खेलों में भागीदारी भी आवश्यक है
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शिक्षा के बिना आज हमारा जीवन निरर्थक है। सच्चे अर्थों में ‘शिक्षा’ शब्द ही सबसे गहरा और महत्वपूर्ण है। शिक्षा के माध्यम से ही लोगों को अपार आनंद, उत्साह, उद्यम, जोश, जुनून आदि प्राप्त होती है। शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों के अध्ययन तक सीमित नहीं है। इसीलिए स्वामी विवेकानंद ने कहा था: ‘हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो चरित्र निर्माण करे, मानसिक शक्ति बढ़ाए, बुद्धि बढ़ाए और लोगों को अपने पैरों पर खड़ा होने में सक्षम बनाए।’
ध्यान से देखें, तो पाएंगे कि प्राचीन काल से ही खेलों को शिक्षण का प्रक्रिया का एक माध्यम माना जाता रहा है। प्राचीन शिक्षा पद्धति में गुरुओं की देखरेख में विभिन्न विषयों को खेलों के माध्यम से पढ़ाया जाता था। तैराकी और नौकायन जैसे खेलों के माध्यम से शिष्यों की इस विषय में दक्षता का आकलन किया जाता था।
स्कूल स्तर पर खेलों को दो श्रेणियों में बाँटा जाता है। पहला भीतरी खेल और दूसरा बाहरी खेल। भीतरी खेल वे खेल होते हैं जो घर के अंदर या खुले मंच पर खेले जाते हैं और बाहरी खेल वे खेल होते हैं जो मैदान में खेले जाते हैं।
आजकल, खेल-कुद को शिक्षा से अधिक जुड़ा जा रहा हैं। अगर आप कम उम्र से ही खेलों में रुचि विकसित कर लें, तो आप अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर खेलों के माध्यम से अपने जीवन को प्रतिष्ठित कर सकते हैं।
प्राय: खिलाड़ियों के लिए The greatest show on Earth नाम से प्रसिद्ध विश्व क्रीड़ाक्षेत्र का सबसे बड़ी प्रतियोगिता ओलंपिक में हिस्सा लेना एक अनोखा उपलब्धि साथ ही इसमें कोई पदक हासिल करना तो एक बड़ा सपना सा हैं । विश्व क्रीड़ाक्षेत्र में शक्तिशाली देशो के साथ प्रतिद्वंदिता करके उत्कृष्टता हासिल करते हुए स्वदेश के साथ स्वनाम को स्वर्ण अक्षर से लिपिबद्ध कराने के कोशिश में बहुतेरे खिलाड़ी द्वारा अपने केरियर की सर्वोत्तम खेल प्रदर्शन करते हुए दिखाई दिए हैं।
भारत के इतिहास में कई खिलाड़ी ओलंपिक में सफलता हासिल कर चुके हैं और देश का नाम रोशन कर चुके हैं। हालाँकि, हमारे राज्य के शिक्षण संस्थानों ने लगातार शैक्षणिक वर्ष शुरू करके छात्रों को खेलों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा है। लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सही रखने के लिए खेल एक महत्वपूर्ण विषय है और विशेष रूप से होना भी चाहिए। खेल खेलने से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली सक्रिय होती है और रक्त संचार में सुधार होता है। खेल मानसिक थकान को दूर कर सकते हैं और मन को प्रफुल्लित रख सकते हैं।
अनुशासन, सहनशीलता, आपसी समझ और परोपकार जैसे गुण हम खेल के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए, एक स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद की भी आवश्यक सुविधाएँ होनी चाहिए। माता-पिता या अभिभावकों को भी इस बारे में जागरूक होने की आवश्यकता है। बच्चों को प्रतिदिन एक-दो घंटे खेलकूद के लिए या खेल के मैदान में उनके साथ बिताने का समय अवश्य देना चाहिए। शिक्षकों और अभिभावकों को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। बचपन से ही खेलों में भाग लेने से ही आप आगे चलकर एक अच्छे खिलाड़ी बन सकते हैं। आजकल छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले प्रमुख कारकों में से एक है स्कूलों द्वारा लगाया जाने वाला अतिरिक्त शैक्षणिक बोझ। इसके अलावा, हम सभी को यह समझना चाहिए कि बच्चे को सुबह पाँच बजे घर से स्कूल के लिए ले जाने और शाम चार बजे घर छोड़ने के नियम ने बच्चे को शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुँचाया है। आजकल शिक्षा अंकों की होड़ बन गई है। शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य अब केवल फलप्राप्ति रह गया है। अंक-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था ने छात्रों के मन पर अंकों का दबाव डाल दिया है। वे छात्रों में छिपी प्रतिभा को गुप्त रूप से नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने छात्रों को वास्तविक जीवन से, खेलों से दूर कर दिया है और उनके मन को पीड़ा पहुँचाई है। बच्चे अपनी पीठ पर किताबों का भारी बोझ लादकर स्कूल आते हैं और छुट्टियों में होमवर्क का अतिरिक्त बोझ लेकर घर जाते हैं। इसके द्वारा एक स्वस्थ, सुसंस्कृत नागरिक का निर्माण नहीं किया जा सकता। इसलिए, शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सभी पक्षों को इस मुद्दे पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।
मनीषा शर्मा
पता-जालुकबारी
अनुवादक:– रितेश शर्मा
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