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    Home » पट्टीका ने बोला झूठ: राजनगर में कागज पर सड़क, जमीन पर नाला
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    पट्टीका ने बोला झूठ: राजनगर में कागज पर सड़क, जमीन पर नाला

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 23, 2026Updated:August 23, 2026No Comments4 Mins Read
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    पट्टीका
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    लेखक: प्रदीप कुमार नायक

    पट्टीका का वादा और हकीकत

    मधुबनी जिले के राजनगर गांधी चौक से जब आप पूरब की तरफ लाइब्रेरी के गेट पर बढ़ते हैं तो एक पट्टीका दिखती है। नई, चमकदार, सरकारी नीले रंग की। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है कि यहां पी.सी.सी. सड़क और नाला बनेगा। राशि भी लिखी है – आठ लाख छियानवे हजार तीन सौ छह रुपये। नीचे अनुशंसाकर्ता का नाम, प्रमुख का नाम, मुखिया का नाम। सब कुछ इतना व्यवस्थित कि देखने वाले को लगे विकास आ गया।

    लेकिन पट्टीका से दस कदम आगे बढ़िए तो हकीकत सामने खड़ी मिलती है। सड़क नहीं है। वही पुरानी कच्ची पगडंडी है जिसमें बरसात में कीचड़ और गर्मी में धूल। और नाला? नाला उस जगह बना दिया गया है जिसका जिक्र तक पट्टीका में नहीं है – पुस्तकालय के प्रांगण में। जहां बच्चों को पढ़ना चाहिए वहां गंदा पानी रुकेगा।

    विकास की त्रासदी

    यही हमारे विकास की सबसे बड़ी त्रासदी है। योजना कागज पर एक जगह की बनती है और पैसा दूसरी जगह खर्च हो जाता है। किसी को पूछने वाला नहीं। किसी को जवाब देने वाला नहीं।

    षष्ठम् राज्य वित्त आयोग की योजना

    षष्ठम् राज्य वित्त आयोग का पैसा सीधे पंचायतों के लिए आता है। सोच ये थी कि गांव की जरूरत गांव वाले खुद तय करेंगे। पुस्तकालय के पीछे तक सड़क इसलिए जरूरी थी क्योंकि वहां से रोज सैकड़ों लोग गुजरते हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं, मरीज अस्पताल, किसान मंडी। बरसात में वहां पानी भर जाता है। इसलिए सड़क के साथ नाले की मांग भी थी। योजना बनी, राशि स्वीकृत हुई, पट्टीका लग गई। फिर क्या हुआ?

    हुआ वही जो अक्सर होता है। ठेकेदार को लगा लाइब्रेरी के पीछे काम करने में मिट्टी काटनी पड़ेगी, नाप-जोख का झंझट होगा। पंचायत भवन में बैठे मुंशी को लगा प्रांगण में नाला बना देंगे तो मापी आसान हो जाएगी। किसी ने आवाज नहीं उठाई क्योंकि सबको हिस्सा चाहिए। और जनता? जनता को पता भी नहीं चला कि उसके नाम पर स्वीकृत सड़क कहीं और बिक गई।

    गलत जगह बन रहा नाला

    अब कुछ दिनों से लाइब्रेरी के पीछे में नाला बन रहा है। ईंट-गारा जुड़ रहा है। मजदूर काम कर रहे हैं। देखने में लगेगा विकास हो रहा है। लेकिन ये विकास नहीं है, ये गबन है। सरकारी राशि का दुरुपयोग है। पट्टीका झूठ बोल रही है और काम झूठ को सच बना रहा है।

    सब मिले हुए हैं

    सबसे दुख की बात ये है कि इस खेल में सब शामिल हैं। अनुशंसा करने वाले को पता है, पास करने वाले को पता है, बनाने वाले को पता है, और देखने वाले अफसर को भी पता है। फिर भी फाइल आगे बढ़ती जाती है। क्योंकि सिस्टम को शिकायत से डर नहीं लगता। उसे लगता है कोई RTI नहीं लगाएगा, कोई BDO के पास नहीं जाएगा, कोई DM को पत्र नहीं लिखेगा। और अगर लिख भी दिया तो “जांच कर रहे हैं” कहकर मामला ठंडा कर दिया जाएगा।

    इस बार फर्क है

    लेकिन इस बार फर्क है। पट्टीका का फोटो है। गलत जगह बनते नाले का वीडियो है। और सबसे बड़ी बात – लोगों को अब समझ आ गया है कि चुप रहने से कुछ नहीं बदलता। जब तक हम सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक हर योजना की सड़क कागज पर ही रह जाएगी और नाला कहीं और बनता रहेगा।

    सिर्फ राजनगर की कहानी नहीं

    इस योजना के साथ जो हुआ वो सिर्फ राजनगर की कहानी नहीं है। ये हर उस गांव की कहानी है जहां विकास के नाम पर खानापूर्ति होती है। जहां राशि आती है, पट्टीका लगती है, फोटो खिंचती है और फिर सब भूल जाते हैं।

    सवाल पूछने की जरूरत

    अब जरूरत है सवाल पूछने की। BDO से पूछिए कि मापी-बुक में क्या लिखा है। पंचायत समिति से पूछिए कि कार्यादेश किसे दिया गया। जिलाधिकारी से पूछिए कि स्वीकृत जगह के बजाय दूसरी जगह काम क्यों हुआ। कागज मांगिए। जवाब मांगिए। क्योंकि आठ लाख छियानवे हजार रुपये जनता का पैसा है। वो किसी की जागीर नहीं।

    चुप्पी का नतीजा

    जब तक हम चुप रहेंगे, तब तक लाइब्रेरी की सड़क अधूरी रहेगी और लाइब्रेरी का प्रांगण नाले से भरता रहेगा। और पट्टीका पर लिखा विकास सिर्फ एक मजाक बनकर रह जाएगा।

    आवाज उठाइए

    आवाज उठाइए। क्योंकि “ये पब्लिक है, सब जानती है” – अब इसे साबित करने का समय आ गया है।

    पंचायत भ्रष्टाचार पट्टीका मधुबनी राजनगर विकास घोटाला
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