मुर्दों की ज़मीन के सौदागर—अल-फ़लाह कांड ने खोली सिस्टम की पोल
राष्ट्र संवाद डेस्क
जमीन का कारोबार इस शहर में हमेशा संवेदनशील रहा है, लेकिन अल-फ़लाह कांड ने इसे अपराध की नई परिभाषा दे दी है। मृतकों को “काग़जों में ज़िंदा” कर जमीन बेच देना कोई साधारण धोखाधड़ी नहीं—it दर्शाता है कि हमारे रजिस्ट्री सिस्टम की नींव में ही दरारें हैं। जिस व्यवस्था पर लोगों का विश्वास टिका होता है, वही व्यवस्था जब मृतक के नाम पर हस्ताक्षर तक कर दे, तो यह गलती नहीं, मिलीभगत की बू देता है।
यह साफ हो चुका है कि ऐसा खेल कोई अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता। यह संभव तभी होता है जब रिकॉर्ड रूम, रजिस्ट्री दफ्तर, स्थानीय दलाल और कुछ प्रभावशाली चेहरे एक लाइन में खड़े हों। अल-फ़लाह जैसे नाम तो सिर्फ सामने दिखते हैं—असल खेल उन दरवाजों के पीछे होता है जहाँ फाइलें बदलती हैं, पहचान पत्र “मिलान” होते हैं और एक मुर्दा अचानक कागज़ों पर जिंदा नजर आता है।

सबसे दुखद यह कि जिन परिवारों की जमीनें छीनी गईं, वे सरकारी दस्तावेज़ों पर भरोसा करके बैठे रहे—सोचते रहे कि उनके पूर्वजों की निशानी सुरक्षित है। पर जब रिकॉर्ड की परतें हटाईं गईं तो उन्हें पता चला कि उनकी ज़मीन तो कब की “बेच” दी गई थी, और बेचने वाला वही, जो वर्षों पहले दुनिया छोड़ चुका था।
इस कांड का विश्लेषण बताता है कि यह सिर्फ धोखाधड़ी का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता की परीक्षा है।
अगर रजिस्ट्री कार्यालय यह नहीं जांचता कि रजिस्ट्री करने वाला व्यक्ति जिंदा भी है या नहीं, तो वह कानून का नहीं, अराजकता का दफ्तर बन जाता है। प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की है, लेकिन यह केवल कुछ दलालों को पकड़ने की कवायद न बने। जब तक उन जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान नहीं होती जिन्होंने कागज़ों को कानून और कानून को कागज़ बनाने में सहायता की, तब तक इस शहर के लोग फिर किसी नए “अल-फ़लाह” का शिकार होंगे।
यह कांड डिजिटल वेरिफिकेशन की खामियों और मैन्युअल प्रक्रियाओं की नाजुकता दोनों को उजागर करता है। जमीन रजिस्ट्रेशन में मृत्यु रिकॉर्ड का स्वतः सत्यापन आज भी अनिवार्य नहीं है—और यही loophole माफिया की सबसे बड़ी ताकत है।
सिस्टम तब तक मजबूत नहीं होगा जब तक—
मृत्यु प्रमाणपत्र का अनिवार्य डिजिटल मिलान,
वारिस सत्यापन का सख्त प्रावधान,
और संदिग्ध रजिस्ट्री की स्वतः सूचना
लागू न हो जाए।
इस मामले में सिर्फ जमीन नहीं गई—विश्वास टूटा है।
और टूटे हुए विश्वास को पुनः स्थापित करने के लिए केवल कार्रवाई नहीं, उदाहरण बनाना होगा।
अल-फ़लाह कांड प्रशासन के लिए अवसर है—या तो इसे मील का पत्थर बनाएं, या इसे भी बाकी फाइलों की तरह धूल में दफना दें।
लेकिन जनता अब देख रही है—
और यह प्रश्न हर घर में गूंज रहा है:
“आख़िर मुर्दों को किसने ज़िंदा किया?”

