लेखक: महेन्द्र तिवारी
संसदीय गतिरोध आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। हालिया मानसून सत्र में इसकी भयावह तस्वीर देखने को मिली जब दोनों सदनों की उत्पादकता रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई।
संसदीय गतिरोध का लोकतंत्र पर प्रभाव
संसद लोकतंत्र का वह सर्वोच्च मंच है जहां देश की जनता से जुड़े प्रश्नों पर विचार होता है, सरकार से जवाब मांगा जाता है और कानून बनाए जाते हैं। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसी विश्वास के साथ संसद भेजती है कि वे उसके हितों की आवाज उठाएंगे। ऐसे में संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित करना केवल सदन की कार्यवाही रोकना नहीं है, बल्कि करोड़ों नागरिकों की अपेक्षाओं को बाधित करना भी है।
मानसून सत्र में संसदीय गतिरोध का असर
हाल में समाप्त हुए संसद के मानसून सत्र ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चले इस सत्र में लोकसभा की उत्पादकता केवल 19 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत रही। संसद के दोनों सदनों में बार-बार हुए हंगामे और विरोध प्रदर्शन के कारण निर्धारित समय का बड़ा हिस्सा व्यर्थ चला गया। PRS Legislative Research के आंकड़े भी इस गिरावट की पुष्टि करते हैं।
विपक्ष का काम सरकार से प्रश्न पूछना, उसकी नीतियों की आलोचना करना और जनता से जुड़े विषयों को सदन में उठाना है। यह लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है। मजबूत विपक्ष के बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था अधूरी मानी जाएगी। लेकिन विरोध और अवरोध में अंतर है। सरकार को घेरने के लिए तथ्यपूर्ण बहस, प्रश्नकाल, प्रस्ताव और संसदीय समितियों जैसे अनेक प्रभावी माध्यम उपलब्ध हैं। इन माध्यमों का उपयोग करने के बजाय यदि सदन की कार्यवाही ही रोक दी जाए तो विरोध का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
इस सत्र में विपक्ष ने कई गंभीर विषयों को उठाने की मांग की। सरकार की नीतियों, युवाओं से जुड़े प्रश्नों और विभिन्न विवादित मुद्दों पर चर्चा की मांग लोकतांत्रिक दृष्टि से स्वाभाविक थी। लेकिन जब नारेबाजी और लगातार शोर के कारण सदन की कार्यवाही स्थगित होती है, तब मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है। संसद में जिस विषय पर देश को गंभीर चर्चा सुननी चाहिए, उसकी जगह केवल राजनीतिक टकराव दिखाई देता है।
जनता के धन और विश्वास का नुकसान
इस स्थिति का सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है। संसद की बैठक पर होने वाला खर्च करदाताओं के धन से होता है। सांसदों को देश की जनता ने अपने प्रतिनिधि के रूप में चुना है। इसलिए संसद का प्रत्येक मिनट सार्वजनिक धन और जनविश्वास से जुड़ा हुआ है। जब निर्धारित समय का उपयोग बहस और विचार के बजाय व्यवधान में चला जाता है, तब जनता के धन के साथ उसके लोकतांत्रिक अधिकार का भी नुकसान होता है।
यहां यह कहना भी उचित होगा कि संसद को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी केवल विपक्ष की नहीं है। सत्ता पक्ष को भी विपक्ष की बात सुनने, उचित विषयों पर चर्चा कराने और राजनीतिक सहमति का वातावरण बनाने का प्रयास करना चाहिए। लोकतंत्र केवल बहुमत से निर्णय लेने का नाम नहीं है। लोकतंत्र में असहमति को सुनना और उसका सम्मान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसलिए संसद में व्यवधान के लिए विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाना उचित है, लेकिन सत्ता पक्ष की संवाद संबंधी जिम्मेदारी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बिना बहस पारित हुए 12 विधेयक
सबसे चिंताजनक बात यह है कि कम चर्चा के बीच विधेयकों के पारित होने की स्थिति बनी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार इस सत्र में 12 विधेयक पारित हुए, जबकि संसद की कार्यवाही अपेक्षाकृत बहुत कम चली। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कानून बनाने की प्रक्रिया में पर्याप्त विचार विमर्श और जनहित के विभिन्न पक्षों को कितना स्थान मिल पाया।
संसद बहस का स्थान है, रणभूमि का नहीं। सरकार को अपनी बात रखने का अधिकार है तो विपक्ष को सवाल पूछने का। दोनों के बीच मतभेद होना लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन मतभेद को गतिरोध में बदल देना लोकतंत्र की शक्ति को कमजोर करता है। जनता अपने प्रतिनिधियों से शोर नहीं, समाधान चाहती है। वह चाहती है कि उसके प्रश्न संसद में उठें, सरकार जवाब दे और देश के भविष्य से जुड़े कानूनों पर गंभीरता से विचार हो।
इसलिए विपक्ष को यह आत्ममंथन करना चाहिए कि संसद को बार-बार रोकने से क्या वास्तव में उसके राजनीतिक उद्देश्य पूरे होते हैं। सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विपक्ष को अपनी बात रखने के पर्याप्त अवसर मिलें। लोकतंत्र की गरिमा तभी बचेगी जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों यह समझें कि संसद किसी दल की नहीं, पूरे देश की है। संसद का समय किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं, जनता की अमानत है। इस अमानत का सम्मान करना सत्ता और विपक्ष दोनों का समान दायित्व है।

