सकती हूँ कि यह हिंसा और हत्या की एक चरम योजना है।

     

    संयुक्त राष्ट्र संघ के अंतर्गत आने वाले संगठन ग्लोबल पल्स इनिशिएटिव ने कोविड-19 महामारी के बाद दुनिया भर में हिंसा-हत्या की मात्रा में वृद्धि के आंकड़ों का क्षेत्रीय अध्ययन किया । उनके अध्ययन में यह पाया गया कि दुनिया में लगभग 15 करोड़ लोगों को कोविड के बाद सबसे खराब आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ा। फिर ये लोग अपनी जीविका चलाने के लिए विभिन्न असामाजिक कार्य अपनाने के लिए मजबूर हो गए । इससे समाज में हिंसक कार्यकलाप में वृद्धि हुई । दुनिया के अधिकांश देशों की सरकारों ने कोविड-19 संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन जैसे सख्त अनुशासन लागू किए और लोगों को घरों के अंदर रहने के लिए मजबूर कर दिया । अपनो के बीच युद्ध जैसी माहोल बन गया और लोग महीनों तक घरों में नजरबंद रहे। परिणामस्वरूप, लोग मानसिक रूप से टूट गए और उनके मन में कई नकारात्मक विचार वास करने लगा । संयुक्त राष्ट्र संघ इस मुद्दे पर एक जगह लिखता है “वैश्विक स्वास्थ्य संकट के कारण उत्पन्न आश्रय-स्थान आदेश के कारण लोगों का सामाजिक नियंत्रण भी लोगों के देखे गए आपराधिक कदाचार को प्रभावित करता है।” यही स्थिति हिंसा घृणा बढ़ने का एक प्रमुख कारण के रूप में हम मान सकते है ।

     

    जो भी हो , हिंसा घृणा मानव सभ्यता के हत्यारे हैं। क्या हम इस जज्बात पर काबू नहीं पा सकते? मुझे लगता है कि लोगों के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। बस एक सच्चे और एकजुट प्रयास की ज़रूरत है। अगर हम बस इतनी सी विनाशकारी भावना पर काबू नहीं पा सके, तो यह एक दिन हमें तबाह कर देगी , यह तो तय है ।

     

     

    मनीषा शर्मा
    पता : जालूकबारी , गुवाहाटी
    अनुवादक :रितेश शर्मा

    हिंसा भी एक बीमारी है
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