लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
आस्था का प्रतीक और पर्यटकों की पहली पसंद **रकिणी मंदिर** आज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। यहां **19 करोड़ रुपये** की विकास योजनाओं को **ग्रामसभा** की अनुमति के बिना शुरू कर दिया गया है, जो सीधे तौर पर **PESA कानून** का घोर उल्लंघन है। आरोप है कि ठेकेदार की मनमानी और वन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी धन का बंदरबाट किया जा रहा है। यह मामला आदिवासी अधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना का एक स्पष्ट उदाहरण है।
झारखंड के जादूगोड़ा में स्थित यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदायों की संस्कृति और पहचान से भी गहरा जुड़ा हुआ है। **PESA कानून**, यानी पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996, का उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में **ग्रामसभा** को सशक्त बनाना है, ताकि वे अपने संसाधनों और विकास कार्यों पर नियंत्रण रख सकें। इस कानून के तहत, किसी भी विकास परियोजना को शुरू करने से पहले **ग्रामसभा** की सहमति अनिवार्य है।
PESA कानून की धज्जियां, ग्रामसभा को अंधेरे में रखा
**रकिणी मंदिर** परिसर पांचवी अनुसूची क्षेत्र में आता है। संविधान के अनुसार यहां किसी भी विकास कार्य से पहले **ग्रामसभा** की सहमति अनिवार्य है। लेकिन यहां उल्टा हुआ, जिससे स्थानीय ग्रामीणों में भारी रोष व्याप्त है। नियमों को ताक पर रखकर मनमाने ढंग से निर्माण कार्य शुरू किए गए हैं। यह सीधे तौर पर **ग्रामसभा** की अनदेखी है, जो आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की नींव होती है।
ग्रामीणों के अनुसार मंदिर में **धूमकुड़िया भवन**, **दृष्ट्या पहाड़ पर व्यू प्वाइंट**, **विशाल पार्किंग**, **धार्मिक ट्रस्ट गठन** और अन्य निर्माण बिना किसी सूचना के शुरू कर दिए गए। यह कार्रवाई स्थानीय समुदाय के अधिकारों का हनन है। **PESA कानून** विशेष रूप से इन क्षेत्रों में स्वशासन को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था, लेकिन इसकी भावना को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है।
मामला इतना गंभीर हो गया है कि बुधवार को **पोटका प्रखंड कल्याण पदाधिकारी रोहिणी बेड़ा** और **BDO इसराइल** को खुद गांव पहुंचकर ग्रामीणों का गुस्सा शांत करना पड़ा। यह प्रशासनिक हस्तक्षेप इस बात का संकेत है कि स्थिति कितनी विस्फोटक हो चुकी थी। ग्रामीणों ने अपनी आवाज बुलंद की और न्याय की मांग की।
ग्राम के माझी-बाबा **राजा सोरेन** के नेतृत्व में ग्रामीण पहले ही **पूर्वी सिंहभूम के डीसी** को लिखित शिकायत दे चुके हैं। ग्रामीण महिला **सावित्री हांसदा**, **सुनीता सोरेन** और **थानो सोरेन** का कहना है, “हम विकास के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन हमारी जमीन, जंगल और आस्था से खिलवाड़ नहीं होने देंगे।” उनका यह कथन **PESA कानून** की मूल भावना को दर्शाता है, जिसके तहत आदिवासियों को अपने क्षेत्र में होने वाले किसी भी विकास कार्य पर वीटो का अधिकार होता है।
ठेकेदार की लापरवाही + वन विभाग की चुप्पी = बड़ा घोटाला
ग्रामीणों ने ठेकेदार और वन विभाग पर सीधे मिलीभगत का आरोप लगाया है। यह आरोप बहुत गंभीर है और इसकी गहन जांच आवश्यक है। भ्रष्टाचार की यह परत-दर-परत कहानी स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाती है।
1. घटिया निर्माण, सरकारी पैसा बर्बाद
निर्माण में मानक को ताक पर रख दिया गया है। सीमेंट, बालू, ईंट सब घटिया क्वालिटी के लगाए जा रहे हैं। मंदिर की चोटी तक जाने वाली सीढ़ियां इतनी पतली बना दी गई हैं कि कोई भी हादसा हो सकता है। जगह-जगह लगी लोहे की रेलिंग और पार्क के गेट में काम शुरू होते ही जंग लग गई। नींव भी तय मानक से कम गहरी डाली गई है। यह सब **19 करोड़ रुपये** के सार्वजनिक धन का सीधा दुरुपयोग है।
2. काम की गति कछुए जैसी
**19 करोड़** की योजना को शुरू हुए कई महीने बीत गए, लेकिन साइट पर मजदूर नदारद रहते हैं। पार्किंग स्थल पूरी तरह दलदल में तब्दील हो चुका है। चारों तरफ निर्माण सामग्री और गंदगी का अंबार लगा है। काम आधा-अधूरा पड़ा है, जिससे पूरी परियोजना की सफलता पर संदेह पैदा होता है। गुणवत्ताहीन और धीमी गति से चल रहे कार्य ने ग्रामीणों के संदेह को और गहरा कर दिया है।
3. वन विभाग बना मूकदर्शक
सबसे बड़ा सवाल वन विभाग पर है। मंदिर परिसर **किला प्रवाही रेंज** के वन क्षेत्र से सटा हुआ है। नियम के अनुसार यहां बिना NOC एक ईंट भी नहीं लग सकती। लेकिन विभाग के अधिकारी सिर्फ कागजों पर खानापूर्ति कर रहे हैं। आरोप है कि ठेकेदार को बचाने के लिए फाइलें दबाई जा रही हैं। यह वन विभाग की मिलीभगत का स्पष्ट संकेत है और **PESA कानून** के तहत वन अधिकारों की रक्षा करने की उनकी जिम्मेदारी की उपेक्षा है। अधिक जानकारी के लिए, आप PESA अधिनियम के बारे में पढ़ सकते हैं।
प्रशासन ने मानी गलती, जांच के आदेश
ग्रामीणों की नाराजगी देखकर प्रशासन को झुकना पड़ा। प्रखंड कल्याण पदाधिकारी **रोहिणी बेड़ा** ने मौके पर कहा कि “पांचवी अनुसूची क्षेत्र में **ग्रामसभा** की सहमति के बिना एक भी योजना नहीं चल सकती। मामले की निष्पक्ष जांच होगी। गुणवत्ता और प्रगति दोनों की जांच कराई जाएगी। रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेजकर दोषियों पर कार्रवाई की सिफारिश की जाएगी।” यह आश्वासन ग्रामीणों के आंदोलन का परिणाम है।
ग्रामीणों ने रखीं 3 कड़ी मांगें
ग्रामीणों ने अपनी तीन प्रमुख मांगें रखी हैं, जो इस पूरे मामले की गंभीरता को दर्शाती हैं:
- **1. 19 करोड़ की पूरी योजना की उच्च स्तरीय और SIT जांच हो।**
- **2. ग्रामसभा की अनुमति के बिना सभी कामों पर तत्काल रोक लगे।**
- **3. ठेकेदार की लापरवाही और वन विभाग के संलिप्त अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज हो।**
इन मांगों से स्पष्ट है कि ग्रामीण केवल निर्माण की गुणवत्ता से ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रियाओं के उल्लंघन से भी चिंतित हैं। वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं, और **PESA कानून** उन्हें यह अधिकार देता है।
क्या कहते हैं जानकार
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि “अगर आदिवासी बहुल इलाकों में इसी तरह बिना **ग्रामसभा** के काम होते रहे, तो विकास के नाम पर सिर्फ लूट होगी।” कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने भी **जिला उपायुक्त** से लिखित शिकायत कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। मंदिर कमेटी के सदस्य भी निर्माण की गुणवत्ता से नाराज हैं। यह व्यापक असंतोष दर्शाता है कि समस्या कितनी गहरी है।
**रकिणी मंदिर** का मामला अब सिर्फ निर्माण का नहीं रहा। यह आदिवासी अधिकार, **PESA कानून** और सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला बन गया है। इस पूरे प्रकरण ने स्थानीय शासन-प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन जांच के नाम पर लीपापोती करता है या वाकई दोषियों पर गाज गिरती है और **PESA कानून** की मर्यादा को स्थापित किया जाता है। ग्रामीणों की आंखें अब प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं, उम्मीद है कि न्याय मिलेगा और उनके अधिकारों का सम्मान होगा।

