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    Home » ज़मीर की नीलामी: समाज किस दिशा में?
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    ज़मीर की नीलामी: समाज किस दिशा में?

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 1, 2026No Comments2 Mins Read
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    ज़मीर की नीलामी
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    ज़मीर की नीलामी आज हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी बनती जा रही है। सच और नैतिकता की कसौटी पर खड़े इस दौर में सवाल उठता है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं।

    राष्ट्र संवाद
    मुंबई (इंद्र यादव) आज का दौर वह है जहाँ ‘सच’ क्या है, यह इस बात से तय होता है कि बोलने वाले के पास कितनी ताकत है। “नंगा राजा” अब छिपने की कोशिश भी नहीं करता, क्योंकि उसे पता है कि सवाल पूछने वाली जुबानें या तो चुप हैं या डरी हुई हैं। मासूमियत पर नफरत का साया !

    सबसे डरावनी बात यह है कि अब नफरत बच्चों के बस्तों तक पहुँच गई है। जो बच्चे कल तक साथ खेलते थे, अब हमदर्दी दिखाने से पहले एक-दूसरे का ‘मजहब’ पूछते हैं। अगर शिक्षा में ही जहर होगा, तो भविष्य में नागरिक नहीं, सिर्फ भीड़ पैदा होगी। टीवी और अखबार: सच का दम घुट रहा है!

    मीडिया, जिसे लोकतंत्र का रक्षक होना था, अब शोर मचाने वाली ऐसी दुकान बन गया है जहाँ सच को दफन कर दिया जाता है। जब न्यूज रूम से सिर्फ चीखें और झूठ निकलता है, तो आम इंसान समझ ही नहीं पाता कि सही क्या है और गलत क्या। राजनीति: सिर्फ कुर्सी का खेल!

    आज राजनीति सेवा का जरिया नहीं, बल्कि सौदेबाजी का बाजार है। यहाँ सिद्धांतों की जगह ‘बिकने’ का हुनर चलता है। चुनाव अब तरक्की के नाम पर नहीं, बल्कि लोगों को आपस में लड़ाकर जीते जा रहे हैं।न्याय की धुंधली तस्वीर !

    जब आम आदमी को लगने लगे कि कानून सबके लिए बराबर नहीं है, तो समझ लीजिए कि समाज बिखर रहा है। विकास के नाम पर जब कमजोर की सांसें छीनी जाने लगें, तो वह तरक्की नहीं बल्कि विनाश है।

    इस अंधेरे में वही इंसान असली नायक है जिसने सब कुछ खोकर भी अपना जमीर (ईमान) जिंदा रखा है। यह किसी एक के खिलाफ शिकायत नहीं, बल्कि हम सबके लिए एक चेतावनी है। अगर हम आज भी चुप रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें इस खामोशी के लिए कभी माफ नहीं करेंगी।

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