देवानंद सिंह
भारत के विधायी इतिहास में वक़्फ़ संपत्तियों को लेकर उठे विवाद लंबे समय से न्यायिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। इसी साल 2025 में संसद द्वारा पारित किए गए वक़्फ़ संशोधन क़ानून ने एक बार फिर इस विषय को देश के संवैधानिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। सुप्रीम कोर्ट में तीन दिन तक चली गहन सुनवाई के बाद 22 मई को कोर्ट ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। यह मामला केवल क़ानूनी संशोधनों की वैधता का नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता, संपत्ति अधिकार और संवैधानिक नैतिकता का भी है।
वक़्फ़ संपत्तियां उन संपत्तियों को कहा जाता है, जो मुस्लिम समुदाय की धार्मिक, परोपकारी और सामाजिक गतिविधियों के लिए समर्पित की जाती हैं। लंबे समय से इस व्यवस्था की पारदर्शिता, लेखा-जोखा और प्रशासनिक संरचना को लेकर शिकायतें रही हैं। इन्हीं समस्याओं को सुलझाने के नाम पर केंद्र सरकार ने वक़्फ़ अधिनियम में व्यापक संशोधन किए हैं। नए क़ानून में ‘वक़्फ़ बाय यूज़र’ की व्यवस्था को समाप्त किया गया, जिसके अंतर्गत वे संपत्तियां भी वक़्फ़ मानी जाती थीं, जिन्हें अनौपचारिक रूप से मुस्लिम समुदाय द्वारा दशकों से उपयोग में लाया जा रहा हो। अब इन संपत्तियों को वैध वक़्फ़ घोषित कराने के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया है, और यदि छह महीने में रजिस्ट्रेशन नहीं होता तो उन पर कोई क़ानूनी दावा नहीं किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त, वक़्फ़ काउंसिल व बोर्ड में ग़ैर-मुसलमानों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है, जिससे संबंधित पक्षों की धार्मिक स्वतंत्रता पर अतिक्रमण की आशंका जताई गई है।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और राजीव धवन जैसे वकीलों ने संशोधन की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि वक़्फ़ संपत्तियों पर किए गए प्रावधान केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन भी हैं। अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक संस्थाएं संचालित करने का जो अधिकार प्राप्त है, यह संशोधन उन पर प्रत्यक्ष हमला करता है, याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ‘वक़्फ़ बाय यूज़र’ का हटाया जाना उन समुदायों को सीधे नुकसान पहुंचाता है, जो वर्षों से किसी संपत्ति का धार्मिक उपयोग करते आए हैं, पर उनके पास रजिस्ट्रेशन से जुड़ा दस्तावेज़ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में यह भी तर्क दिया गया है कि अब तक अधिकांश राज्यों ने वक़्फ़ संपत्तियों का सर्वेक्षण ही नहीं कराया, तो ऐसे में अनौपचारिक उपयोगकर्ता कैसे वैधता सिद्ध करेंगे?
सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, रणजीत कुमार और राकेश द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट में इन संशोधनों का मजबूती से बचाव किया। उनका तर्क था कि वक़्फ़ संपत्तियों के संचालन में व्यापक अनियमिताएं और विवाद हैं। उदाहरण स्वरूप, कुछ संपत्तियों के असली मालिकों की पहचान स्पष्ट नहीं होती, जिसके चलते सरकारी रिकॉर्ड और धार्मिक दावों में टकराव उत्पन्न होता है। संशोधन इन्हीं विवादों को सुलझाने के प्रयास में लाया गया है। वक़्फ़ बोर्ड और काउंसिल में ग़ैर-मुसलमानों की नियुक्ति को लेकर उन्होंने तर्क दिया कि ये संस्थाएं पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष प्रकृति की हैं और इनका काम केवल संपत्ति प्रबंधन तक सीमित है, न कि धार्मिक गतिविधियों तक। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार अधिकतम दो ग़ैर-मुसलमान सदस्यों की नियुक्ति करेगी, लेकिन कोर्ट ने इस दावे पर सवाल उठाया क्योंकि यह सीमा क़ानून की भाषा में स्पष्ट नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी क़ानून पर अंतरिम रोक लगाने के लिए तीन कसौटियों की पूर्ति ज़रूरी है। प्रथम दृष्टया असंवैधानिकता, दोनों पक्षों को संभावित हानि का संतुलन, और अपूरणीय क्षति की संभावना। कपिल सिब्बल ने अपने तर्कों में दिखाया कि नए प्रावधानों से उत्पन्न नुकसान भविष्य में ठीक नहीं किए जा सकेंगे, विशेषकर जब संपत्तियों का धार्मिक स्वरूप ही समाप्त हो जाए।
वहीं, सरकार का रुख था कि संसद द्वारा पारित कोई भी क़ानून प्रारंभिक रूप से संवैधानिक माना जाता है और न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए। यह दृष्टिकोण भारत के संघीय ढांचे और विधायी प्रक्रिया का सम्मान करते हुए न्यायिक सक्रियता की सीमाओं की ओर संकेत करता है।
इस मुकदमे के ज़रिए एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या राज्य को धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में इतनी गहराई से हस्तक्षेप करना चाहिए? जब वक़्फ़ काउंसिल और बोर्ड में ग़ैर-मुसलमान नियुक्त किए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाता, बल्कि धर्म और राज्य के बीच परिभाषित सीमाओं को धुंधला कर देता है।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कोई भी अन्य धर्म—हिंदू, सिख, ईसाई—अपनी धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन में बाहरी लोगों की नियुक्ति को स्वीकार नहीं करता। ऐसे में, मुस्लिम संस्थाओं के साथ यह भिन्नता भेदभावपूर्ण प्रतीत होती है, और यह अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के उल्लंघन की ओर संकेत करती है।
ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला न केवल वक़्फ़ संशोधन की संवैधानिक वैधता पर मुहर लगाएगा या उसे खारिज करेगा, बल्कि यह भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे, अल्पसंख्यकों के अधिकार और राज्य की भूमिका की नई परिभाषा भी तय करेगा। यदि, संशोधनों को यथावत रखा जाता है, तो यह भविष्य में अन्य धार्मिक समुदायों के संस्थानों के लिए भी एक मिसाल बन सकता है।
वहीं, यदि कोर्ट इस क़ानून पर आंशिक या पूर्ण रूप से रोक लगाता है, तो यह विधायिका की शक्ति पर न्यायपालिका की निगरानी को पुनः स्पष्ट करेगा। यह संतुलन भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियादी पहचान है, जहां संसद विधायिका बनाती है, लेकिन न्यायपालिका उसे संविधान की कसौटी पर परखने का अधिकार रखती है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय जब भी आएगा, वह केवल एक क़ानून की वैधता पर टिप्पणी नहीं होगी, बल्कि भारत की संवैधानिक आत्मा की रक्षा या पुनर्परिभाषा के रूप में देखा जाएगा। यह फ़ैसला हमें यह भी सोचने पर मजबूर करेगा कि धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकार और राज्य की भूमिका, इन सबका संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाए, ताकि ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ केवल संविधान की किताबों तक सीमित न रह जाए, बल्कि उसकी आत्मा में भी जीवित रहे।

