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    Home » प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा रही पुरी रथयात्रा भगदड़
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    प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा रही पुरी रथयात्रा भगदड़

    News DeskBy News DeskJuly 1, 2025No Comments4 Mins Read
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    प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा रही पुरी रथयात्रा भगदड़
    देवानंद सिंह
    पुरी की रथयात्रा महज एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था, समर्पण और सांस्कृतिक पहचान का जीवंत प्रमाण है, लेकिन इस बार, गुंडिचा मंदिर के सामने जो कुछ हुआ, उसने न केवल तीन निर्दोष जिंदगियों को लील लिया, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, वीआईपी संस्कृति और आयोजन प्रबंधन की कमजोरियों को भी नंगा कर दिया। सुबह क़रीब 4:20 बजे जब तीनों रथ मंदिर पहुंच चुके थे और श्रद्धालु दर्शन हेतु उमड़ रहे थे, तभी अचानक ‘चारमाल’ से लदे दो ट्रकों का भीड़ में प्रवेश हुआ। न कोई चेतावनी, न कोई व्यवस्था। इसका नतीजा हुआ भगदड़, चीख-पुकार, और तीन मौतें। प्रशासन ने इस पर तात्कालिक कार्रवाई करते हुए जिलाधिकारी और एसपी का तबादला किया, दो वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित किया और जांच के आदेश दिए। यह दर्शाता है कि सरकार ने आंशिक रूप से अपनी विफलता स्वीकार की है, लेकिन यह प्रतिक्रिया देर से और दबाव में आई।

     

    सवाल यह नहीं कि कितने पुलिसकर्मी तैनात थे, बल्कि यह है कि क्या वे पर्याप्त थे, प्रशिक्षित थे और सतर्क थे? मृतकों के परिजनों और चश्मदीदों के बयान स्पष्ट करते हैं कि सुरक्षा व्यवस्था मात्र दिखावे की थी। घायल लोगों को अपनी गाड़ियों से अस्पताल ले जाना पड़ा, यह व्यवस्था नहीं, अराजकता है। रथयात्रा के आयोजन से पहले ही अव्यवस्थाओं की शिकायतें सामने आ चुकी थीं। गत, शुक्रवार को भीड़ के कारण कई लोगों की तबीयत बिगड़ने की घटनाएं हुईं, लेकिन प्रशासन ने इसे चेतावनी नहीं समझा। सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को मज़बूत करने के बजाय वीआईपी पास बांटने में ज़्यादा ऊर्जा लगाई गई।

     

    गौतम अदानी जैसे उद्योगपतियों को रथ खींचने का विशेष मौका देने के लिए मार्ग को साफ़ कराना, रथों को देर तक रोकना, ये आरोप यदि सिद्ध भी न हों, तो भी संकेतक हैं कि आयोजन आस्था से अधिक प्रतिष्ठा और शक्ति का मंच बनता जा रहा है। यह न केवल आम श्रद्धालुओं के अधिकारों का हनन है, बल्कि धार्मिक आयोजनों के व्यवसायीकरण की खतरनाक प्रवृत्ति है। पूर्व कलेक्टर और एसपी को हटाने से क्या यह माना जाए कि वे दोषी थे? यदि हां, तो क्या उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई या आपराधिक मुकदमा चलेगा? और यदि नहीं, तो फिर केवल तबादले क्यों? यह स्पष्ट करना होगा कि क्या यह केवल ‘सांकेतिक कार्रवाई’ है या असली जवाबदेही तय की जाएगी।

     

    ‘जगन्नाथ सेना’ जैसे स्थानीय संगठनों ने मृतकों की संख्या बढ़ाकर बताई है और प्रशासन पर शवों को छिपाने का आरोप लगाया है। यदि, यह सच है तो यह त्रासदी को छिपाने का संगीन प्रयास है, और यदि गलत है, तो ऐसे बयान सार्वजनिक भय और भ्रम को बढ़ाते हैं। इन बयानों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और कांग्रेस नेताओं ने मोहन माझी सरकार पर सवाल उठाए हैं। बदले में भाजपा ने इसे राजनीतिकरण बताया है। लेकिन असल मुद्दा यह है कि जब मौतें हुई हैं, तो जिम्मेदारियों का निर्धारण होना ही चाहिए, चाहे वह किसी भी दल के कार्यकाल में हो। पुरी जैसे तीर्थ में इतने बड़े आयोजन के दौरान स्थानीय प्रशासन, मंदिर समिति, राज्य सरकार और पुलिस, सभी की साझा भूमिका होती है, लेकिन इस भगदड़ ने दिखाया कि इनके बीच समन्वय की भारी कमी थी। कोई ‘चारमाल’ ट्रकों का समन्वय नहीं कर रहा था, न भीड़ का मार्गदर्शन कर रहा था।

     

    ऐसी घटनाएं पहले भी रथ खींचने के समय हुई हैं, लेकिन यह पहली बार है जब तीनों रथ मंदिर पहुंच चुके थे और फिर भगदड़ मची। यानी समाप्त मानी जा रही प्रक्रिया के दौरान भीड़ प्रबंधन विफल रहा, इससे यह साफ़ है कि पूरी योजना में ही खोट था, आगे समाधान और सुझाव की दिशा में काम करना जरूरी है। स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग का गठन हो, क्योंकि केवल प्रशासनिक जांच से जवाबदेही तय नहीं होती। भीड़ प्रबंधन के लिए विशेषज्ञ एजेंसियों की नियुक्ति हो, जैसे NDRF या NDMA की सहायता। प्लास्टिक पॉलिथीन का उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित हो, क्योंकि यह फिसलन और दुर्घटनाओं का कारण बनती है। वीआईपी पास प्रणाली की समीक्षा और केवल न्यूनतम आवश्यक पास ही जारी किए जाएं। मंदिर परिसर और ग्रैंड रोड पर CCTV और AI आधारित भीड़ नियंत्रण प्रणाली स्थापित हो। श्रद्धालुओं के लिए पूर्व नियोजित हेल्थ और ट्रांजिट ज़ोन बनाए जाएं ताकि प्राथमिक उपचार तुरंत मिल सके।

     

    कुल मिलाकर, पुरी की भगदड़ एक दु:खद त्रासदी थी, लेकिन उससे अधिक यह प्रशासनिक घमंड, वीआईपी संस्कृति और धार्मिक आयोजनों की राजनीतिक ब्रांडिंग का परिणाम थी। यदि, इस बार भी इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण संयोग’ कहकर टाल दिया गया, तो अगली बार यह त्रासदी और भी विकराल रूप ले सकती है। रथ यात्रा की पवित्रता तभी सुरक्षित रह पाएगी जब श्रद्धा के साथ-साथ सजगता, संवेदनशीलता और जवाबदेही भी शामिल हों।

     

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