परिसीमन में ST आरक्षित सीटें घटाने का विरोध, आदिवासी अधिकारों की रक्षा का संकल्प
राष्ट्र संवाद संवाददाता
रांची। परिसीमन को लेकर रांची में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान में झारखंड के आदिवासी समाज के अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर आवाज बुलंद हुई। कांग्रेस नेता केशव महतो कमलेश ने कहा कि झारखंड की धरती उलगुलान और संघर्ष की धरती रही है। यहां के आदिवासी समाज ने जल, जंगल और जमीन के साथ अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए भी लंबे समय तक संघर्ष किया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को संविधान से मिले अधिकारों में किसी भी तरह की हकमारी कांग्रेस पार्टी बर्दाश्त नहीं करेगी।
केशव महतो कमलेश ने कहा कि संविधान निर्माण में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर, जयपाल सिंह मुंडा और देवेन्द्र नाथ समद जैसे नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संविधान में आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उनकी विशिष्ट पहचान की सुरक्षा के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। ऐसे में परिसीमन की प्रक्रिया के दौरान आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने मांग की कि वर्तमान में लोकसभा और विधानसभा में ST के लिए आरक्षित सीटों में किसी भी प्रकार की कमी नहीं की जाए। यदि परिसीमन के बाद कुल लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ती है तो ST के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जानी चाहिए। साथ ही परिसीमन में केवल जनसंख्या को आधार बनाने के बजाय झारखंड की सामाजिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखने की मांग की गई।
महाजुटान में पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों को विशेष महत्व देने, आदिवासी बहुल इलाकों की भौगोलिक एवं सामाजिक स्थिति, ऐतिहासिक विस्थापन और पलायन को भी परिसीमन के दौरान आधार बनाने की मांग उठी। वक्ताओं ने कहा कि सीटों के पुनर्गठन से आदिवासी समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व किसी भी स्थिति में कम नहीं होना चाहिए।
बिरसाइयत समाज ने भी दर्ज कराई मौजूदगी
महाजुटान में पश्चिमी सिंहभूम से भगवान बिरसा मुंडा के अनुयायी यानी बिरसाइयत समाज के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचे। देवगांव, बंदगांव, बड़की और बिरबा क्षेत्र से आए बिरसाइयत समाज के लोगों की पारंपरिक वेशभूषा और जीवनशैली लोगों के आकर्षण का केंद्र रही। दूर-दराज के जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों से पहुंचे इन लोगों ने परिसीमन के मुद्दे पर अपनी भागीदारी दर्ज कराते हुए आदिवासी अधिकारों, पहचान और अस्मिता की रक्षा के लिए एकजुट रहने का संदेश दिया। महाजुटान में उनकी मौजूदगी को आदिवासी समाज की व्यापक भागीदारी के रूप में देखा गया।

