लेखक: राजेश कुमार
समस्तीपुर जिले के रोसड़ा अनुमंडल क्षेत्र के पैक्स अध्यक्षों ने आगामी एक नवंबर से शुरू होने वाली धान अधिप्राप्ति से अलग रहने का निर्णय लिया है। इस फैसले से जिले भर में धान खरीद प्रक्रिया प्रभावित होने की प्रबल आशंका जताई जा रही है। पैक्स अध्यक्षों का स्पष्ट आरोप है कि सरकार की वर्तमान नीतियों के कारण समितियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिसके चलते उनके पास बहिष्कार के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
धान अधिप्राप्ति से अलग रहने का निर्णय के पीछे प्रमुख कारण
व्यापार मंडल परिसर में 25 अक्टूबर को सुनील कुमार कुशवाहा की अध्यक्षता में हुई बैठक में पैक्स अध्यक्षों ने अपनी पीड़ा साझा की। अध्यक्षों ने बताया कि पिछले वर्ष की धान अधिप्राप्ति में समितियों को मिलने वाले कमीशन की तुलना में चार से पांच गुना तक ब्याज का बोझ उठाना पड़ रहा है। इससे समितियों की वित्तीय स्थिति चरमरा गई है। इसके अलावा सरकार की ओर से कुल उत्पादन का मात्र 10 प्रतिशत धान खरीदने का लक्ष्य निर्धारित किया जाना तथा रखरखाव के लिए अपर्याप्त राशि दिए जाने से भी संचालन में भारी परेशानी हो रही है।
पैक्स अध्यक्षों की चार प्रमुख मांगें
बैठक में सर्वसम्मति से चार सूत्री मांगें रखी गईं, जिनके पूरा न होने तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया गया:
- ब्याज की शत-प्रतिशत प्रतिपूर्ति: वर्ष 2025-26 की अधिप्राप्ति से संबंधित ब्याज की 100 प्रतिशत राशि का भुगतान समितियों को अविलंब किया जाए।
- ब्याजमुक्त ऋण व्यवस्था: वर्ष 2026-27 की अधिप्राप्ति के लिए ब्याजमुक्त ऋण की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- अनुदान एवं बोरे की राशि: प्रबंधकीय अनुदान एवं बोरे की राशि सीधे समितियों के एसबीसीएस खाते में जमा कराई जाए।
- आच्छादन रिपोर्ट की पुनः जांच: रोसड़ा प्रखंड की आच्छादन रिपोर्ट की पुनः जांच कराकर वास्तविक उत्पादन के आधार पर खरीद लक्ष्य तय किया जाए।
बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया ऐतिहासिक फैसला
व्यापार मंडल परिसर में आयोजित इस बैठक में रोसड़ा अनुमंडल के सभी पैक्स अध्यक्ष उपस्थित थे। सुनील कुमार कुशवाहा ने कहा कि “जब तक हमारी मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं होती, तब तक समितियां धान अधिप्राप्ति प्रक्रिया से पूर्णतः अलग रहेंगी।” उन्होंने बताया कि सरकारी उदासीनता के कारण पैक्स प्रबंधन समितियां दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गई हैं। ब्याज का बोझ इतना अधिक है कि कमीशन की राशि उससे चुकाने के बाद समितियों के पास संचालन के लिए कुछ नहीं बचता।
किसानों पर पड़ सकता है प्रतिकूल प्रभाव
इस बहिष्कार का सीधा असर क्षेत्र के हजारों किसानों पर पड़ने की संभावना है। एक नवंबर से धान की कटाई जोर पकड़ेगी और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर धान बेचने के लिए सरकारी केंद्रों का इंतजार करना पड़ेगा। यदि पैक्स केंद्र नहीं खुलते हैं तो किसानों को मजबूरन बिचौलियों को कम दाम पर धान बेचना पड़ेगा। इस संबंध में कृषि विभाग की आधिकारिक जानकारी के लिए बिहार सरकार कृषि विभाग पोर्टल पर विजिट किया जा सकता है।
प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज
पैक्स अध्यक्षों के इस कड़े रुख के बाद जिला सहकारिता पदाधिकारी एवं अनुमंडल प्रशासन हरकत में आ गया है। अधिकारियों का कहना है कि पैक्स अध्यक्षों की मांगों को वरीय पदाधिकारियों एवं सरकार तक पहुंचाया जाएगा। हालांकि, खरीद शुरू होने में चंद दिन शेष रहने के कारण समय पर समाधान निकलना चुनौतीपूर्ण लग रहा है। पैक्स अध्यक्षों ने दोहराया है कि यह लड़ाई केवल आर्थिक हितों की नहीं, बल्कि सहकारी व्यवस्था को बचाए रखने की है।

