उलीडीह बस्ती में मांगे पोरोब के अंतिम दिन हरमागेया पर पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर : मांगे पोरोब के अंतिम दिन हरमागेया के अवसर पर उलीडीह बस्ती में हो समाज की पारंपरिक मान्यताओं के अनुरूप एक विशेष वैवाहिक अनुष्ठान संपन्न हुआ। रविवार को दोपहर से लेकर देर रात तक चले इस आयोजन में समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी रही और पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल बना रहा।
हो समाज की प्राचीन परंपरा के अनुसार जिन बच्चों के ऊपरी दांत पहले निकलते हैं, उसे अशुभ संकेत अथवा ग्रह-दोष माना जाता है। समाज की मान्यता है कि ऐसे बच्चों के जीवन में भविष्य में किसी प्रकार की विपत्ति या आकस्मिक दुर्घटना की आशंका रहती है। इस संभावित दोष के निवारण हेतु मांगे पोरोब के अंतिम दिन विशेष विधि-विधान से बच्चों का प्रतीकात्मक विवाह कुत्ते से कराया जाता है।

परंपरा के अनुसार यदि बेटी के ऊपरी दांत पहले आए हों तो उसका विवाह कुत्ते से तथा यदि बेटे के ऊपरी दांत पहले आए हों तो उसका विवाह मादा कुत्ते से कराया जाता है। समाज का विश्वास है कि इस अनुष्ठान के बाद बच्चों पर मंडरा रहा ग्रह-दोष समाप्त हो जाता है और उनका जीवन सुरक्षित एवं सुखमय होता है।
इस अवसर पर पारंपरिक नृत्य-गीत के साथ बारात निकाली गई। विवाह से पूर्व समधी मिलन एवं मंगनी की रस्में निभाई गईं। दूल्हा-दुल्हन (बच्चों) की पांव पूजा कर आशीर्वाद दिया गया। विवाह की मुख्य रस्म मारकोन्डो सामद के घर के समीप स्थित साढ़ वृक्ष के नीचे संपन्न हुई। समाज की मान्यता है कि वृक्ष के नीचे विवाह कराने से बच्चों का दोष वृक्ष ग्रहण कर लेता है और वे संकटों से मुक्त हो जाते हैं।

हो समाज महासभा पूर्वी सिंहभूम के जिला कोषाध्यक्ष दुर्गा चरण बारी ने बताया कि यह परंपरा पुरखों के समय से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। उन्होंने कहा कि यद्यपि आधुनिक समय में कुछ लोग इसे अंधविश्वास मानते हैं, किंतु समाज के लिए यह सांस्कृतिक आस्था और परंपरा का हिस्सा है। पूरे वर्ष में केवल हरमागेया के दिन ही यह अनुष्ठान आयोजित किया जाता है।
प्रतीकात्मक विवाह में शामिल बच्चों के नाम:
देविका सवैया
अभिषेक बोयपाई
रामराई बनारा
अवंतिका भूमिज
शंकर सिंह सरदार
अनीति सरदार
आयुष सोय
रानी
सूरज
इस वर्ष हरमागेया के अवसर पर लगभग 12 जोड़ों का प्रतीकात्मक विवाह संपन्न कराया गया। आयोजन में समाज के बुजुर्गों, महिलाओं एवं युवाओं ने मिलकर भाग लिया और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने का संकल्प दोहराया।
यह आयोजन हो समाज की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपरा और सामूहिक एकता का प्रतीक माना जा रहा है।

