स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन साधने की जरूरत
देवानंद सिंह
यह मामला सिर्फ़ अदालत की चारदीवारी में चल रही बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और न्यायिक व्यवस्था की परख का एक अहम पड़ाव बन गया है। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, गुलफ़िशा फ़ातिमा और अन्य अभियुक्तों की ज़मानत याचिका खारिज किया जाना, उसी लंबे सिलसिले की कड़ी है, जिसमें न्यायालय, पुलिस और राजनीति के दावों के बीच एक जटिल खींचतान नज़र आती है। यह पूरा विवाद नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध प्रदर्शनों से उपजा और फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए दंगों की भयावह हिंसा तक पहुंचा। अब यह सवाल न्यायपालिका के सामने है कि क्या अभियुक्तों के ख़िलाफ़ दर्ज आरोप और पुलिस की कहानी न्यायिक कसौटी पर ठहरती है, या यह मामला महज़ लंबे समय तक जेल में रखने और मुक़दमे को टालने का उदाहरण बनता जा रहा है।

भारतीय संविधान और आपराधिक न्यायशास्त्र में ज़मानत को मूल अधिकार की तरह देखा गया है। अदालतों ने बार-बार कहा है कि ज़मानत नियम है, जेल अपवाद। परंतु जब किसी पर यूएपीए जैसे कड़े आतंकवाद-रोधी कानून के तहत आरोप लगते हैं, तो स्थिति पलट जाती है। यूएपीए की धारा 43D(5) अदालत को यह शक्ति देती है कि यदि अभियुक्त के ख़िलाफ़ प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो ज़मानत देने से इनकार किया जा सकता है। यही वजह है कि अदालतें अक्सर अभियुक्तों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने में उलझी रहती हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में अभी कारणों की विस्तृत प्रति जारी नहीं की है, लेकिन यह साफ़ है कि अदालत ने पुलिस के उस तर्क को महत्व दिया है कि यह हिंसा महज़ किसी स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया का हिस्सा नहीं थी, बल्कि एक बड़ी साज़िश थी। अदालत ने इस आरोप को पर्याप्त गंभीर माना और अभियुक्तों को ज़मानत देने से इनकार कर दिया। दिल्ली पुलिस का पक्ष शुरू से ही यह रहा है कि सीएए विरोध प्रदर्शनों की आड़ में कुछ छात्रों और कार्यकर्ताओं ने संगठित रूप से दंगे भड़काने की योजना बनाई। पुलिस का दावा है कि दिसंबर 2019 से फरवरी 2020 के बीच कई गुप्त बैठकें हुईं, जिनमें हथियार इकट्ठा करने, चक्का-जाम कराने, सीसीटीवी तोड़ने और प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाने की रणनीति बनी। गवाहों के बयानों, व्हाट्सऐप चैट्स और भाषणों को इसका सबूत बताया गया है।

वहीं बचाव पक्ष का तर्क है कि पुलिस ने सबूतों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। अभियुक्तों के वकीलों ने कहा कि महज़ व्हाट्सऐप ग्रुप में शामिल होना या किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेना अपराध नहीं हो सकता। उमर ख़ालिद के वकील ने तर्क दिया कि न तो उनके पास से कोई हथियार मिला, न ही उन्होंने हिंसा भड़काने वाले भाषण दिए। इसी तरह, शरजील इमाम के वकील ने कहा कि उनके भाषणों का मामला पहले से अदालत में है और उसमें उन्हें ज़मानत मिल चुकी है, तो फिर वही आरोप दोहराकर उन्हें अनिश्चितकालीन जेल में क्यों रखा जा रहा है। गुलफ़िशा फ़ातिमा और अन्य अभियुक्तों के वकीलों ने भी कहा कि गवाहों की विश्वसनीयता संदिग्ध है और अभियोजन की कहानी सिर्फ़ अटकलों पर आधारित है।

इस मामले की सबसे गंभीर विडंबना यह है कि अभियुक्तों को गिरफ़्तार हुए पांच साल से ज़्यादा हो गए हैं, लेकिन मुक़दमे की सुनवाई अब तक शुरू ही नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि यदि ट्रायल में अनुचित देरी हो रही हो तो अभियुक्त को ज़मानत दी जानी चाहिए। न्याय की मूल आत्मा भी यही कहती है कि किसी को बिना मुक़दमे के अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है। अभियुक्तों के वकीलों ने इसी आधार पर अदालत से गुहार लगाई थी। उनका कहना था कि जब देवांगना कलिता और नताशा नरवाल जैसे कुछ सह-अभियुक्तों को पहले ही ज़मानत मिल चुकी है, तो समानता के आधार पर बाक़ियों को भी राहत मिलनी चाहिए। लेकिन अदालत ने इन दलीलों को पर्याप्त नहीं माना।

यह मामला सिर्फ़ दिल्ली दंगों तक सीमित नहीं है। इसके मायने इससे कहीं ज़्यादा व्यापक हैं। यह भारतीय लोकतंत्र में नागरिक आंदोलनों, असहमति की आवाज़ों और राज्य की प्रतिक्रिया के बीच संतुलन की परख है। एक ओर राज्य सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा का दावा करता है, दूसरी ओर नागरिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी दांव पर लग जाती है। जब असहमति जताने वाले छात्र, कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी यूएपीए जैसे सख़्त कानूनों के तहत वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या असहमति को अपराध की तरह देखा जा रहा है। यह भी याद रखना होगा कि दिल्ली दंगे उस समय हुए, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत यात्रा पर थे। पुलिस ने इस तथ्य को भी अपने पक्ष में ज़ोर देकर रखा कि दंगों की टाइमिंग का मक़सद भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना था। हालांकि, बचाव पक्ष का कहना था कि यह महज़ एक संयोग था और पुलिस इस तर्क के ज़रिए साज़िश की थ्योरी को पुष्ट करना चाहती है।

यहां राजनीति की भूमिका भी नज़र आती है। सीएए विरोध आंदोलन अपने आप में देशव्यापी था और इसे लेकर सरकार और विरोधियों के बीच तीखा टकराव था। ऐसे में आंदोलनकारियों पर साज़िशकर्ता होने का ठप्पा लगाना केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी बन जाता है। इस मामले का निपटारा जिस भी दिशा में जाएगा, उसके दूरगामी असर होंगे। यदि अभियोजन अपने आरोपों को साबित करने में सफल होता है, तो यह साबित होगा कि लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों की आड़ में संगठित हिंसा की साज़िश रची गई थी, लेकिन यदि ट्रायल के दौरान सबूत कमजोर पड़ते हैं, तो यह भारतीय न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। सबसे अहम प्रश्न यह है कि क्या अभियुक्तों को मुक़दमे से पहले ही इतनी लंबी कैद में रखना न्यायसंगत है? न्यायपालिका के लिए यह अवसर है कि वह एक बार फिर यह स्पष्ट करे कि स्वतंत्रता और सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे साधा जाए।
कुल मिलाकर, दिल्ली हाई कोर्ट का यह आदेश फिलहाल अभियुक्तों के लिए झटका है और पुलिस की कहानी को ताक़त देता है, लेकिन यह मामला अभी लंबी राह पर है। जब तक मुक़दमा शुरू नहीं होता और गवाहों की गवाही अदालत में परखी नहीं जाती, तब तक पुलिस के दावों और बचाव पक्ष की दलीलों के बीच सच्चाई अधर में ही रहेगी। भारतीय लोकतंत्र की आत्मा यही कहती है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। यदि, असहमति जताने वाले नागरिक वर्षों तक बिना मुक़दमे के जेल में सड़ते रहें, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमज़ोर करता है। अदालतों और राज्य को इस संतुलन को साधने की ज़िम्मेदारी और भी अधिक सावधानी से उठानी होगी।

