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    Home » समाधान, संकल्प और लोकतांत्रिक नवजागरण का उद्घोष हो -ललित गर्ग
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    समाधान, संकल्प और लोकतांत्रिक नवजागरण का उद्घोष हो -ललित गर्ग

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीJanuary 2, 2026No Comments6 Mins Read
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    एनसीईआरटी न्यायपालिका विवाद
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    समाधान, संकल्प और लोकतांत्रिक नवजागरण का उद्घोष हो
    -ललित गर्ग-
    नया साल 2026 अनेक आशाओं, अपेक्षाओं, उम्मीदों और संकल्पों के साथ हमारे सामने है। वर्ष 2025 जहाँ वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर इम्तिहान, अस्थिरता और इंतज़ार का साल रहा, वहीं 2026 से शांति, खुशहाली और प्रगति की बहाली की संभावना बनती दिख रही है। बीते वर्ष की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि पुरानी समस्याओं के उत्तर पुराने तरीकों से नहीं मिल सकते। इसलिए 2026 में हमें बीते बस के सवालों के जवाब नए वक्त, नई सोच और नए विवेक में ढूंढने होंगे। यह वर्ष केवल कैलेंडर का बदलाव नहीं, बल्कि सोच, दृष्टि और प्राथमिकताओं के पुनर्निर्धारण का अवसर है। यह वर्ष समाधान, संकल्प और लोकतांत्रिक नवजागरण का उद्घोष बने, इसके लिये हमें तत्पर होना होगा, तैयारी करनी होगी।

     

    दुनिया के मोर्चे पर देखें तो रूस-यूक्रेन और इज़राइल-फ़िलिस्तीन के युद्धों के अतिरिक्त भी कम-से-कम दस बड़े संघर्ष ऐसे हैं, जहाँ मानवता निरंतर घायल हो रही है। आतंकवाद, नस्ली विद्वेष, धार्मिक कट्टरता और सत्ता-लिप्सा ने इंसानी खून को सस्ता बना दिया है। वर्ष 2025 में यह रक्तपात थमा नहीं, पर नए साल में इन युद्धों, संघर्षों और आतंकवादी हरकतों से मुक्ति की आकांक्षा केवल भावनात्मक कामना नहीं, बल्कि वैश्विक नैतिकता की अनिवार्यता बननी चाहिए। भारत, जिसने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश विश्व को दिया है, शांति और संवाद की इस वैश्विक पहल में एक बार फिर नैतिक नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीते वर्ष में दुनिया को जता दिये है कि वे वैश्विक नेतृत्व करने एवं दुनिया को उन्नत बनाने की भूमिका निभाने में सक्षम है। भारत की अहिंसक सोच, सबको साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति एवं सकारात्मक मानवीय नजरिया दुनिया के लिये उपयोगी हो सकता है।

     

    भारत के लिए 2026 कई अर्थों में निर्णायक वर्ष है। आंतरिक राजनीतिक चुनौतियाँ हों या वैश्विक दबाव, नए साल में हमें कड़वे और कभी-कभी हिंसक अनुभवों का सामना करना पड़ सकता है। इसके बावजूद बीते वर्षों की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत शांति, अहिंसा, सौहार्द और सद्भावना के दीप जलाने का संकल्प दोहराएगा। प्रधानमंत्री का यह कथन विशेष अर्थ रखता है कि जहाँ 2025 सुधारों की बात अर्थात भारत के रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार रहने का वर्ष था, वहीं 2026 से 2047 तक का कालखंड भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की निर्णायक यात्रा है। यह यात्रा केवल आर्थिक आँकड़ों की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक सुदृढ़ता की भी है। विभिन्न क्षेत्रों में किये जाने वाले सुधारों को प्रभावी बनाने के लिये यह अनिवार्य है कि राजनीति की ही भांति नौकरशाही के प्रत्येक स्तर पर सुधार हो। यह ठीक है कि केन्द्र सरकार से जुड़ी उच्च स्तर की नौकरशाही में बीते वर्षों में व्यापक बदलाव हुए है, लेकिन निचले स्तर पर उसका तौर-तरीका जस का तस है। सबसे चिन्ताजनक है कि नौकरशाही का भ्रष्टाचार खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। इसी कारण अनेक कार्य-योजनाओं का जैसा परिणाम आना चाहिए वैसा नहीं आ रहा है।

     

     

    हालाँकि, यह स्वीकार करना होगा कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक मूल्यों में गिरावट को लेकर जो वातावरण बन रहा है, उसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। लोकतंत्र केवल चुनावों का आयोजन भर नहीं है; यह संवाद, असहमति के सम्मान, संस्थाओं की गरिमा और संविधानिक मर्यादाओं का जीवंत तंत्र है। संसद लोकतंत्र का मंदिर है, पर पिछले वर्षों में संसद की कार्रवाई का बार-बार अवरोधित होना, हंगामे और गतिरोध लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करते हैं। नए साल में यह संकल्प लिया जाना चाहिए कि संसद अवरोध का मंच नहीं, बल्कि समाधान और विमर्श का केंद्र बने। सत्ता और विपक्ष-दोनों की यह साझा जिम्मेदारी है कि वे राष्ट्रीय हितों को दलगत राजनीति से ऊपर रखें। लोकतांत्रिक प्रणाली को एक नई ऊँचाई पर ले जाने के लिए राजनीतिक मूल्यों का पुनर्जागरण आवश्यक है। पारदर्शिता, जवाबदेही, नैतिकता और जन-सरोकार-इन चार स्तंभों पर ही सशक्त लोकतंत्र खड़ा होता है। 2026 में राजनीति को केवल सत्ता-संघर्ष का अखाड़ा नहीं, बल्कि लोक-सेवा का माध्यम बनाने की आवश्यकता है। यदि राजनीति आम आदमी के दुःख-दर्द, रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ती है, तभी लोकतंत्र में जनता का विश्वास मजबूत होगा।

     

    नया साल आम आदमी के जीवन में रोशनी बनकर आए-यह तभी संभव है जब हम समस्याओं का रोना रोने के बजाय समाधान की संस्कृति विकसित करें। महँगाई, बेरोज़गारी, सामाजिक विषमता और पर्यावरण संकट जैसी समस्याएँ केवल सरकारी घोषणाओं से नहीं सुलझेंगी; इनके लिए सामूहिक संकल्प और सहभागिता चाहिए। भारत की जनता में यह सामर्थ्य है कि वह झूठ को पहचानती है, सज्जनता को स्वीकार करती है और इंसानियत के मायने जानती है। हमारी सभ्यता की जड़ें अहिंसा और शांति में हैं-इसी बल पर हमें अपने समय की जटिल चुनौतियों का समाधान खोजना होगा। स्वास्थ्य के मोर्चे पर 2026 को विशेष सतर्कता का वर्ष बनाना होगा। महामारी के बाद की दुनिया ने यह सिखाया है कि स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एवं वैश्विक सुरक्षा का प्रश्न है। खानपान की संस्कृति को नया आयाम देना होगा, स्थानीय, पौष्टिक और संतुलित आहार को बढ़ावा देते हुए। योग, ध्यान और जीवनशैली में संयम को अपनाकर ही हम स्वस्थ समाज की नींव रख सकते हैं। साथ ही ‘स्वदेशी’ के मंत्र को नई ऊँचाई पर ले जाना होगा-चाहे वह उत्पादन हो, उपभोग हो या तकनीकी नवाचार। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं, मानसिक और सांस्कृतिक भी होनी चाहिए।
    सामाजिक जीवन में भी नए संकल्पों की आवश्यकता है। नशा, दिखावा और आडंबर हमारी सामाजिक ऊर्जा को खोखला करते हैं। सादगी, संयम और मूल्यबोध को प्रोत्साहित करना समय की माँग है। विवाह और सामाजिक संस्कारों को बाज़ारू प्रदर्शन से मुक्त कर मानवीय संबंधों की गरिमा से जोड़ना होगा। यही नहीं, पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, जल-संरक्षण और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व-ये सभी नए साल के अनिवार्य संकल्प होने चाहिए। तकनीक और परंपरा के संतुलन के बिना इक्कीसवीं सदी का भारत आगे नहीं बढ़ सकता। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भारत नए मानक स्थापित कर रहा है, पर इस प्रगति के साथ मानवीय संवेदनाओं का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। विकास का सही अर्थ वही है, जिसमें अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी स्वयं को सम्मानित और सुरक्षित महसूस करे।

     

    2026 में हमें बड़े बदलाव के लिए छोटे-छोटे लेकिन ठोस कदम उठाने होंगे। नए संकल्पों के पौधे रोपने होंगे, विकास एवं विवेक के नए ‘स्वास्तिक’ रचने होंगे-पर इसके लिए मौसम और माहौल दोनों बनाना पड़ेगा। सकारात्मक सोच, सामाजिक विश्वास और राजनीतिक सद्भाव-यही वह वातावरण है, जिसमें परिवर्तन के बीज फलते-फूलते हैं। तैयारी के बिना संकल्प खोखले रह जाते हैं; इसलिए नीति, नियत और नियोजन-तीनों का समन्वय अनिवार्य है। अंततः नया साल 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि इतिहास अवसर देता है, पर दिशा हमें स्वयं तय करनी होती है। यदि हम शांति को प्राथमिकता, लोकतंत्र को आचरण और समाधान को संस्कृति बना लें, तो यह वर्ष केवल एक कैलेण्डर नहीं, बल्कि एक युगांतकारी मोड़ सिद्ध हो सकता है। भारत यदि अपनी आत्मा-अहिंसा, सहअस्तित्व और करुणा के साथ आगे बढ़ता है, तो 2026 न केवल हमारे लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए आशा और प्रकाश का वर्ष बनेगा। दुनिया को नयी दिशा एवं दृष्टि देने में सक्षम होगा।

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