सड़कों पर ठहरी ज़िंदगी, सवालों के घेरे में प्रशासन मांगें जायज, तरीका सवालों के घेरे में
देवानंद सिंह
आदिवासी नेता सोमा मुंडा की हत्या के विरोध में बुलाए गए झारखंड बंद का असर राज्य की जीवनरेखा माने जाने वाले जमशेदपुर–रांची राष्ट्रीय राजमार्ग पर साफ दिखाई दिया। बुंडू टोल प्लाजा के पास करीब पांच घंटे तक एनएच पूरी तरह जाम रहा, जिससे हजारों यात्री भीषण परेशानी में फंसे रहे। पानी, भोजन और शौचालय जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए लोग तरसते रहे, जबकि प्रशासन मौके पर मौजूद होने के बावजूद स्थिति को समय रहते नियंत्रित नहीं कर सका। बंद समर्थक बुंडू टोल प्लाजा पहुंचे और सड़क जाम कर दिया। देखते ही देखते दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। छोटे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ा। बुंडू नगर पंचायत की दुकानें बंद रहने के कारण यात्रियों के पास कोई विकल्प नहीं था। हालांकि एंबुलेंस और सेना के वाहनों को जाने दिया गया, लेकिन आम नागरिकों को घंटों इंतजार करना पड़ा।
जाम की सूचना मिलते ही बुंडू एसडीएम क्रिस्टोफर कुमार बेसरा, डीएसपी ओमप्रकाश, थाना प्रभारी रामकुमार वर्मा और अंचल अधिकारी हंस हेंब्रम पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। अधिकारियों द्वारा लगातार प्रदर्शनकारियों को समझाने का प्रयास किया गया लेकिन घंटों बाद जाकर जाम समाप्त हुआ। यानी तब तक यात्री सड़क पर फंसे रहे।
सबसे बड़ा सवाल यह रहा कि जब झारखंड बंद का ऐलान पहले से था, तो ट्रैफिक डायवर्जन, वैकल्पिक मार्ग और यात्रियों के लिए न्यूनतम सुविधाओं की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। प्रशासन की मौजूदगी केवल औपचारिक दिखी, ठोस राहत के प्रयास नजर नहीं आए।
प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए सोमा मुंडा के परिवार को सरकारी नौकरी, फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से दोषियों को सजा और पांच करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की। एसडीएम ने मांगों को सरकार तक पहुंचाने का आश्वासन दिया।
गौरतलब है कि 7 जनवरी को खूंटी के जमुवादाग में सोमा मुंडा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस इस मामले में सात लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है और जमीन विवाद को हत्या का कारण बता रही है। वहीं आदिवासी संगठनों का आरोप है कि अब तक शूटर और मुख्य साजिशकर्ता की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
झारखंड बंद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि आंदोलन और प्रशासन के टकराव में सबसे ज्यादा नुकसान आम जनता का होता है। न्याय की मांग अपनी जगह जायज है, लेकिन उसका खामियाजा आम यात्रियों को भुगतना पड़े, यह किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।
प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि जनजीवन को न्यूनतम रूप से सुचारु रखना भी उतना ही जरूरी दायित्व है। बंद की पूर्व सूचना के बावजूद तैयारी का अभाव और यात्रियों के प्रति उदासीन रवैया प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
जरूरत इस बात की है कि भविष्य में ऐसे हालात से निपटने के लिए संवेदनशील, पूर्व नियोजित और जनहित केंद्रित रणनीति अपनाई जाए, ताकि विरोध की आवाज सुनी जाए, लेकिन आम आदमी की जिंदगी सड़क पर ठहर न जाए।

