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    Home » महाराष्ट्र में भाषा पर टकराव की राजनीति और फडणवीस सरकार के निर्णय के मायने
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    महाराष्ट्र में भाषा पर टकराव की राजनीति और फडणवीस सरकार के निर्णय के मायने

    News DeskBy News DeskJuly 5, 2025No Comments7 Mins Read
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    महाराष्ट्र में भाषा पर टकराव की राजनीति और फडणवीस सरकार के निर्णय के मायने
    देवानंद सिंह
    महाराष्ट्र की राजनीति में भाषा हमेशा से एक संवेदनशील और सशक्त उपकरण रही है। हालिया घटनाक्रम में एक बार फिर यह साफ़ हो गया, जब राज्य की फडणवीस सरकार को स्कूलों में हिंदी भाषा की पढ़ाई को अनिवार्य बनाने के अपने फैसले से पीछे हटना पड़ा। यह निर्णय केवल शैक्षिक नीतियों से जुड़ा नहीं था, बल्कि इसके पीछे राज्य की सामाजिक संरचना, क्षेत्रीय अस्मिता, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और बढ़ती भाषाई विविधता जैसे अनेक कारक थे, जो इस मसले को तूल देने में निर्णायक साबित हुए।

     

    फडणवीस सरकार का यह कदम शुरू में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ जैसे राष्ट्रीय एजेंडों की प्रतिध्वनि जैसा प्रतीत हुआ, लेकिन महाराष्ट्र जैसे राज्य में, जहां भाषाई अस्मिता का सवाल लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का केंद्र रहा है, यह फैसला राजनीतिक रूप से आत्मघाती सिद्ध हुआ। परिणामस्वरूप, दबाव में आकर सरकार को अपना कदम वापस लेना पड़ा।

    महाराष्ट्र की राजनीति में क्षेत्रीय अस्मिता एक निर्णायक तत्व रही है, खासकर मराठी अस्मिता के नाम पर। शिवसेना की स्थापना बाल ठाकरे ने इसी मुद्दे को केंद्र में रखकर की थी। 1960 के दशक में पार्टी का मुख्य स्वर हिंदीभाषियों और दक्षिण भारतीयों के कथित वर्चस्व के विरुद्ध था। बाल ठाकरे के राजनीतिक उदय का आधार ही यह चिंता थी कि मुंबई में मराठी भाषियों का आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व कमजोर हो रहा है।

     

    हिंदी भाषा और हिंदीभाषी प्रवासी वर्ग के विरुद्ध आक्रोश एक रणनीतिक अस्त्र बनकर उभरा था। शिवसेना ने ‘मराठी मानुष’ के हितों की रक्षा के नाम पर अपने सामाजिक आधार का विस्तार किया। मुंबई जैसे महानगर में जहाँ बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश से बड़ी संख्या में प्रवासी आकर बसते रहे, वहां यह विमर्श और तीव्र हो गया।

    महाराष्ट्र के शहरी इलाकों में हिंदीभाषियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। 2001 की जनगणना में मुंबई में हिंदीभाषियों की संख्या 25.9% थी, जो 2011 में 30.2% हो गई। दूसरी ओर मराठी भाषियों की संख्या इसी अवधि में 42.9% से घटकर 41% हो गई। राज्य स्तर पर भी मराठी भाषियों की हिस्सेदारी 76% से घटकर 73.4% हो गई, जबकि हिंदीभाषियों का अनुपात 7.3% से बढ़कर 9.5% हो गया।

     

    यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरणों का भी परिचायक है। बढ़ती हिंदीभाषी आबादी न केवल रोजगार के अवसरों की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाती है, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व और पहचान के सवाल भी खड़े करती है। यही कारण है कि जब फडणवीस सरकार ने स्कूलों में हिंदी भाषा को लेकर नई नीति की घोषणा की, तो यह फैसला मराठी अस्मिता पर आघात के रूप में देखा गया। फडणवीस सरकार द्वारा स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने की मंशा को शुरू में राष्ट्रीय एकता और समरसता के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया। राज्य शिक्षा विभाग की ओर से जो प्रारूप सामने आया था, उसमें कहा गया था कि कक्षा 1 से 10 तक हिंदी की पढ़ाई सुनिश्चित की जाए, जिससे विद्यार्थी राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।

     

    हालांकि, इस फैसले के पीछे अकादमिक चिंताओं से ज़्यादा राजनीतिक संकेत छिपे थे। यह फैसला हिंदीभाषी मतदाताओं को साधने की कोशिश के रूप में देखा गया। विशेष रूप से मुंबई, ठाणे, नासिक, नागपुर और पुणे जैसे शहरी क्षेत्रों में जहां हिंदीभाषियों का मतदाता प्रभाव बढ़ रहा है, वहां यह निर्णय एक संदेश देने का माध्यम था।
    फैसले की घोषणा के बाद विपक्षी दलों ने जिस आक्रामकता से प्रतिक्रिया दी, उसने पूरे घटनाक्रम की दिशा ही बदल दी। कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना (उद्धव गुट) ने इसे हिंदी थोपने की साजिश करार दिया। इस विरोध को एक अतिरिक्त धार तब मिली जब मनसे प्रमुख राज ठाकरे, जो प्रायः भाजपा के करीबी माने जाते हैं, ने भी सरकार के निर्णय की आलोचना कर दी।

    शिवसेना के लिए यह मुद्दा अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन दोबारा हासिल करने का अवसर बन गया। उद्धव ठाकरे ने इसे मराठी भाषा पर हमला बताते हुए जनभावनाओं को भड़काया। एनसीपी के शरद पवार ने इस कदम को संघ की एक सांस्कृतिक रणनीति करार दिया। स्थिति तब और जटिल हो गई, जब खुद सरकार में सहयोगी दलों अजित पवार और एकनाथ शिंदे ने भी इस फैसले पर असहमति जताई।

     

    महाराष्ट्र के शहरी क्षेत्रों में हिंदीभाषी मतदाताओं का असर बढ़ रहा है, लेकिन ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में अब भी मराठीभाषी समुदाय बहुसंख्यक है और सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथ में है। इस द्वैधता ने भाजपा को एक विचित्र स्थिति में खड़ा कर दिया। एक ओर वह राष्ट्रव्यापी हिंदी समर्थक एजेंडे को साधना चाहती थी, तो दूसरी ओर उसे मराठी अस्मिता को भी संतुष्ट रखना था।

    मॉनसून सत्र के करीब आने और विपक्ष द्वारा इसे प्रमुख मुद्दा बनाए जाने की आशंका से सरकार को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा। जिस तरह से यह मुद्दा मराठी विरुद्ध हिंदी के रूप में स्थापित होने लगा था, उसने भाजपा के क्षेत्रीय नेतृत्व को विचलित कर दिया। यही कारण है कि सरकार ने न केवल कदम पीछे खींचा, बल्कि निर्णय की भाषा को भी वैकल्पिक और प्रोत्साहनात्मक बना दिया।

     

    इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर भारत में भाषाई संघीयता बनाम भाषाई प्रभुत्व के प्रश्न को चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है, और भारत की भाषिक विविधता उसकी सांस्कृतिक शक्ति है, किन्तु जब एक भाषा को राष्ट्रीय भाषा के नाम पर अन्य भाषाओं पर प्राथमिकता दी जाती है, तो यह विविधता संकट में पड़ जाती है।

    भाजपा पर अकसर यह आरोप लगता रहा है कि वह हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के अपने दीर्घकालिक सांस्कृतिक एजेंडे के तहत विभिन्न राज्यों में हिंदी को बढ़ावा देने की कोशिश करती है। तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल की तरह अब महाराष्ट्र भी इस विमर्श की अगली प्रयोगशाला बन गया था। शिक्षा नीति का निर्माण तटस्थ, वैज्ञानिक और समावेशी दृष्टिकोण से होना चाहिए। जब भाषाओं के चयन, पाठ्यक्रम के निर्माण और शिक्षकों की नियुक्ति में राजनीतिक समीकरण हावी हो जाते हैं, तब शिक्षा एक समावेशी साधन से अधिक एक विभाजनकारी औजार बन जाती है। फडणवीस सरकार का यह कदम इसी प्रवृत्ति का उदाहरण था, जिसमें शिक्षा नीति को राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति का साधन बना दिया गया।

     

    भले ही सरकार ने अपने फैसले को वापिस ले लिया हो, लेकिन यह महज़ एक प्रशासनिक पराजय नहीं बल्कि एक राजनीतिक चेतावनी भी है। यह घटना यह दर्शाती है कि भारत जैसे संघीय लोकतंत्र में कोई भी नीति जो स्थानीय अस्मिता और भाषाई पहचान को दरकिनार करके लागू की जाएगी, वह जनस्वीकृति नहीं पा सकती।

    इससे महाराष्ट्र भाजपा को यह भी सबक मिला कि वह राज्य की ऐतिहासिक, भाषाई और सामाजिक संरचना को नज़रअंदाज़ करके कोई नीति नहीं बना सकती। उसे यह समझना होगा कि डबल इंजन सरकार का मॉडल तभी सफल हो सकता है, जब उसमें स्थानीय विशिष्टताओं का सम्मान और समावेश हो। कुल मिलाकर, महाराष्ट्र में हिंदी बनाम मराठी की ताज़ा राजनीतिक लड़ाई ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और राजनीतिक अधिकार का भी प्रतीक है। हिंदी को लेकर कोई भी केंद्रीय नीति तभी सफल हो सकती है जब वह स्थानीय भाषाओं और संस्कृति को समुचित सम्मान और स्थान दे।

    फडणवीस सरकार की वापसी एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन यह भी आवश्यक है कि आने वाले समय में शिक्षा नीतियों को क्षेत्रीय विविधताओं, भाषाई अस्मिता और लोकतांत्रिक सहमति के आधार पर ही निर्मित किया जाए। अन्यथा, इस प्रकार की रस्साकशी बार-बार राष्ट्रीय एकता के ताने-बाने को कमजोर करती रहेगी। अब समय आ गया है कि भारत की राजनीतिक दल भाषा को वोट बैंक या अस्मिता के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय उसे सामाजिक समरसता और विविधता के पुल के रूप में देखें। शिक्षा नीति को राजनीतिक लाठी की बजाय राष्ट्र निर्माण के औजार के रूप में अपनाया जाए, ताकि भाषा एक विवाद नहीं बल्कि संवाद का माध्यम बने। महाराष्ट्र का यह अनुभव पूरे देश के लिए एक सबक होना चाहिए।

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