प्रधानमंत्री मोदी की मणिपुर यात्रा प्रतीकात्मक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से ऐतिहासिक
देवानंद सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मणिपुर यात्रा को प्रतीकात्मक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से ऐतिहासिक है। शनिवार को जब वह चुराचांदपुर ज़िले पहुंचे और लगभग 7,000 करोड़ रुपये की विकास योजनाओं का शिलान्यास व उद्घाटन किया, तो यह केवल योजनाओं की घोषणा नहीं थी बल्कि एक संदेश भी था कि केंद्र सरकार मणिपुर को अंधेरे से बाहर निकालने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन प्रश्न यह भी उठता है कि क्या यह यात्रा उस दर्द और पीड़ा को भर पाएगी, जो पिछले ढाई सालों से राज्य के आम नागरिक झेल रहे हैं?
संकट की नींव मार्च 2023 में तब रखी गई, जब मणिपुर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) सूची में शामिल करने पर विचार करने का निर्देश दिया। यही वह बिंदु था, जिसने राज्य के दो प्रमुख समुदायों मैतेई और कुकी के बीच अविश्वास और टकराव को खुली हिंसा में बदल दिया। 3 मई 2023 को हिंसा भड़क उठी और देखते ही देखते पूरे राज्य में आग फैल गई। प्रशासन ने कर्फ़्यू लगाया, शूट ऐट साइट का आदेश दिया और सेना के साथ असम राइफ़ल्स को उतारा गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, मणिपुर की जातीय संरचना हमेशा से नाज़ुक रही है। मैतेई समुदाय बहुसंख्यक है और इम्फाल घाटी पर उसका सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व है, जबकि कुकी और नागा समुदाय पहाड़ी इलाक़ों में रहते हैं। मैतेई को एसटी दर्जा मिलने की संभावना ने पहाड़ी समुदायों को यह आशंका दी कि उनके ज़मीन, संसाधन और अधिकार छिन जाएंगे। यही आशंका हिंसा का वास्तविक कारण बनी। हिंसा ने मणिपुर को झकझोर कर रख दिया। सरकारी आकंड़ों के अनुसार, अब तक 250 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और हज़ारों लोग विस्थापित हुए हैं। गांव के गांव जला दिए गए, सार्वजनिक संपत्ति नष्ट हुई और आज भी बहुत से लोग राहत शिविरों या मिज़ोरम जैसे पड़ोसी राज्यों में शरण लिए हुए हैं।

जुलाई 2023 का वह वायरल वीडियो जिसमें कुकी समुदाय की दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर परेड कराते और प्रताड़ित करते दिखाया गया, पूरे देश के लिए शर्मनाक था। प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार तब इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी और कहा कि दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा। लेकिन यह प्रतिक्रिया हिंसा के दो महीने बाद आई, जिसने राजनीतिक विपक्ष को सवाल उठाने का अवसर दिया कि प्रधानमंत्री इतने लंबे समय तक मणिपुर क्यों नहीं गए। गृह मंत्री अमित शाह ने मई 2023 के अंत में मणिपुर का दौरा किया और समुदायों से बातचीत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांति बहाल करना सरकार की पहली प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह लगातार दावा करते रहे कि हालात काबू में हैं और सरकार राहत कार्यों पर ध्यान दे रही है।

लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, बीरेन सिंह की सरकार विश्वास बहाल करने में नाकाम रही। सरकार पर आरोप लगा कि उसने एक समुदाय के प्रति झुकाव दिखाया और निष्पक्षता बनाए नहीं रख सकी। यही कारण था कि राज्य में राजनीतिक असंतोष भी बढ़ता गया। नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) ने नवंबर 2024 में गठबंधन से समर्थन वापस ले लिया और राज्य सरकार की विफलता को खुलकर सामने रखा। यह संघर्ष केवल भारत की आंतरिक समस्या नहीं रहा। जनवरी 2024 में पूर्व सेना प्रमुख ने बयान दिया कि विदेशी एजेंसियों की संलिप्तता से इनकार नहीं किया जा सकता। सीमावर्ती राज्य होने के कारण मणिपुर में अस्थिरता भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी चुनौती है।

अप्रैल 2024 में ब्रिटेन की संसद में भी मणिपुर की स्थिति पर चर्चा हुई। ब्रिटेन के तत्कालीन विदेश मंत्री डेविड कैमरन ने कहा कि भारत धार्मिक स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन अगर, कोई चिंता पैदा होती है तो ब्रिटेन इसे भारत सरकार के सामने उठाएगा। यह अंतरराष्ट्रीय दबाव भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती का संकेत है, हालांकि 2024 के मध्य तक हिंसा की घटनाएं छिटपुट रह गईं, लेकिन राज्य पूरी तरह शांत नहीं हो सका। सितंबर 2024 में ड्रोन हमले में दो लोगों की मौत हुई, नवंबर 2024 में सुरक्षाबलों और हथियारबंद समूहों की मुठभेड़ में 10 लोगों की जान गई। इससे साफ़ हुआ कि हथियारबंद गुट अब भी सक्रिय हैं और राज्य में सामान्य स्थिति बहाल करना आसान नहीं होगा। दिसंबर 2024 में अजय कुमार भल्ला को मणिपुर का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया। इससे यह संदेश गया कि केंद्र सरकार प्रशासनिक स्तर पर बदलाव करने के लिए गंभीर है।
लगभग 21 महीने चले संघर्ष के बाद फरवरी 2025 में मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने इस्तीफ़ा दे दिया। विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने से पहले ही उन्होंने पद छोड़ दिया। उनके इस्तीफ़े के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा क्योंकि नया मुख्यमंत्री तय नहीं हो सका। संविधान के अनुच्छेद 174(1) का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि विधानसभा का सत्र छह महीने से अधिक समय तक नहीं बुलाया गया था, जो संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन था। इस राजनीतिक अस्थिरता ने मणिपुर की समस्या को और गहरा दिया।

5 अगस्त 2025 को जब केंद्र सरकार ने राज्यसभा में राष्ट्रपति शासन छह महीने और बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, तो विपक्ष ने जमकर हंगामा किया, लेकिन अंततः प्रस्ताव पास हो गया। यह इस बात का प्रमाण है कि राज्य में अभी भी लोकतांत्रिक शासन बहाल करना कठिन है। ऐसे हालात में प्रधानमंत्री मोदी की मणिपुर यात्रा महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है। यह उनकी मई 2023 के बाद पहली यात्रा है और ऐसे समय में हो रही है जब राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस यात्रा के दो प्रमुख उद्देश्य हैं। पहला, विकास परियोजनाओं की घोषणा के ज़रिये जनता को यह भरोसा दिलाना कि केंद्र सरकार उनके साथ खड़ी है और राज्य को पुनर्निर्माण की दिशा में ले जाएगी।
दूसरा, राजनीतिक तौर पर यह संदेश देना कि केंद्र मणिपुर को भूल नहीं गया है और शांति बहाली की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है, हालांकि आलोचक यह सवाल उठाते हैं कि जब जनता का बड़ा हिस्सा अब भी राहत शिविरों में रह रहा है, और विस्थापित परिवार घर वापसी को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, तब क्या विकास परियोजनाओं का शिलान्यास वास्तविक समस्याओं का हल है? मणिपुर की स्थिति बताती है कि केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति से समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए बहुआयामी रणनीति की ज़रूरत है। सबसे पहली प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होगी कि हथियारबंद गुटों की गतिविधियां पूरी तरह रोकी जाए। केंद्रीय बलों की तैनाती का उद्देश्य केवल नियंत्रण बनाए रखना नहीं, बल्कि लोगों में सुरक्षा की भावना पैदा करना होना चाहिए।
दोनों प्रमुख समुदायों के बीच संवाद की प्रक्रिया को संस्थागत रूप देना आवश्यक है। विशेषज्ञों के अनुसार, शांति वार्ता में सभी वर्गों—महिलाओं, युवाओं और नागरिक संगठनों को शामिल किया जाना चाहिए। विस्थापित परिवारों का पुनर्वास सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए। यदि, लोग अपने गावों में सुरक्षित वापसी नहीं कर पाते, तो राज्य में स्थायी शांति संभव नहीं है।राष्ट्रपति शासन स्थायी समाधान नहीं है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पुनः स्थापित करना ज़रूरी है। विधानसभा चुनाव या नए नेतृत्व पर सहमति की दिशा में तेज़ी लाना होगा। विकास परियोजनाएं तभी प्रभावी होंगी, जब उनका लाभ सभी समुदायों तक समान रूप से पहुंचे। यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी एक समुदाय को लाभान्वित करने की धारणा न बने।

कुल मिलाकर, मणिपुर आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां शांति की तलाश विकास से कहीं ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह केवल पहला कदम है। असली चुनौती है उस गहरे अविश्वास को खत्म करना, जिसने राज्य को बार-बार हिंसा की ओर धकेला है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर संवाद, पुनर्वास और निष्पक्ष प्रशासन पर ध्यान दें, तो मणिपुर फिर से अपने पुराने स्वरूप में लौट सकता है—वह स्वरूप जो सांस्कृतिक विविधता, एकता और शांति का प्रतीक रहा है। लेकिन यदि राजनीतिक अस्थिरता और सामुदायिक अविश्वास बना रहा, तो विकास परियोजनाओं के शिलान्यास भी केवल काग़ज़ी वादे साबित होंगे।

