लेखक: डाक्टर दीपक गोस्वामी
लुटता अंतिम जन आज डिजिटल भारत की सबसे बड़ी विडंबना बन चुका है। यह केवल एक वृद्धा की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की व्यथा है जो डिजिटल क्रांति में तो शामिल हो गया, किंतु डिजिटल सुरक्षा की ढाल से अब भी वंचित है।
साइबर ठगी का शिकार होता लुटता अंतिम जन
सत्तर वर्ष की एक वृद्धा के मोबाइल पर संदेश आता है कि सरकारी सहायता की राशि खाते में भेजी गई है। कुछ ही क्षण बाद बैंक अधिकारी बनकर एक व्यक्ति फोन करता है। वह केवाईसी अधूरा होने की बात कहकर ओटीपी माँगता है। वृद्धा घबरा जाती है। उसे लगता है कि यदि ओटीपी नहीं बताया तो सहायता वापस चली जाएगी। कुछ ही मिनटों में जीवनभर की बचत गायब हो जाती है। यह केवल रुपये की चोरी नहीं होती, बल्कि विश्वास की भी हत्या होती है।
बढ़ते साइबर अपराधों के आंकड़े
देश में प्रतिदिन हजारों लोग साइबर अपराधों का शिकार बन रहे हैं। बैंकिंग धोखाधड़ी, फर्जी लिंक, डिजिटल गिरफ्तारी, निवेश के नाम पर ठगी और पहचान की चोरी जैसी घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। सबसे अधिक पीड़ा इस बात की है कि इन अपराधों का सबसे बड़ा निशाना वही व्यक्ति बनता है जिसके पास जानकारी कम है, संसाधन सीमित हैं और न्याय पाने की क्षमता भी कमजोर है।
सामाजिक-आर्थिक असमानता सबसे बड़ा कारण
इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण सामाजिक और आर्थिक असमानता है। महानगरों में रहने वाले नागरिकों के पास बैंक अधिकारी तक पहुँच है, साइबर विशेषज्ञ हैं, वकील हैं और शिकायत दर्ज कराने के अनेक माध्यम हैं। दूसरी ओर गाँव का गरीब व्यक्ति बैंक तक पहुँचने में ही पूरा दिन खर्च कर देता है। शिकायत करने पर उसे ऑनलाइन प्रक्रिया अपनाने को कहा जाता है, जबकि वह स्वयं स्मार्टफोन ठीक से संचालित नहीं कर पाता। उसके लिए दस हजार रुपये का नुकसान जीवन की पूरी आर्थिक व्यवस्था को हिला देता है।
डिजिटल शिक्षा का अभाव
दूसरा कारण डिजिटल शिक्षा का अभाव है। इंटरनेट गाँव तक पहुँचा, लेकिन उसके सुरक्षित उपयोग का ज्ञान नहीं पहुँचा। अधिकांश लोगों को यह तक नहीं मालूम कि बैंक कभी फोन पर ओटीपी या पिन नहीं माँगता। नकली वेबसाइट और असली वेबसाइट में अंतर कैसे पहचाना जाए, इसका प्रशिक्षण कभी नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप तकनीक सुविधा बनने के स्थान पर भय और भ्रम का कारण बन गई।
लालच और जल्दबाज़ी का फायदा
तीसरा कारण लालच और जल्दबाज़ी है। साइबर अपराधी मानव मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझते हैं। मुफ्त उपहार, सरकारी अनुदान, लकी ड्रॉ, कम ब्याज पर ऋण, अधिक लाभ वाला निवेश—ये सभी संदेश इंसान की कमजोरियों को लक्ष्य बनाते हैं। जैसे ही व्यक्ति सोचने के बजाय तुरंत निर्णय लेता है, अपराधी अपना काम पूरा कर लेते हैं।
भारतीय समाज का सहज विश्वास
चौथा कारण भारतीय समाज का सहज विश्वास है। हमारे समाज में आज भी शिक्षक, बैंक कर्मचारी, पुलिस अधिकारी और सरकारी कर्मचारी के प्रति सम्मान और भरोसा बना हुआ है। अपराधी इसी विश्वास का दुरुपयोग करते हैं। डेटा लीक से प्राप्त व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर वे स्वयं को सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को विश्वास में ले लेते हैं। व्यक्ति समझ ही नहीं पाता कि सामने बैठा व्यक्ति अपराधी है।
नीतियों और क्रियान्वयन की दूरी
पाँचवाँ कारण नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच की दूरी है। डिजिटल सेवाओं का विस्तार हुआ, लेकिन उसके साथ साइबर सुरक्षा का व्यापक प्रशिक्षण नहीं जुड़ पाया। स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा दी गई, पर साइबर सुरक्षा नहीं पढ़ाई गई। बैंक खाते खोले गए, लेकिन खाताधारकों को सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण नहीं दिया गया। हेल्पलाइन नंबर बनाए गए, पर उनकी जानकारी अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का गंभीर प्रयास नहीं हुआ।
व्यवस्था की जटिलता और उत्तरदायित्व की कमी
छठा कारण व्यवस्था की जटिलता और उत्तरदायित्व की कमी है। पीड़ित व्यक्ति जब शिकायत लेकर कार्यालयों के चक्कर लगाता है तो उसे तकनीकी बहाने सुनने पड़ते हैं। कई बार शिकायत दर्ज होने में ही इतना समय लग जाता है कि अपराधी धन को अनेक खातों में स्थानांतरित कर देते हैं। यदि कहीं डेटा लीक में संस्थागत लापरवाही या भ्रष्टाचार शामिल हो तो उस पर कठोर कार्रवाई भी कम ही दिखाई देती है।
जनजागरण का अभाव
सातवाँ कारण जनजागरण का अभाव है। जिस प्रकार पोलियो उन्मूलन और स्वच्छता अभियान को जनआंदोलन बनाया गया, उसी प्रकार साइबर सुरक्षा को कभी सामाजिक अभियान नहीं बनाया गया। पंचायत, विद्यालय, धार्मिक स्थल, स्वयंसेवी संस्थाएँ, आंगनबाड़ी, आशा कार्यकर्ता और सामाजिक संगठन इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकते थे, लेकिन उनका समुचित उपयोग नहीं हुआ।
समाधान: जनभाषा में साइबर सुरक्षा
समाधान केवल कानून बनाने से नहीं निकलेगा। सबसे पहले साइबर सुरक्षा को जनभाषा में समझाना होगा। गाँव की चौपाल, पंचायत भवन, स्कूल, किसान मेले, धार्मिक आयोजन और सामुदायिक रेडियो इसके सबसे प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। प्रत्येक बैंक शाखा को प्रत्येक नए ग्राहक के साथ साइबर सुरक्षा की अनिवार्य जानकारी देनी चाहिए। प्रत्येक विद्यालय में डिजिटल नागरिकता और साइबर सुरक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक पंचायत में प्रशिक्षित साइबर स्वयंसेवक नियुक्त किए जाएँ जो लोगों की सहायता कर सकें। शिकायत प्रणाली सरल, त्वरित और भरोसेमंद बनाई जाए ताकि पीड़ित व्यक्ति बिना भय और बिना भटकाव के न्याय प्राप्त कर सके। RBI द्वारा जारी दिशानिर्देशों का पालन आवश्यक है।
सुरक्षित डिजिटल भारत की आवश्यकता
भारत का भविष्य केवल डिजिटल होने में नहीं, बल्कि सुरक्षित डिजिटल होने में है। यदि गाँव का किसान, रिक्शा चालक, श्रमिक, वृद्ध महिला और सामान्य नागरिक यह विश्वास नहीं करेगा कि उसका धन और उसकी पहचान सुरक्षित है, तो डिजिटल भारत का सपना अधूरा ही रहेगा। तकनीक तभी सफल मानी जाएगी जब वह सुविधा के साथ सुरक्षा भी दे। विकास तभी सार्थक होगा जब वह अंतिम व्यक्ति तक बिना भय और बिना शोषण के पहुँचे।
आज आवश्यकता केवल नई तकनीक की नहीं, बल्कि नई चेतना की है। अपराधी हर दिन नए तरीके खोज रहे हैं, इसलिए समाज को भी हर दिन अधिक सजग होना होगा। यही सच्ची डिजिटल साक्षरता है, यही वास्तविक आत्मरक्षा है और यही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव है।

