दिवास्वप्न संवाद पुस्तक चर्चा में देशभर के शिक्षाविदों ने शिक्षा में मानवीय संवेदनाओं और धरातलीय अनुभवों के महत्व पर विचार साझा किए।
राष्ट्र संवाद संवाददाता
बाँदा। शैक्षिक संवाद मंच द्वारा आयोजित पुस्तक संवाद-18 में गिजुभाई की कालजयी कृति ‘दिवास्वप्न’ पर आधारित प्रमोद दीक्षित मलय संपादित पुस्तक ‘दिवास्वप्न संवाद’ पर ऑनलाइन विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े शिक्षाविदों और शिक्षकों ने भाग लिया मुख्य अतिथि शिक्षाविद् महेश चंद्र पुनेठा ने कहा कि शिक्षा जगत में विश्वसनीयता के संकट से उबरने का एकमात्र उपाय धरातलीय अनुभवों को साझा करना है। उन्होंने पत्र शैली को अनुभवों की पारदर्शी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बताया।
विशिष्ट अतिथि कथाकार दिनेश कर्नाटक ने कहा कि शिक्षा सुधार से पहले समाज का मानवीकरण जरूरी है। उन्होंने पुस्तक को दुहरी शिक्षा व्यवस्था के बीच नई राह दिखाने वाली कृति बताया। अरुण ज्योति बोरा ने इसे शिक्षकों का सामूहिक स्वर कहा, जिसमें सफलताओं के साथ असफलताओं से उपजे अनुभव भी शामिल हैं।
डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया ने शिक्षकों में अध्ययन की प्रवृत्ति घटने पर चिंता जताई, वहीं राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षक ईश्वरी सिंहा ने विद्यालयों को बच्चों के अनुकूल बनाने की जरूरत पर बल दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पुस्तक के संपादक प्रमोद दीक्षित मलय ने की। संचालन दुर्गेश्वर राय ने किया तथा अंत में विनीत कुमार मिश्रा ने आभार जताया। कार्यक्रम में 28 लेखकों सहित बड़ी संख्या में श्रोता जुड़े। यह संवाद शिक्षा में नई ऊर्जा और संवेदनशील दृष्टि के संकल्प के साथ संपन्न हुआ।

