शहर की जागती आँखों के पीछे कितनी थकी आँखें हैं
रात के हिस्से का सुकून भी शहर ने अपने नाम कर लिया
रात अब घड़ी में आती है, शहर में नहीं। घड़ी बारह बजने का ऐलान करती है, लेकिन शहर का दिन आगे बढ़ता रहता है। बाजार खुले हैं, स्क्रीन चमक रही हैं, वाहन दौड़ रहे हैं और मशीनें अगली पाली में जा चुकी हैं। कभी अँधेरा शरीर को विश्राम का संकेत देता था; अब रोशनी जागते रहने का आदेश देती है। चौबीस घंटे सक्रिय रहना हमने आधुनिकता का प्रमाण मान लिया, लेकिन इसकी कीमत मनुष्य की नींद चुका रही है। सूरज की जगह बिजली को समय का संकेतक बना लिया, पर शरीर की जैविक घड़ी को नहीं बदल सके। वह आज भी उजाले में जागती और अँधेरे में विश्राम माँगती है। शहर भले रात को पराजित माने, शरीर अब भी उसे अपनी जरूरत मानता है।
शहर की यह अनिद्रा किसी एक आविष्कार की देन नहीं। वैश्वीकरण ने अलग-अलग समय क्षेत्रों को जोड़ा, डिजिटल अर्थव्यवस्था ने काम को चौबीस घंटे उपलब्ध कर दिया और उपभोक्ता संस्कृति ने रात को भी बाजार बना दिया। कारखाने मांग के लिए चलते हैं; कॉल सेंटर दूसरे देशों की सुबह के लिए जागते हैं। अस्पताल, हवाई अड्डे, परिवहन और सुरक्षा सेवाएँ भी रात को नहीं थम सकतीं। समस्या इन सेवाओं में नहीं, उस मानसिकता में है जिसने शहर को कभी न थकने वाली मशीन मान लिया है। धीरे-धीरे नींद अधिकार नहीं, विलासिता बन रही है—जिसके पास साधन हैं, वह आराम करता है; बाकी अपनी नींद बेचकर व्यवस्था चलाते हैं।
इस निरंतर जागरण की पहली चोट मनुष्य की आंतरिक जैविक घड़ी पर पड़ती है। शरीर की यह घड़ी सूर्य के उदय और अस्त के साथ बनी थी, लेकिन कृत्रिम रोशनी, स्क्रीन और देर रात तक चलती गतिविधियों ने उसे भ्रमित कर दिया है। नींद की कमी का अर्थ केवल सुबह की थकान नहीं है। स्मृति कमजोर होती है, निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है, भावनात्मक संतुलन बिगड़ता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी घटती है। इससे एक दूसरा संकट पैदा होता है—भीड़ के बीच अकेलेपन का। रात का शहर बाहर से जितना जीवंत दिखाई देता है, भीतर से उतना ही खाली हो सकता है। रोशनी बढ़ती जाती है, आवाजें बढ़ती जाती हैं, लेकिन मनुष्य की आंतरिक शांति घटती जाती है।
फिर भी हम इस सामूहिक थकान को प्रगति और दक्षता कहते हैं। तर्क है कि दुनिया नहीं सोती, इसलिए हमें भी नहीं सोना चाहिए। लेकिन प्रकृति का कोई चक्र चौबीस घंटे सक्रिय नहीं रहता। दिन के बाद रात, जागरण के बाद नींद और श्रम के बाद विश्राम आता है। तकनीक के सहारे मनुष्य ने भ्रम पाल लिया कि वह प्रकृति के नियमों से स्वतंत्र है—समय को नियंत्रित किया जा सकता है, थकान को नकारा जा सकता है और शरीर की सीमाएँ अनंत तक खींची जा सकती हैं। शहर की अनिद्रा इसी अहंकार की अभिव्यक्ति है। प्रकृति से संघर्ष में मनुष्य जीतता दिख सकता है, लेकिन कीमत अंततः शरीर और मन को चुकानी पड़ती है।
इस व्यवस्था का सबसे भारी बोझ उन अदृश्य श्रमिकों पर पड़ता है जिनकी जागी हुई रात दूसरों की सुरक्षित नींद बनाती है। सुरक्षा गार्ड रात भर पहरा देता है, नर्स अस्पताल में जागती है, सफाई कर्मचारी शहर को सुबह के लिए तैयार करता है, ट्रक चालक माल पहुँचाता है और रेस्तरां कर्मचारी उस समय काम करता है जब बाकी लोग आराम कर रहे होते हैं। उनकी रात दूसरों के दिन को संभव बनाती है। फिर भी समाज उनकी थकान को सामान्य मानकर आगे बढ़ जाता है। इस तरह शहर की चमक एक गहरी असमानता पर टिकी है—कुछ लोगों के पास रात में सोने का अधिकार है, जबकि अनेक लोग अपनी नींद को मजदूरी में बदलकर शहर की चौबीस घंटे चलने वाली अर्थव्यवस्था को ईंधन देते हैं।
तकनीक ने अब इस अनिद्रा को सड़कों और कार्यस्थलों से उठाकर हमारे घरों और बिस्तरों तक पहुँचा दिया है। स्मार्टफोन, इंटरनेट, समाचार, संदेश और चौबीस घंटे उपलब्ध मनोरंजन ने रात को निजी जीवन की आखिरी सीमा से भी बाहर कर दिया है। आदमी बिस्तर पर लेटा है, लेकिन उसका मन लगातार किसी स्क्रीन पर दौड़ रहा है। नींद का समय विश्राम के बजाय एक और उत्पादक या मनोरंजक घंटे में बदल गया है। लगातार सूचना और शोर के बीच मनुष्य ने अपनी आंतरिक चुप्पी खो दी है। उसे सन्नाटा असहज लगने लगा है। यानी रात का शहर अब केवल बाहर नहीं जागता; वह हमारे भीतर भी जागता रहता है।
इस संकट से निकलने के कुछ प्रयास दिखाई देते हैं। कुछ शहर रात्रिकालीन शोर को नियंत्रित करने, अनावश्यक प्रकाश सीमित करने और काम के घंटों में संतुलन लाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन ये प्रयास तभी पर्याप्त होंगे जब हमारी सोच बदले। हमें स्वीकार करना होगा कि नींद आलस्य नहीं, जीवन की आधारशिला है; विश्राम उत्पादकता की रुकावट नहीं, उसकी शर्त है। चौबीस घंटे जागते रहना उपलब्धि नहीं, यदि उसके बदले मनुष्य अपना स्वास्थ्य, संतुलन और मानसिक शांति खो दे। असली प्रश्न यह नहीं कि शहर कितने घंटे खुला रह सकता है, बल्कि यह है कि वह अपने नागरिकों को कितने घंटे चैन से जीने और सोने देता है।
शहर चाहे जितना जाग ले, मनुष्य की नींद का विकल्प नहीं बना सकता। रोशनी जितनी फैलती जाएगी, अँधेरे और नींद की जरूरत उतनी गहरी होगी। इसे नकारते रहे तो एक दिन शहर की बत्तियाँ जलती रहेंगी, लेकिन उसके निवासी थके, बेचैन और भीतर से खोखले होंगे। सच्ची प्रगति रात को दिन में बदलना नहीं, मनुष्य की जैविक सीमाओं का सम्मान करना है। नींद की हार केवल नींद की हार नहीं; विश्राम को अनावश्यक मानना अपने ही शरीर की प्राकृतिक लय से विद्रोह है। जागती दुनिया तभी सार्थक है, जब उसमें मनुष्य के सोने की जगह भी बची रहे।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद्
बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com

