दिशोम गुरु शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि: झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रविंद्र नाथ महतो की ओर से एक प्रेरणादायक श्रद्धांजलि कथा
निजाम खान ।राष्ट्र संवाद
झारखंड के महान नेता और आदिवासी समाज के मसीहा, दिशोम गुरु शिबू सोरेन के निधन की खबर ने पूरे राज्य और देश को शोक में डुबो दिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ट्विटर (एक्स) पर अपने शोक संदेश में लिखा, “आज मैं शून्य हो गया,” और इसी भावना को झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रविंद्र नाथ महतो ने भी अपने श्रद्धांजलि संदेश में व्यक्त किया। उन्होंने न केवल गुरुजी के प्रति अपनी भावनाएं प्रकट कीं, बल्कि उनके जीवन से मिली प्रेरणा को साझा करते हुए एक गहरी और सकारात्मक बाते बयां की।
रविंद्र नाथ महतो ने कहा, “गुरुजी हमारे लिए केवल एक राजनेता नहीं थे, वे हमारे पथप्रदर्शक, हमारे विचारों के स्रोत और संघर्ष की जीती-जागती मिसाल थे। मैंने राजनीति में प्रवेश ही उनकी प्रेरणा से किया।” वे याद करते हैं कि कैसे 80 के दशक में जब झारखंड राज्य का आंदोलन अपने चरम पर था, उस समय झारखंड के मसीहा के रूप में उन्होंने पहली बार शिबू सोरेन को एक जनसभा में बोलते सुना। उनके शब्दों में वह शक्ति थी, जो दिल को छू जाती थी और दिमाग को झकझोर देती थी।
महतो बताते हैं कि गुरुजी ने हमेशा समाज के वंचित, गरीब और विशेष रूप से आदिवासी समुदाय के हितों के लिए संघर्ष किया। चाहे वह संथाल परगना की भूमि हो या पलामू के जंगल, शिबू सोरेन ने हर मोर्चे पर आदिवासियों की आवाज को बुलंद किया। उन्होंने जमींदारी प्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ी, शोषण के विरुद्ध मोर्चा खोला और यह दिखाया कि नेतृत्व का असली अर्थ क्या होता है।
विधानसभा अध्यक्ष भावुक होते हुए कहते हैं, “गुरुजी के साथ आंदोलन के दिनों की स्मृतियाँ आज भी मेरी आंखों में ताजा हैं। जब हम गांव-गांव जाकर लोगों को झारखंड राज्य की आवश्यकता समझाते थे, तो गुरुजी का आत्मविश्वास और संकल्प हमें ऊर्जा देता था। उन्होंने कभी हार नहीं मानी।”
रविंद्र नाथ महतो ने यह भी बताया कि शिबू सोरेन का जीवन एक आदर्श है, जिससे नई पीढ़ी को सीख लेनी चाहिए। वे केवल भाषण नहीं देते थे, वे अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करते थे। उनकी सादगी, जमीन से जुड़ाव, और लोगों से आत्मीय संवाद करने की क्षमता उन्हें आम नेताओं से अलग बनाती थी। महतो ने कहा, “जब मैं पहली बार विधायक बना, तब गुरुजी ने मुझे व्यक्तिगत रूप से बुलाकर मार्गदर्शन दिया। उनका कहना था – ‘राजनीति सेवा है, अवसर नहीं।’ यही वाक्य मेरे लिए मंत्र बन गया।”
अंत में, महतो ने भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, “गुरुजी चले गए, लेकिन उनके विचार, उनके संघर्ष और उनकी शिक्षाएं हमारे साथ हमेशा रहेंगी। वे एक युग थे, एक आंदोलन थे और एक चेतना थे। उनके बिना हम अधूरे हैं, लेकिन उनके दिखाए रास्ते पर चलकर हम झारखंड के सपनों को पूरा करेंगे।”
गुरुजी का जाना सिर्फ एक नेता का निधन नहीं, बल्कि एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक युग का अंत है। लेकिन उनकी विरासत हम सब में जीवित रहेगी – यही उनकी सबसे बड़ी जीत है।

