जय प्रकाश राय
हाथरस बलात्कार काण्ड को सवर्ण बनाम दलित बनाने की घातक कोशिश की जा रही है। ऐसी धारणा कायम करने की कोशिश की गई कि सवर्ण जाति के लोगों ने दलितों पर अत्याचार किया है। राजनीतिक दल से लेकर न्यूज चैनल कर पूरी सवर्ण जाति को अत्याचारी दमनकारी साबित करने पर तुले रहे। यही कारण है कि आसपास के 12 गांवों के सवर्ण जाति के लोग विरोध जताने के लिये रात के समय हाथरस के उस गांव के पास पहुंच गये जहां मीडिया चैनलों का जामावड़ा था। ऐसा अक्सर देखा जाता है कि जब कभी किसी मामले में आरोपी सवर्ण जाति का होता है तो पूरी सवर्ण जाति को लपेटने की कोशिश की जाती है। लेकिन जब मामला साम्प्रदायिकता से जुड़ा होता है और मामला दो धर्म का हो जाता है और इसमें यदि आरोपी पक्ष मुसलमान हो तो फिर वही लोग कहते है कि किसी एक व्यक्ति के अपराध के लिये पूरी कौम को दोषी ठहराना सही नहीं। आतंकवाद को धर्म से जोडऩे पर ये लोग बिदक जाते हैं। सवर्ण हमेशा ऐसे मामलों में साफ्ट टारगेट बना दिये जाते है। अब उत्तर प्रदेश सरकार ने खुलासा किया है कि हाथरस मामले को लेकर जातीय एवं साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने की तैयारी थी। यूपी सरकार के दावे में इसलिये दम नजर आता है क्योंकि राजनीतिक दलों एवं न्यू चैनल ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे जो भड़काऊ थे और कहीं न कहीं जातीय संघर्ष को आमंत्रण दे रहे थे।
देश में कुछ ऐसी मानसिकता एवं विचारधारा का ही यह परिणाम है। देश में जातीय संघर्ष होते रहे हैं , दलितों पर अत्याचार भी होता है, लेकिन क्या वह अत्याचार केवल सवर्णों द्वारा किया जाता है? लेकिन उसी मामले में राजनीति की रोटी सेंकी जाती है जहां सवर्ण आरोपी हो। बुलन्दशहर में भी एक दलित लड़की का बलात्कार हुआ। लेकिन वहां आरोपी मुसलमान है, इसलिये वह स्थल राजनीतिक दलों का न्यूज चैनलों का तीर्थस्थल नहीं बना। इस तरह की मानसिकता अधिक घातक है। बार-बार कहा जाता है कि तुष्टिकरण की राजनीति अधिक घातक और समाज को तोडऩे वाली होती है। यूपी के हाथरस में कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। समय के साथ-साथ इसतरह की मानसिकता एवं विचारधारा में बढ़ोतरी ही हो रही है। मध्य प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान सवर्णों ने अपने घरों के आगे लिख दिया कि हम सवर्ण है, वोट मांगकर हमें शर्मिंदा न करे। सवर्ण वोट बैंक नहीं माने जाते इसलिये वे साफ्ट टारगेट हो जाते है।
लेखक हिंदी दैनिक चमकता आईना के संपादक हैं

