मुफ्त वादों की राजनीति: विकास का रास्ता या वित्तीय बोझ?
देवानंद सिंह
देश की चुनावी राजनीति में आज लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल चाहे वह भारतीय जनता पार्टी हो, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, वाम दल या क्षेत्रीय दल चुनाव के समय अपने-अपने घोषणा पत्रों में आकर्षक और प्रत्यक्ष लाभ वाली योजनाओं की झड़ी लगा देते हैं। कहीं महिलाओं को मासिक सहायता देने का वादा होता है, कहीं बेरोजगार युवाओं को भत्ता, तो कहीं मुफ्त बिजली, पानी, लैपटॉप या अन्य सुविधाएं देने की घोषणा की जाती है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के ‘संकल्प पत्र’ में महिलाओं और युवाओं को 3,000 रुपये मासिक सहायता, घुसपैठ पर सख्ती और सातवें वेतन आयोग के गठन जैसे वादे इसी व्यापक चुनावी प्रवृत्ति का हिस्सा हैं।
पहला सवाल यही उठता है कि ये पैसे आखिर आते कहां से हैं? सरकार के पास अपना कोई निजी खजाना नहीं होता जो भी खर्च होता है, वह करदाताओं के पैसे, उधारी (ऋण), या अन्य राजस्व स्रोतों से आता है। ऐसे में जब राजनीतिक दल बड़े पैमाने पर नकद सहायता, मुफ्त बिजली-पानी, या अन्य सब्सिडी का वादा करते हैं, तो इसका सीधा असर राज्य की वित्तीय सेहत पर पड़ता है। कई राज्यों में पहले से ही राजकोषीय घाटा चिंता का विषय है। यदि बिना स्पष्ट वित्तीय योजना के ऐसे वादे लागू किए जाते हैं, तो आने वाले वर्षों में कर्ज का बोझ बढ़ सकता है।
दूसरा पहलू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का है। एक दल यदि 3,000 रुपये मासिक सहायता देने की घोषणा करता है, तो दूसरा दल उससे अधिक देने की कोशिश करता है। यह प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे “नीतिगत बहस” को पीछे धकेलकर “लोकलुभावन वादों” की दौड़ में बदल देती है। परिणामस्वरूप, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सृजन, औद्योगिक विकास जैसे दीर्घकालिक मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं।
हालांकि, यह भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि सभी प्रत्यक्ष लाभ योजनाओं को केवल “मुफ्तखोरी” कहकर खारिज कर दिया जाए। भारत जैसे देश में, जहां बड़ी आबादी अभी भी आर्थिक रूप से कमजोर है, सामाजिक सुरक्षा की जरूरत वास्तविक है। जन-धन, उज्ज्वला, मनरेगा, या खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाओं ने करोड़ों लोगों के जीवन स्तर को बेहतर किया है। इसलिए असली बहस “मुफ्त बनाम विकास” की नहीं, बल्कि “लक्षित और टिकाऊ सहायता बनाम अंधाधुंध वितरण” की होनी चाहिए।
पश्चिम बंगाल के संदर्भ में घुसपैठ, सीमा सुरक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे भी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। भाजपा का “डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट” का नारा इन चिंताओं को संबोधित करने की कोशिश है। वहीं, अन्य दल सामाजिक योजनाओं और क्षेत्रीय पहचान के मुद्दों पर जोर देते हैं। लेकिन अंततः मतदाता के सामने सवाल यह है कि कौन-सी नीति दीर्घकाल में राज्य के लिए अधिक फायदेमंद होगी।
बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी चुनावों के दौरान रोजगार, बेरोजगारी भत्ता, मुफ्त लैपटॉप, या नकद सहायता जैसे वादे बार-बार सामने आते हैं। केरल में सामाजिक कल्याण योजनाओं की मजबूत परंपरा है, जबकि असम और झारखंड में भी विभिन्न प्रकार की प्रत्यक्ष लाभ योजनाएं लागू हैं। इन सभी उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि यह एक राष्ट्रीय प्रवृत्ति बन चुकी है।
नीति-निर्धारकों के सामने चुनौती यह है कि वे संतुलन कैसे बनाएं। एक ओर गरीब और कमजोर वर्गों को तत्काल राहत देना जरूरी है, तो दूसरी ओर राज्य की आर्थिक स्थिरता और दीर्घकालिक विकास को भी सुनिश्चित करना उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि सारी ऊर्जा और संसाधन केवल नकद वितरण में लग जाएंगे, तो बुनियादी ढांचे, उद्योग, और रोजगार सृजन पर निवेश प्रभावित हो सकता है।
यहां आम जनता की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। मतदाताओं को केवल तात्कालिक लाभ के आधार पर निर्णय लेने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि कौन-सी नीतियां टिकाऊ हैं, कौन-सी योजनाएं वास्तव में उनके जीवन में स्थायी सुधार ला सकती हैं, और किस दल के पास स्पष्ट आर्थिक रोडमैप है। लोकतंत्र में जागरूक मतदाता ही संतुलित नीतियों को प्रोत्साहित कर सकता है।
चुनावी घोषणापत्र केवल वादों की सूची नहीं होना चाहिए, बल्कि एक जिम्मेदार आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण का दस्तावेज होना चाहिए। “सोनार बांग्ला” हो या “विकसित बिहार” या “समृद्ध उत्तर प्रदेश” इन सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जरूरी है कि वादे आकर्षक होने के साथ-साथ व्यावहारिक और वित्तीय रूप से टिकाऊ भी हों। तभी लोकतंत्र में विकास और कल्याण के बीच सही संतुलन स्थापित हो सकेगा।

