लेखक: देवानंद सिंह
बिहार में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक की खबर अब हैरान नहीं करती, बल्कि व्यवस्था की विफलता पर शर्मिंदा करती है। हर बार लाखों युवा मेहनत करते हैं, फीस भरते हैं, रात-दिन पढ़ते हैं और परीक्षा केंद्र तक पहुंचते हैं। दूसरी तरफ कोई गिरोह उनकी मेहनत को चंद रुपयों और करोड़ों के कारोबार में बदल देता है। इससे बड़ा अन्याय और क्या होगा?
संजीव मुखिया से पूछताछ में 2017 NEET, 2023 CSBC सिपाही भर्ती और TRE-3 शिक्षक भर्ती परीक्षा के पेपर लीक में भूमिका स्वीकार करने का दावा सामने आया है। यदि जांच में यह दावा प्रमाणित होता है, तो मामला किसी एक व्यक्ति का अपराध नहीं, बल्कि उस संगठित तंत्र की तस्वीर होगा जो प्रश्नपत्र को अभ्यर्थियों तक पहुंचने से पहले ही बाजार की वस्तु बना देता है।
पेपर लीक का संगठित तंत्र
लेकिन यहां असली सवाल संजीव मुखिया से भी बड़ा है। एक व्यक्ति प्रश्नपत्र तक पहुंचता कैसे है? प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर प्रिंटिंग, पैकिंग, परिवहन और परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की पूरी सुरक्षा व्यवस्था में सेंध कौन लगाता है? पेपर खरीदने वाले अभ्यर्थियों तक पहुंच कौन बनाता है? पैसे का हिसाब कौन रखता है? और इतने वर्षों से चल रहे इस खेल में बड़े चेहरे आखिर कहां हैं?
अगर जांच सिर्फ एक आरोपी के कथित कबूलनामे पर रुक गई तो फिर वही होगा जो अक्सर होता आया है—एक नाम सुर्खियों में आएगा, कुछ गिरफ्तारियां होंगी और कुछ समय बाद व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाएगी।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी पूछताछ में कथित स्वीकारोक्ति को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। आरोप और अपराध सिद्ध होने के बीच कानून की एक लंबी प्रक्रिया होती है। यही निष्पक्ष जांच की कसौटी भी है। खासकर तब, जब NEET-UG 2024 मामले में CBI जांच के दौरान संजीव मुखिया के खिलाफ प्रश्नपत्र चोरी अथवा अभ्यर्थियों तक पहुंचाने का पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने की बात सामने आ चुकी है।
इस विरोधाभास को भी जांच एजेंसियों को साफ करना होगा। जनता को यह जानने का अधिकार है कि किस मामले में क्या प्रमाण मिला, किस मामले में क्या आरोप है और किस मामले में जांच ने क्या निष्कर्ष दिया।
पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान सिर्फ परीक्षा रद्द होने या दोबारा परीक्षा कराने का नहीं होता। इसका नुकसान उस गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार को होता है जो अपने बच्चे की नौकरी की उम्मीद में वर्षों तक पैसा और समय लगाता है। एक पेपर लीक हजारों-लाखों युवाओं के भरोसे को लीक कर देता है।
इसलिए अब सरकार और जांच एजेंसियों के सामने असली परीक्षा है। क्या वे केवल पेपर लीक करने वाले को पकड़ेंगी या पेपर लीक कराने वाले पूरे सिस्टम को भी बेनकाब करेंगी?
जब तक प्रश्नपत्र की खरीद-बिक्री का पूरा आर्थिक नेटवर्क, अंदरूनी मददगार, बिचौलिये और संरक्षण देने वाले लोग सामने नहीं आते, तब तक हर गिरफ्तारी अधूरी कार्रवाई ही मानी जाएगी।
युवाओं को सिर्फ निष्पक्ष परीक्षा का आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि उनकी मेहनत किसी माफिया के हाथों बिकने नहीं दी जाएगी।
इस मामले की गहराई से जांच जरूरी है। अधिक जानकारी के लिए BBC हिंदी देखें।

