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    काला घोड़ा’ का संरक्षण आउटडोर (वाह्य) मूर्तिशिल्प संरक्षण में एक मील का पत्थर

    Nizam KhanBy Nizam KhanJanuary 10, 2024Updated:January 10, 2024No Comments4 Mins Read
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    काला घोड़ा’ का संरक्षण आउटडोर (वाह्य) मूर्तिशिल्प संरक्षण में एक मील का पत्थर
    वडोदरा, गुजरात।
    गुजरात का वडोदरा शहर एक महत्वपूर्ण अवसर का साक्षी बना, जब सयाजी बाग के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य पर माननीय महापौर और नगर आयुक्त की उपस्थिति में वडोदरा शहर की एक ऐतिहासिक मूर्ति ‘काला घोड़ा’ का संरक्षण (कंजर्वेशन) के बाद लोकार्पण किया गया। यह काम इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के संरक्षण प्रभाग और क्षेत्रीय केंद्र वडोदरा की टीम के महीनों के परिश्रम का परिणाम है। यह जानकरी आईजीएनसीए के मीडिया सेंटर के नियंत्रक श्री अनुराग पुनेठा ने दी।
    आईजीएनसीए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का एक स्वायत्त निकाय है, जो भारत के सांस्कृतिक मानचित्र में अपने योगदान के लिए जाना जाता है, चाहे वह नए संसद भवन के लिए कला दीर्घा की स्थापना हो या भारत मंडपम् के सामने भगवान नटराज की अष्टधातु की मूर्ति स्थापित करना हो। इस संगठन के वर्तमान सदस्य सचिव प्रसिद्ध लेखक, पत्रकार और संस्कृतिकर्मी डॉ. सच्चिदानंद जोशी हैं।
    आईजीएनसीए के 9 क्षेत्रीय केंद्रों में से एक वडोदरा में स्थित है। यह क्षेत्रीय केंद्र नया होने के बावजूद, लगातार अपने क्षेत्र में और उसके आसपास सार्थक परियोजनाओं में जुटा हुआ है। इस परियोजना का क्रियान्वयन आईजीएनसीए ने वडोदरा नगर निगम के सहयोग से किया है।
    काला घोड़ा अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की शहर की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह परियोजना अपनी तरह की पहली परियोजना है, जो भारत में आउटडोर (वाह्य) मूर्तियों के संरक्षण में एक महत्वपूर्ण सफलता है।
    आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने इस अभूतपूर्व पहल को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी दूरदर्शिता और समर्थन ने काला घोड़ा के संरक्षण के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस परियोजना ने भविष्य के संरक्षण प्रयासों के लिए एक मानदंड स्थापित किया है।
    आईजीएनसीए संरक्षण प्रभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अचल पंड्या ने कहा, “काला घोड़ा को यथार्थ में परिणत करने में अमूल्य योगदान देने के लिए हम डॉ. सच्चिदानंद जोशी के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। उनके नेतृत्व और संस्कृति के प्रति प्रतिबद्धता ने हमारी टीम के लिए इस अभूतपूर्व उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त किया है।” गौरतलब है कि पूरे प्रोजेक्ट का नेतृत्व प्रोफेसर अचल पंड्या और भारत के प्रसिद्ध संरक्षक डॉ. संजय धर ने किया।
    आईजीएनसीए की वडोदरा की क्षेत्रीय निदेशक सुश्री अरूपा लाहिड़ी और उनकी समर्पित टीम ने संरक्षण प्रभाग के साथ मिलकर इस मूर्ति की पहचान करने में अभिन्न भूमिका निभाई, जो एक ऐसी समस्या से पीड़ित थी, जिसे ‘धातु का कैंसर’ कहा जा सकता है। वडोदरा नगर निगम और इसके वर्तमान आयुक्त श्री दिलीप राणा (आईएएस) द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई से आगे की क्षति को रोका जा सका। यह मूर्ति मूल रूप से 1907 में महाराजा सयाजी राव गायकवाड के शासनकाल के रजत जयंती समारोह के अवसर पर वडोदरा के लोगों द्वारा बनवाई गई थी। ‘जनता के राजा’ के राजा के रूप में विख्यात महाराजा सयाजीराव गायकवाड की इस मूर्ति का निर्माण प्रसिद्ध ब्रिटिश शिल्पकार फ्रांसिस डेरवेंट वुड ने किया था और उस समय इसकी कीमत 60,000 रुपये थी।
    मूल पेटिना के क्षरण के कारण की पहचान करने और उसके पुनर्विकास के लिए अनुसंधान करने में कई महीने का समय लगा। इस अध्ययन के नतीजे कई वाह्य (आउटडोर) संरक्षण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं, जिसकी आज भारत में आवश्यकता है।
    काला घोड़ा का संरक्षण न केवल वडोदरा के समृद्ध इतिहास को श्रद्धांजलि है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने के प्रति भारत के समर्पण को प्रदर्शित करने का एक ऐतिहासिक अवसर भी है। सयाजी बाग की जयंती के अवसर पर काला घोड़ा का अनावरण सहयोग की स्थायी भावना और हमारी साझा विरासत को संरक्षित करने के महत्व का एक प्रमाण है।

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