कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक सिद्धांतों का सम्मान जरूरी
देवानंद सिंह
सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज में की गई तोड़-फोड़ पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर तीखी टिप्पणी की है। भारत की सबसे बड़ी अदालत ने कहा है कि क़ानून के शासन में किसी के घर को इस तरह से नहीं ढहाया जा सकता है। कोर्ट ने योगी आदित्यनाथ की सरकार और प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी के बुल्डोजर एक्शन को अमानवीय और ग़ैरक़ानूनी कहा है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार की बुलडोज़र कार्रवाई पर की गई यह टिप्पणी भारतीय लोकतंत्र और कानून के शासन की बुनियादी समझ को रेखांकित करती है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी नागरिक के घर को ढहाना न केवल अमानवीय बल्कि असंवैधानिक भी है। यह निर्णय न केवल प्रभावित व्यक्तियों को न्याय दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि भविष्य में कानून के शासन की मर्यादा बनाए रखने के लिए एक मिसाल भी प्रस्तुत करता है।
प्रयागराज में 2021 में की गई यह तोड़फोड़ कई स्तरों पर सवाल उठाती है। प्रशासन ने यह दावा किया था कि इन घरों का संबंध आपराधिक तत्वों से था, लेकिन न्यायपालिका का मानना है कि महज़ किसी आरोप के आधार पर किसी की संपत्ति को नष्ट कर देना अन्यायपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कृत्य को ‘अमानवीय और गैरकानूनी’ करार देते हुए पीड़ितों को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
यह पहला अवसर नहीं है, जब अदालत ने बुलडोज़र कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। पिछले वर्ष भी शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि किसी व्यक्ति के घर को केवल संदेह के आधार पर गिराना कानून के शासन के खिलाफ है। न्यायालय के अनुसार, किसी भी विध्वंस से पहले नोटिस जारी किया जाना अनिवार्य है, ताकि व्यक्ति को अपनी संपत्ति के पक्ष में कानूनी बचाव का अवसर मिले।
उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र नीति को एक राजनीतिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इसे अपराधियों और माफियाओं के विरुद्ध एक कठोर नीति के रूप में प्रचारित किया। हालांकि, यह देखा गया कि प्रशासन द्वारा बुलडोज़र का उपयोग कई बार राजनीतिक विरोधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों के खिलाफ भी किया गया। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह नीति वास्तव में अपराध नियंत्रण का साधन है या फिर सत्ता के विरोधियों को दबाने का एक उपकरण?
विशेषज्ञों का मानना है कि कानून और न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी करके की गई कार्रवाई केवल अराजकता को जन्म देती है। यदि, किसी व्यक्ति पर आपराधिक आरोप हैं, तो उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, न कि उसकी संपत्ति को अवैध रूप से ध्वस्त कर दिया जाए। मानवाधिकार संगठनों और नागरिक समाज ने भी इस प्रकार की बुलडोज़र कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है। कई रिपोर्टों में यह सामने आया है कि प्रभावित लोगों को विध्वंस से पहले कोई कानूनी नोटिस नहीं दिया गया था, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘जीवन और स्वतंत्रता’ के अधिकार का उल्लंघन है।
संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का यह दायित्व है कि वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करे, न कि उन्हें मनमाने प्रशासनिक निर्णयों के जरिए कुचले। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बिना नोटिस और कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन कर की गई कोई भी विध्वंस कार्रवाई संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ है।
बुलडोज़र कार्रवाई से प्रभावित परिवारों की हालत बेहद दयनीय हो गई है। एक घर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं होता, बल्कि उसमें रहने वाले लोगों की मेहनत, सपने और भावनाएं जुड़ी होती हैं। मुआवजा देना एक सराहनीय कदम है, लेकिन क्या यह उस मानसिक और भावनात्मक आघात की भरपाई कर सकता है जो इन परिवारों ने झेला है?
यह भी देखा गया है कि कई बार प्रशासन ने ऐसे लोगों के घर तोड़े, जिनके पास वैध दस्तावेज थे। ऐसे मामलों में न केवल सरकारी तंत्र की लापरवाही उजागर होती है, बल्कि प्रशासन की मनमानी भी सामने आती है। यह भी चिंता का विषय है कि जिन लोगों के घर गिराए गए, क्या उन्हें समुचित पुनर्वास प्रदान किया गया? सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय एक महत्वपूर्ण उदाहरण स्थापित करता है कि कानून के शासन के तहत किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना ही होगा। सरकारों को अब यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी संपत्ति को ध्वस्त करने से पहले सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए। बुलडोज़र कार्रवाई से जुड़े सभी मामलों की न्यायिक समीक्षा अनिवार्य की जाए। विध्वंस से पहले उचित नोटिस दिया जाए और कानूनी बचाव का अवसर प्रदान किया जाए। इस तरह की कार्रवाइयों की निष्पक्ष जांच के लिए स्वतंत्र आयोग का गठन किया जाए। प्रभावित परिवारों के लिए मुआवजे के अलावा पुनर्वास की समुचित व्यवस्था की जाए। बुलडोज़र का उपयोग केवल अपराध नियंत्रण के लिए किया जाए, न कि राजनीतिक विरोधियों या नागरिक आंदोलनों को दबाने के लिए।
कुल मिलाकर, बुलडोज़र कार्रवाई को अपराध नियंत्रण की एक प्रभावी रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन इसकी आड़ में कई नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में जो फैसला दिया है, वह न्याय की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। इस आदेश से प्रशासन को यह स्पष्ट संदेश गया है कि कानून के शासन से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह सरकार ही क्यों न हो। यदि, सरकारें वास्तव में अपराध को खत्म करना चाहती हैं, तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक सिद्धांतों का सम्मान करना होगा। न्याय के बिना किसी भी कार्रवाई को न तो लोकतांत्रिक कहा जा सकता है और न ही न्यायसंगत।