नीतिगत असफलताओं, नियामकीय ढिलाई और बाजार के असंतुलित ढांचे का परिणाम है इंडिगो संकट
देवानंद सिंह
भारत का उड्डयन क्षेत्र पिछले एक दशक में जितनी तेज़ी से बढ़ा है, उतनी ही तेज़ी से इसके भीतर की कमजोरियां भी उजागर होती जा रही हैं। देश के सबसे बड़े विमानन ऑपरेटर इंडिगो में हाल ही में आया व्यापक व्यवधान केवल एक एयरलाइन की समस्या नहीं, बल्कि एक पूरे तंत्र की नीतिगत असफलताओं, नियामकीय ढिलाई और बाजार के असंतुलित ढांचे का परिणाम है। पिछले कुछ दिनों में इंडिगो की सैकड़ों उड़ानें रद्द या अनिश्चित देरी की शिकार हुईं, जिसके कारण देश के कई प्रमुख एयरपोर्टों पर भारी अव्यवस्था फैल गई और लाखों यात्री प्रभावित हुए। स्थिति इतनी अधिक बिगड़ गई कि नागर विमानन महानिदेशालय को एयरलाइन के सीईओ पीटर एल्बर्स को नोटिस जारी कर हस्तक्षेप करना पड़ा। यह घटना भारत के विमानन क्षेत्र में बढ़ती निर्भरता और कमज़ोर प्रतिस्पर्धा के खतरों को एक बार फिर उजागर करती है।
इंडिगो ने इस संकट के लिए पायलटों की ड्यूटी टाइम लिमिटेशन यानी एफडीटीएल नियमों में बदलाव को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक जटिल है। पायलटों के आराम समय, उड़ान घंटों की सीमा और रात की उड़ानों पर लगाए गए प्रतिबंधों ने एयरलाइन के रोस्टर सिस्टम पर भारी दबाव डाला। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा अप्रैल 2025 में दिए गए आदेश के अनुसार ये नियम दो चरणों में लागू होने थे, जिनमें से कुछ एक जुलाई से लागू कर दिए गए थे और बाकी एक नवंबर से लागू हुए। एयरलाइंस को इन परिवर्तनों के अनुकूल अपने शेड्यूल, मानव संसाधन और ऑपरेशनल क्षमता को पुनर्गठित करना था, लेकिन यह प्रक्रिया समय रहते पूरी नहीं की जा सकी। नतीजा यह हुआ कि पायलटों की भारी कमी सामने आ गई और इसका सीधा असर उड़ानों की निरंतरता पर पड़ा।
हालांकि यह सिर्फ तकनीकी या मानव संसाधन की समस्या नहीं है। वर्षों से पायलटों में असंतोष उबाल करता रहा है। 13 घंटे से अधिक ड्यूटी, अपेक्षित वेतन वृद्धि में देरी, बढ़ते कार्यभार के बीच छूट न मिलना, और एयरलाइन द्वारा एफडीटीएल प्रावधानों की ‘अपने हित में’ व्याख्या जैसी शिकायतें लंबे समय से मौजूद थीं। जब नए मानक लागू हुए और एयरलाइन ने पायलटों से छुट्टियां रद्द करने या अतिरिक्त काम करने का अनुरोध किया, तो उन्होंने सहयोग से इंकार कर दिया। यह उस गुप्त असंतोष का सार्वजनिक विस्फोट था जिसे एयरलाइंस और नियामक वर्षों से अनदेखा कर रहे थे, लेकिन इंडिगो का संकट केवल आंतरिक असंतोष का परिणाम नहीं है। इसकी जड़ में उस बाजार संरचना की असंतुलित प्रकृति भी है जिससे भारत का विमानन क्षेत्र जूझ रहा है। आज घरेलू उड़ान बाजार में इंडिगो की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत से भी अधिक है, जो किसी भी स्वस्थ और प्रतिस्पर्धी बाजार के लिए बेहद चिंताजनक संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि जिस कंपनी का बाजार पर इतना बड़ा दबदबा हो, उसकी कार्यक्षमता में आई कोई भी गड़बड़ी पूरे सेक्टर की रीढ़ तोड़ सकती है। और यही पिछले कुछ दिनों में हुआ, इंडिगो की उड़ानें रद्द होने के साथ ही अन्य एयरलाइनों के किराए कई गुना बढ़ गए, यात्रियों को टिकट ही नहीं मिल पा रहा था, और एयरलाइंस का पूरा नेटवर्क तनाव में आ गया।
विमानन विश्लेषक हर्षवर्द्धन स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इंडिगो की मोनोपोली ने पूरे देश को एक तरह से बंधक बना दिया है, हालांकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि यह मोनोपोली किसी एक सरकार की देन नहीं बल्कि यूपीए से लेकर एनडीए सरकारों तक के नीतिगत निर्णयों का संयुक्त परिणाम है। 2000 और 2010 के दशक में भारत में जेट एयरवेज़, किंगफ़िशर, गो एयर, स्पाइसजेट और एयर इंडिया जैसी कंपनियां प्रतिस्पर्धा में थीं, लेकिन ईंधन की ऊँची कीमतें, टैक्सों का घना जाल, महंगे एयरपोर्ट शुल्क, विदेशी मुद्रा में होने वाले भुगतान और रुपये के अवमूल्यन ने धीरे-धीरे इन कंपनियों की आर्थिक सेहत को कमजोर किया। एक-एक करके सभी डूबती गईं और इंडिगो, जो अपनी कम लागत वाले मॉडल और कुशल संचालन के कारण टिक सकी, धीरे-धीरे बाजार की निर्विवाद नेता बनती गई।
सवाल यह है कि क्या सरकार इस मोनोपोलाइजेशन को रोकने के लिए कुछ कर सकती थी? विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में मोनोपोली रोकने के स्पष्ट नियम ही नहीं हैं। न तो कोई नीति बाजार हिस्सेदारी की अधिकतम सीमा तय करती है और न ही प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार द्वारा पर्याप्त प्रोत्साहन दिए जाते हैं। प्रतिस्पर्धा आयोग की कारवाईयां अक्सर औपचारिक हो कर रह जाती हैं और बाजार संतुलन को प्रभावित नहीं करतीं। इसके विपरीत, कई क्षेत्रों में सरकार की नीतियां बड़े खिलाड़ियों को ही और बड़े होने में सहायता करती दिखती हैं, चाहे वह एयरपोर्ट्स का निजीकरण हो, शिपिंग हो या हवाई सेवाएं।
नतीजा यह हुआ कि आज भारत की एकमात्र मजबूत एयरलाइन इंडिगो ही रह गई है, और उसी पर 65% घरेलू हवाई यात्रियों की निर्भरता है। यह स्थिति न सिर्फ जोखिमपूर्ण है, बल्कि अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरनाक है। भारत की विमानन इंडस्ट्री सालाना 10–12% की दर से बढ़ रही है, जो दुनिया की सबसे तेज़ वृद्धि दरों में से एक है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था में, जो वैश्विक व्यापार, निवेश और पर्यटन पर निर्भर है, यदि एक एयरलाइन की समस्या पूरे नेटवर्क को ठप कर दे, तो यह नीति निर्माण में गंभीर कमियों का संकेत है।
इस संकट ने भारत में उड्डयन की लागत संरचना की जटिलता को भी उजागर किया है। भारत में एटीएफ यानी एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर दुनिया में सबसे अधिक टैक्स लगाए जाते हैं। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो सरकार इसका बोझ एयरलाइंस पर डाल देती है, लेकिन कीमतें घटने पर भी टैक्स कम नहीं होते। एयरपोर्ट ऑपरेटर्स विभिन्न शुल्कों के नाम पर एयरलाइंस और यात्रियों दोनों से भारी रकम वसूलते हैं। जीएसटी, सर्विस चार्ज, डेवलपमेंट फीस, उपयोग शुल्क, इन सभी कारणों से भारत में विमानन व्यवसाय करना अत्यंत महंगा हो गया है। ऊपर से भारतीय रुपये की कीमत लगातार गिरने से विदेशी मुद्रा में होने वाले 60% परिचालन व्यय और महंगे हो जाते हैं।
इस तरह का लागत ढांचा निवेशकों को इस क्षेत्र से दूर करता है। यही वजह है कि नई एयरलाइंस भारत में टिक ही नहीं पातीं। यह स्थिति खुद सरकार की प्रगति योजनाओं के भी खिलाफ है, क्योंकि वह भारत को वैश्विक विमानन हब के रूप में उभरते देखना चाहती है, लेकिन जब बुनियादी ढांचा और नीति दोनों ही निवेश के अनुकूल न हों, तो ऐसा कोई भी लक्ष्य अधूरा ही रह जाता है। इंडिगो संकट ने यह भी दिखाया कि एकाधिकार के दौर में उपभोक्ता कितने असुरक्षित हो जाते हैं। जब एक कंपनी में तकनीकी या मानव संसाधन की कमी जैसी समस्या आती है, तो यात्रियों को कोई वैकल्पिक सेवा आसानी से उपलब्ध नहीं होती। टिकट दरें अनियंत्रित रूप से बढ़ जाती हैं और एयरलाइंस विकल्प के अभाव में बाजार का शोषण करने में सक्षम हो जाती हैं। इसी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सरकार को किरायों पर अस्थायी कैप लगाना पड़ा, जो यह दर्शाता है कि बाजार स्वयं संतुलन नहीं बना पा रहा था।
इस पूरी स्थिति से बाहर निकलने के लिए बड़े सुधारों की आवश्यकता है। विशेषज्ञ दो प्रमुख रास्ते सुझाते हैं। पहला, उड्डयन क्षेत्र के लागत ढांचे का तर्कसंगत निर्माण। एटीएफ को जीएसटी के दायरे में लाना, एयरपोर्ट ऑपरेटर्स के शुल्कों को नियंत्रित करना, और टैक्स संरचना में सुधार इस दिशा में निर्णायक कदम हो सकते हैं। दूसरा, बाजार हिस्सेदारी पर सीमा तय करना। किसी भी एयरलाइन को 30% से अधिक हिस्सेदारी नहीं लेने देना चाहिए। इससे प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी और कोई भी कंपनी इतने बड़े आकार की नहीं हो पाएगी कि उसके संकट से पूरा क्षेत्र चरमरा जाए।
साथ ही, सरकार को नए निवेश को आकर्षित करने के लिए माहौल बनाना होगा। यदि 2013 में इंडिगो की हिस्सेदारी 32% थी और आज यह 65% तक पहुंच गई है, तो यह इस बात का प्रमाण है कि अन्य कंपनियां टिक नहीं पा रही हैं। एफडीटीएल नियमों को लागू करते समय भी एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए था। पायलटों की सुरक्षा और आराम के लिए ये नियम अनिवार्य हैं, लेकिन इन्हें लागू करने के लिए चरणबद्ध रणनीति, पर्याप्त प्रशिक्षण, पायलटों की संख्या बढ़ाना और एयरलाइनों को सहयोग देने वाली स्पष्ट नीति आवश्यक थी, जो अनुपस्थित रही।
अंततः इंडिगो का यह संकट एक गंभीर चेतावनी है कि भारत के विमानन क्षेत्र को न केवल मजबूत नियमन की जरूरत है, बल्कि व्यापक पुनर्गठन की भी आवश्यकता है। यदि प्रतिस्पर्धा नहीं बढ़ेगी, लागत ढांचा सुधरेगा नहीं, और नीतियां निवेशकों के लिए अनुकूल नहीं बनेंगी, तो इसी तरह के संकट भविष्य में बार-बार सामने आएंगे।
भारत का उड्डयन क्षेत्र दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन यह वृद्धि तभी टिकाऊ होगी जब इसे सुदृढ़ नीति, संतुलित बाजार संरचना और मानव संसाधनों के सम्मान से समर्थन मिले। इंडिगो का संकट केवल एक एयरलाइन का संकट नहीं, यह पूरा सिस्टम हमें यह बताने की कोशिश कर रहा है कि यदि अभी सुधार नहीं हुए, तो कल स्थिति और भी गंभीर हो सकती है। देश की हवाई यात्रा, व्यापार, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और अर्थव्यवस्था के सुचारु प्रवाह के लिए अब यह अनिवार्य हो गया है कि उड्डयन क्षेत्र को नई दिशा दी जाए, जहां मोनोपोली नहीं, बल्कि संतुलित प्रतिस्पर्धा और मजबूत नीतियां उसकी नींव बनें।


