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    Home » छात्रों को चाहिए भरोसा, नहीं भाषण: शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
    राष्ट्रीय शिक्षा संपादकीय

    छात्रों को चाहिए भरोसा, नहीं भाषण: शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaMay 30, 2026No Comments4 Mins Read
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    शिक्षा व्यवस्था
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    लेखक: देवानंद सिंह

    देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल NEET और करोड़ों छात्रों के भविष्य का फैसला करने वाली CBSE की परीक्षा व्यवस्था आज कठघरे में खड़ी है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्वीकार किया है कि NTA की परीक्षा प्रणाली में कमियां थीं और CBSE के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) में भी खामियां रह गई थीं। लेकिन सवाल यह है कि जब लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर था, तब ये कमियां पहले क्यों नहीं दिखीं?

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और सरकारी जवाबदेही

    सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल सही पूछा कि अगर अब सरकार को सिस्टम की खामियां दिखाई दे रही हैं तो ये कदम पहले क्यों नहीं उठाए गए? अगर पेपर लीक हुआ, तो जिम्मेदार कौन था? क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हुई? क्या किसी बड़े स्तर पर कार्रवाई हुई? या फिर हर बार की तरह जांच समितियां बनाकर फाइलों में मामला दफना दिया गया?

    हैरानी की बात यह है कि सरकार अब दावा कर रही है कि पेपर को सुरक्षित पहुंचाने के लिए वायुसेना की मदद ली जाएगी, IIT विशेषज्ञों को जोड़ा जाएगा और पूरी प्रक्रिया को टेक्नोलॉजी आधारित बनाया जाएगा। लेकिन यह दावा जितना सुनने में प्रभावशाली लगता है, उतना ही चिंताजनक भी है। अगर एक परीक्षा को सुरक्षित कराने के लिए प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत रूप से निगरानी करनी पड़े और वायुसेना की मदद लेनी पड़े, तो यह किसी उपलब्धि का नहीं बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है।

    सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कि “अगर परीक्षा कराने के लिए प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़े तो यह पूरे सिस्टम के लिए शर्मनाक है”, व्यवस्था पर सबसे बड़ा तमाचा है। आखिर ऐसा क्यों हुआ कि देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं की विश्वसनीयता बार-बार सवालों के घेरे में आ गई? 2015 से अब तक मेडिकल प्रवेश परीक्षा का पेपर पांच बार लीक होना कोई संयोग नहीं, बल्कि सिस्टम की गहरी सड़ांध का संकेत है।

    हर बार कुछ गिरोह पकड़े जाते हैं, कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है और फिर अगले साल वही कहानी दोहराई जाती है। लेकिन उन लाखों छात्रों का क्या, जिन्होंने दिन-रात मेहनत की, जिनके परिवारों ने सपनों और उम्मीदों का बोझ उठाया? क्या उनकी मानसिक पीड़ा, समय और आर्थिक नुकसान की कोई भरपाई संभव है?

    CBSE की ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) में खामियां

    इधर CBSE भी सवालों के घेरे में है। ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को आधुनिकता का प्रतीक बताकर लागू किया गया, लेकिन नतीजा यह हुआ कि लाखों छात्रों को कम अंक मिलने, गलत मूल्यांकन और तकनीकी गड़बड़ियों की शिकायत करनी पड़ी। चार लाख से अधिक छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां मांगीं। वेबसाइट ठप पड़ गई, पेमेंट गेटवे फेल हो गया और छात्रों को बार-बार चक्कर लगाने पड़े।

    तकनीक का उद्देश्य व्यवस्था को सरल और पारदर्शी बनाना होता है, लेकिन जब तकनीक ही छात्रों के लिए नई मुसीबत बन जाए तो उसकी समीक्षा जरूरी हो जाती है। पश्चिमी देशों के मॉडल को आंख मूंदकर लागू करना समाधान नहीं है। भारत की परीक्षा प्रणाली का आकार और चुनौतियां दुनिया के अधिकांश देशों से कहीं बड़ी हैं। यहां करोड़ों छात्रों की परीक्षाएं होती हैं, इसलिए किसी भी तकनीकी बदलाव से पहले उसकी क्षमता और विश्वसनीयता की कठोर जांच होनी चाहिए।

    भरोसे की कमी और भविष्य का संकट

    सवाल सिर्फ पेपर लीक या तकनीकी गड़बड़ी का नहीं है। सवाल उस भरोसे का जो छात्र और अभिभावक शिक्षा व्यवस्था पर करते हैं। जब बार-बार परीक्षाएं विवादों में घिरें, परिणामों पर सवाल उठें और अदालत को हस्तक्षेप करना पड़े, तो यह भरोसा कमजोर पड़ने लगता है।

    सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा कोई प्रयोगशाला नहीं है जहां हर साल नए प्रयोग किए जाएं और असफल होने पर माफी मांग ली जाए। यहां दांव पर देश के युवाओं का भविष्य है। जवाबदेही तय किए बिना, दोषियों को कठोर दंड दिए बिना और व्यवस्था में पारदर्शिता लाए बिना केवल तकनीक और बड़े-बड़े दावों से समस्या का समाधान नहीं होगा।

    देश के करोड़ों छात्रों को भाषण नहीं, भरोसा चाहिए। और भरोसा तभी लौटेगा जब परीक्षा व्यवस्था में ईमानदारी, जवाबदेही और पारदर्शिता सिर्फ नारों में नहीं, जमीन पर दिखाई देगी। तभी शिक्षा व्यवस्था सम्मान बचा पाएगी, अन्यथा हर नया पेपर लीक और हर नई तकनीकी विफलता इस व्यवस्था की साख पर एक और गहरा दाग छोड़ती रहेगी।

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