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    Home » बच्चों को ‘इंसान’ बनने दें ‘उपलब्धि मशीन’ नहीं
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    बच्चों को ‘इंसान’ बनने दें ‘उपलब्धि मशीन’ नहीं

    News DeskBy News DeskJune 26, 2025No Comments6 Mins Read
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    बच्चों को ‘इंसान’ बनने दें ‘उपलब्धि मशीन’ नहीं
    देवानंद सिंह
    नेलकरंजी की एक घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया। एक लड़की, जो अपने भविष्य को लेकर प्रयासरत थी, उसे उसी के पिता की निराशा और सामाजिक अपेक्षाओं की दीवारों ने इस कदर घेर लिया कि जीवन की डोर ही टूट गई। यह सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच, शिक्षा व्यवस्था और पारिवारिक अपेक्षाओं के जटिल जाल का परिणाम है। यह घटना हमारे सामने यह प्रश्न लेकर आती है कि क्या हम अपने बच्चों को ‘इंसान’ बनने दे रहे हैं या सिर्फ ‘उपलब्धि मशीन’ बनाने पर आमादा हैं? आज की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक मूल्य-प्रणाली ने सफलता की परिभाषा को कुछ पेशों डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, सीए तक सीमित कर दिया है। इन पेशों को सम्मान, सुरक्षा और स्थायित्व का प्रतीक मान लिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, अभिभावक अपने बच्चों को इन्हीं क्षेत्रों की ओर ढकेलते हैं, भले ही उनकी रुचि, क्षमता या मानसिक स्वास्थ्य उस दिशा में हो या नहीं।

     

     

    नेलकरंजी की घटना इस प्रवृत्ति का चरम उदाहरण है, जहां एक पिता अपनी बेटी से नाराज़ इसलिए हुआ, क्योंकि वह उसकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई। यह सिर्फ एक पारिवारिक असहमति नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता की झलक थी, जिसमें बच्चों के मनोविज्ञान और स्वाभाविक विकास की कोई अहमियत नहीं बची।
    बच्चे मां-बाप की उम्मीदों का केंद्र होते हैं, लेकिन जब ये उम्मीदें सपनों की जगह दबाव बन जाएं, तो वे बच्चे की पहचान को कुचल सकती हैं। कई बार अभिभावक अपने अधूरे सपनों को अपने बच्चों में पूरा करना चाहते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि बच्चों का एक अलग व्यक्तित्व होता है, जिसकी दिशा, गति और सीमाएं अलग होती हैं।

     

    नेलकरंजी की घटना में भी यही देखने को मिला। बेटी का आत्मविश्वास और उसकी असफलता को संभालने की उसकी मनोवैज्ञानिक क्षमता पिता की अपेक्षाओं के भार तले टूट गई। यह एक सांस्कृतिक संकट है, जहां प्रदर्शन और प्राप्ति को रिश्तों पर प्राथमिकता दी जाने लगी है।
    भारत में कोचिंग संस्थान आज एक विशाल उद्योग बन चुके हैं। इन्होंने शिक्षा को एक उत्पाद बना दिया है और बच्चों को ग्राहक। इन संस्थानों की मार्केटिंग रणनीति भय और उम्मीदों पर आधारित होती है। अगर, आपने हमारी कोचिंग नहीं ली तो आपका बच्चा पीछे रह जाएगा।

     

    इस तरह की मानसिकता बच्चों और उनके अभिभावकों में निरंतर चिंता, असुरक्षा और प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है। हर वर्ष कोटा, हैदराबाद, चेन्नई, पुणे और अब नेलकरंजी जैसे शहरों से आत्महत्याओं की खबरें आती हैं, जो बताती हैं कि यह केवल परीक्षा की हार नहीं, बल्कि सामाजिक सोच की हार है। भारत की शिक्षा प्रणाली में अब भी बहु-विकल्पीय करियर गाइडेंस की भारी कमी है। अधिकतर स्कूलों में कोई प्रशिक्षित काउंसलर नहीं होता, जो बच्चों को उनकी रुचियों और क्षमताओं के अनुसार मार्गदर्शन दे सके। छात्र-छात्राएं अक्सर उस राह पर चल पड़ते हैं जो उन्हें बताया गया है, न कि जो वे खुद चुनते हैं।

     

    स्कूलों में करियर विकल्पों की विविधता पर चर्चा नहीं होती। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजाइन, सोशल इनोवेशन, उद्यमिता, खेल, साहित्य और सृजनात्मक विधाएं अब भी हॉबी मानी जाती हैं, न कि करियर विकल्प। इसका परिणाम यह होता है कि जो छात्र पारंपरिक रास्तों पर सफल नहीं हो पाते, वे अपने जीवन को असफल मान लेते हैं। आज की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ करियर नहीं है, बल्कि मानसिक संतुलन और भावनात्मक स्थिरता है। भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी कमज़ोरी या शर्म से जोड़कर देखा जाता है। स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग सेवाओं का भारी अभाव है, जिन बच्चों को अपने भीतर के द्वंद्व को व्यक्त करने का कोई मंच नहीं मिलता, वे अंततः घुटन और अवसाद के शिकार बनते हैं।

     

    नेलकरंजी की बच्ची को शायद सिर्फ एक भरोसेमंद संवाद की ज़रूरत थी। शायद एक शिक्षक, एक सलाहकार या एक दोस्त अगर उससे बात करता, तो वह अपने जीवन की डोर थामे रखती। हमारा मीडिया और फिल्म उद्योग अक्सर सफलता की असाधारण कहानियों को ही प्रस्तुत करता है। हर वर्ष टॉपर्स के इंटरव्यू, उनकी दिनचर्या और फॉर्मूले को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है, लेकिन असफल होने के बाद उठ खड़े होने वाले लोगों की कहानियां दुर्लभ हैं। इससे समाज में यह धारणा बन जाती है कि असफलता का मतलब अंत है।

     

    जरूरत इस बात की है कि संघर्ष, विफलता, पुनः प्रयास और विविध राहों पर चलने वाले युवाओं की कहानियां मुख्यधारा में लाई जाएं ताकि यह सन्देश फैले कि ज़िंदगी का मूल्य परीक्षा परिणामों से कहीं अधिक है। इस दिशा में समाधान के रास्ते खोजने बहुत जरूरी हैं।
    स्कूल स्तर पर काउंसलिंग एक अनिवार्य व्यवस्था हो। बच्चों को उनकी रुचि और योग्यता के अनुसार करियर की जानकारी दी जाए। समय-समय पर अभिभावकों के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाएं, जहां उन्हें बच्चों से संवाद, प्रेरणा और सहयोग के तरीकों पर प्रशिक्षित किया जाए। इन संस्थानों की फीस, प्रचार और प्रवेश नीतियों की निगरानी के लिए एक नियामक संस्था होनी चाहिए ताकि शिक्षा का बाज़ारीकरण नियंत्रित हो।  कला, साहित्य, संगीत, खेल, और उद्यमिता को मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जाए।

     

    पाठ्यक्रमों में इन विषयों की गंभीर उपस्थिति होनी चाहिए। हर स्कूल और कॉलेज में काउंसलर हों जो छात्रों को गोपनीय, सुलभ और वैज्ञानिक मार्गदर्शन दे सकें। सफलता के साथ-साथ संघर्ष की कहानियों को भी प्रमुखता मिले। फिल्में और वेब सीरीज़ असफलता को ‘शर्म’ नहीं, ‘संभावना’ की तरह दिखाएं।


    नेलकरंजी की घटना सिर्फ एक बच्ची की आत्महत्या नहीं है, बल्कि समाज की सामूहिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। जब घर संवादहीन हो जाए, स्कूल मार्गदर्शन विहीन और समाज सहानुभूति शून्य, तो बच्चे खुद को अकेला और असहाय महसूस करने लगते हैं। यही अकेलापन उन्हें ऐसे निर्णय की ओर ले जाता है, जिससे लौटना संभव नहीं होता। अपने बच्चों के प्रति हर घर में यह सोच होनी चाहिए कि “तुम डॉक्टर बनो या डांसर, तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी है, और हम तुम्हारे साथ हैं, हर हाल में।” जब तक यह भरोसा घरों में, स्कूलों में और समाज में नहीं गूंजेगा, तब तक नेलकरंजी जैसी घटनाएं बार-बार हमें झकझोरती रहेंगी। हमें यह समझना होगा कि बच्चों को बनाना नहीं, उन्हें समझना ज़रूरी है, क्योंकि अंततः करियर जीवन का एक हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं, इसीलिए, बदलाव परीक्षा परिणामों में नहीं, सोच की दिशा में लाना होगा।

    Let children become 'humans' not 'achievement machines'
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