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    Home » शिक्षक ज्ञानवान ही नहीं, चरित्रवान पीढ़ी का निर्माण करें
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    शिक्षक ज्ञानवान ही नहीं, चरित्रवान पीढ़ी का निर्माण करें

    शिक्षक दिवस पर विशेष
    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीSeptember 5, 2025No Comments7 Mins Read
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    राष्ट्रीय शिक्षक दिवस – 5 सितम्बर 2025 पर विशेष
    शिक्षक ज्ञानवान ही नहीं, चरित्रवान पीढ़ी का निर्माण करें
    – ललित गर्ग –
    शिक्षक ही सभ्यता और संस्कृति के असली शिल्पी होते हैं। विज्ञान, तकनीक और राजनीति चाहे जितनी प्रगति कर लें, यदि शिक्षा और शिक्षक दिशा न दें तो मानवता दिशाहीन हो जाती है। इसी कारण 5 सितम्बर को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा आरंभ हुई। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन 5 सितंबर को होता है, जो भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य समाज में शिक्षक के महत्व, उनके योगदान और मार्गदर्शक भूमिका को सम्मान देना है। यह अवसर विद्यार्थियों और समाज को याद दिलाता है कि शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले ही नहीं बल्कि आदर्श, प्रेरक और चरित्र-निर्माता भी होते हैं। आज जबकि नया भारत-सशक्त भारत-विकसित भारत निर्मित हो रहा है, तब शिक्षकों की भूमिका अधिक प्रासंगिक हो गयी है।

     

    डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को आंध्र प्रदेश के तिरुत्तनी में हुआ था। वे एक महान दार्शनिक, विद्वान, शिक्षक और राजनेता थे। उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में दर्शनशास्त्र पढ़ाया। उनकी पुस्तकें ‘इंडियन फिलोशॉफी’ ‘दी हिन्दू व्यूह ऑफ लाइफ’ और ‘दी आइडलिस्ट ऑफ लाइफ’ विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हुईं। वे 1952 से 1962 तक भारत के उपराष्ट्रपति और 1962 से 1967 तक भारत के राष्ट्रपति रहे। उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। जब वे राष्ट्रपति बने तो उनके कुछ शिष्यों और मित्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा व्यक्त की। इस पर उन्होंने विनम्रता से कहा कि यदि आप लोग मेरे जन्मदिन को विशेष रूप से मनाना चाहते हैं तो उसे शिक्षक दिवस के रूप में मनाइए। तब से ही 5 सितम्बर राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। डॉ. राधाकृष्णन का संदेश यही था कि शिक्षक समाज की रीढ़ हैं और उनका सम्मान करना ही वास्तविक राष्ट्र निर्माण है। निश्चित ही शिक्षकों का यह सम्मान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य का घोषणापत्र है।

     


    यह दिवस राष्ट्र को शिक्षा, विज्ञान, शांति एवं प्रगति का सन्देश देने के लिए कृत संकल्पित है। भारत का इतिहास शिक्षा की गौरवमयी परंपरा से जुड़ा है। प्राचीन समय से भारत शिक्षा का बड़ा केन्द्र रहा है और उसने संसार में जगतगुरु की भूमिका निभाई है। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने भारत को जगतगुरु का दर्जा दिलाया। महान् दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ ने कहा था-“व्यक्तित्व-निर्माण का कार्य अत्यन्त कठिन है और यह केवल निःस्वार्थी एवं जागरूक शिक्षक ही कर सकता है।” यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि शिक्षक केवल जानकारी देने वाला नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक है। प्राचीन भारतीय दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य ‘सा विद्या या विमुक्तये’ रहा है, अर्थात् शिक्षा वही है जो मुक्ति दिलाए। लेकिन आधुनिक परिप्रेक्ष्य में यह ‘सा विद्या या नियुक्तये’ बन गई है अर्थात् शिक्षा वही है जो नौकरी दिलाए। यही कारण है कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ने के बावजूद समाज में अपराध और भ्रष्टाचार भी बढ़ रहे हैं।
    महात्मा गांधी का यह कथन आज भी प्रासंगिक है-“एक स्कूल खुलेगा तो सौ जेलें बंद होंगी।” परन्तु आज स्थिति इसके विपरीत है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने इस दृष्टिकोण को बदलने का प्रयास किया है। इसमें केवल क्या पढ़ना है पर ही नहीं, बल्कि कैसे पढ़ना है, इस पर भी जोर दिया गया है। आलोचनात्मक सोच, समस्या-समाधान, उद्यमशीलता और नैतिकता को शिक्षा के केंद्र में रखा गया है। लेकिन इन सभी का केन्द्रबिंदु शिक्षक ही है। यदि शिक्षक प्रेरणाहीन, निरुत्साहित या असंवेदनशील होंगे तो कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती। शिक्षा केवल किताबों और पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि शिक्षक की जीवंत उपस्थिति से सार्थक होती है। पूर्व राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था-“अगर कोई देश भ्रष्टाचार मुक्त है और सुंदर दिमागों का राष्ट्र बन गया है, तो उसके लिए तीन प्रमुख व्यक्ति जिम्मेदार होंगे-पिता, माता और शिक्षक।” यह कथन शिक्षक के महत्व को सर्वाेच्च स्थान पर स्थापित करता है। भारत अमृतकाल की ओर बढ़ रहा है। 2047 तक विकसित भारत का स्वप्न तभी साकार होगा जब हमारे शिक्षक नई पीढ़ी को केवल ज्ञानवान नहीं, बल्कि चरित्रवान भी बनाएंगे।

     


    राष्ट्रीय स्तर पर भी शिक्षा की भूमिका अत्यंत निर्णायक है। नेल्सन मंडेला ने कहा था-“शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है, जिससे दुनिया बदली जा सकती है।” युद्ध और आतंक के बीज मानव मस्तिष्क में जन्म लेते हैं, इसलिए बचपन से ही शांति और सह-अस्तित्व के बीज बोने होंगे। बच्चों को अपने देश से प्रेम के साथ विश्व-प्रेम यानी मानवता का पाठ सिखाना होगा, तभी दुनिया से युद्ध, हिंसा, आतंक का खात्मा होगा। भारतीय संस्कृति का “वसुधैव कुटुम्बकम्” मूल मंत्र इसमें सहायक बन सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि शिक्षा और शिक्षक दोनों का स्वरूप धीरे-धीरे मिशन से व्यवसाय की ओर झुकता जा रहा है। ज्ञान की बोली लग रही है, शिक्षक और छात्र के संबंधों में अविश्वास और हिंसा की खबरें बढ़ रही हैं। शिक्षा का व्यापारीकरण रोकने और उसे मानवीय मूल्यों से जोड़ने की जिम्मेदारी सबसे पहले शिक्षकों पर ही आती है।

     


    आज आवश्यकता केवल शिक्षा क्रांति की नहीं, बल्कि शिक्षक क्रांति की भी है। अच्छे पाठ्यक्रम, नई तकनीक और आधुनिक संस्थानों की व्यवस्था तभी सार्थक है जब उनके केंद्र में ऐसे शिक्षक हों, जो छात्रों को प्रेरणा दें, जो उनके सर्वांगीण विकास का माध्यम बनें। खेत, बीज और उपकरण के रहते हुए किसान न हो तो सब बेकार है। उसी प्रकार, विद्यालय, पाठ्यक्रम और तकनीक के रहते हुए यदि शिक्षक नहीं हैं तो सब निरर्थक है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था-“सर्वांगीण विकास का अर्थ है हृदय से विशाल, मन से उच्च और कर्म से महान।” शिक्षक ही ऐसे व्यक्तित्व गढ़ते हैं। शिक्षा के बदलते अर्थ ने समाज की मानसिकता को बदल दिया है। यही कारण है कि आज समाज में लोग केवल शिक्षित होना चाहते हैं, सुशिक्षित यानी गुण-सम्पन्न नहीं बनना चाहते। मानो उनका लक्ष्य केवल बौद्धिक विकास ही है। इन स्थितियों से शिक्षकों को बाहर निकलने में नई शिक्षा नीति से बहुत अपेक्षाएं हैं।

     


    भारत की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रमुख उद्देश्य बच्चों को केवल साक्षर बनाना नहीं, बल्कि उनमें सामाजिक और भावनात्मक कौशल का विकास करना है। 2030 तक स्कूली शिक्षा के सार्वभौमिकरण का लक्ष्य इसी दृष्टि से रखा गया है। किंतु संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों की अनुपलब्धता और बदलते सामाजिक परिवेश की चुनौतियां इस दिशा में बड़ी बाधाएं हैं। इसके बावजूद भारत में शिक्षा की परंपरा इतनी प्राचीन और समृद्ध रही है कि विदेशी विद्वान भी इसकी प्रशंसा करते आए हैं। एफ. डब्ल्यू. टॉमस ने लिखा है-“भारत में शिक्षा विदेशी पौधा नहीं है। संसार का कोई भी ऐसा देश नहीं है, जहां ज्ञान के प्रति प्रेम का इतने प्राचीन समय में आविर्भाव हुआ हो या जिसने इतना चिरस्थायी और शक्तिशाली प्रभाव डाला हो।” वर्तमान समय में शिक्षक की भूमिका भले ही बदली हो, लेकिन उनका महत्व एवं व्यक्तित्व-निर्माण की जिम्मेदारी अधिक प्रासंगिक हुई है। क्योंकि सर्वतोमुखी योग्यता की अभिवृद्धि के बिना युग के साथ चलना और अपने आपको टिकाए रखना अत्यंत कठिन होता है। फौलाद-सा संकल्प और सब कुछ करने का सामर्थ्य ही व्यक्तित्व में निखार ला सकता है। शिक्षक ही ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण करते हैं।

     


    आर्थिक आपाधापी, आतंक, युद्ध एवं हिंसा के आधुनिक युग में शिक्षकों की भूमिका बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि वे छात्रों को न केवल ज्ञान देते हैं, बल्कि उन्हें जीवन में जरूरी कौशल भी सिखाते हैं। शिक्षक छात्रों के साथ सहयोग करते हुए उन्हें नैतिक मूल्यों एवं शांतिपूर्ण जीवन के बारे में भी समझाते हैं जो एक अच्छे नागरिक के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिये शिक्षक को ऐसे छात्र तैयार करने होंगे जो वैज्ञानिक-आध्यात्मिक हो, जिनमें बौद्धिकता एवं भावनात्मकता के साथ शारीरिक एवं मानसिक विकास हो। शिक्षक दिवस 2025 का वास्तविक संदेश यही होना चाहिए कि शिक्षक केवल पेशेवर नहीं, बल्कि समाज की आत्मा के निर्माता हैं। भारत यदि पुनः विश्वगुरु बनना चाहता है तो उसे केवल नई शिक्षा नीति ही नहीं, बल्कि निष्ठावान और दूरदर्शी शिक्षकों की फौज तैयार करनी होगी।

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