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    कोल्हान की सियासी चुनौती

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 23, 2024Updated:October 23, 2024No Comments5 Mins Read
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    कोल्हान की सियासी चुनौती
    देवानंद सिंह
    झारखंड की राजनीति हमेशा से ही अपने उतार-चढ़ाव के लिए जानी जाती रही है। इस बार भी यही देखने को मिलेगा। पूरे झारखंड की बात छोड़ भी दें तो केवल कोल्हान क्षेत्र सियासी तौर पर इतना महत्वपूर्ण है कि यहां हर पार्टी और प्रत्याशी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी रहती है, जब पूर्व मुख्यमंत्रियों की बात हो तो सियासत के मायने ही बदल जाते हैं। इस बार बीजेपी की तरफ से यहां कई पूर्व मुख्यमंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है, क्योंकि इस बार बीजेपी ने जिताऊ आधार पर परिवारवाद की अनदेखी करते हुए कोल्हान क्षेत्र की सीटों पर पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे, बहू और पत्नी को चुनाव मैदान में उतारा है और राष्ट्रीय नेतृत्व ने इसके बहाने एक संदेश भी देने का काम किया कि पिछले चुनाव में जो दुष्प्रचार किया गया आलाकमान उससे सहमत नहीं है दुष्प्रचार क्षणिक होता है इसका फायदा सिर्फ और सिर्फ नेता को होता है और मतदाता अंततः नुकसान पर रहती है

     

     

    झारखंड के चुनावी जंग में इस बार अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा को पोटका से, चंपाई सोरेन को सरायकेला से तो बेटे बाबूलाल को घाटशिला से चुनाव मैदान में उतारा है, वहीं पूर्व सीएम रघुवर दास की बहू पूर्णिमा जमशेदपुर पूर्व और मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा जगन्नाथपुर सीट से चुनाव मैदान में हैं। कोल्हान सियासी रूप से इसीलिए भी मायने रखता है, क्योंकि यह आदिवासी जनसंख्या और संसाधनों के लिए जाना जाता है, इसीलिए यह क्षेत्र हमेशा से राजनीतिक गतिविधियों के केंद्र में रहा है। यहां की सियासत में आदिवासी मुद्दे, विकास, रोजगार और भूमि अधिकार जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब विधानसभा चुनाव 2024 का ऐलान हो चुका है तो निश्चित तौर पर यह क्षेत्र विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बेहद संवेदनशील बन जाता है।

    2019 के चुनाव में कोल्हान इलाके की 14 सीटों पर बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था, जबकि झामुमो ने 11 और उसकी सहयोगी कांग्रेस ने दो सीटें जीती थीं, जिन्होंने प्रदेश में सरकार बनाई। तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास विपक्षी दुष्प्रचार के शिकार हो गए थे और खुद जमशेदपुर पूर्व सीट पर भाजपा के बागी सरयू राय से चुनाव हार गए थे। कोल्हान की 14 में से 13 सीटें जीतकर झामुमो-कांग्रेस गठबंधन सत्ता में पहंचने में सफल रहा था। दरअसल, पिछली बार बीजेपी के साथ आजसू का गठबंधन टूट गया था, वहीं बाबूलाल मरांडी की भी पार्टी अलग चुनाव लड़ी थी। इससे एनडीए के वोटों में हुए बिखराव का फायदा उठाने में महागठबंधन सफल रहा था, लेकिन इस बार मरांडी और आजसू दोनों बीजेपी के साथ लौट चुके हैं, जिससे कोल्हान में सियासी समीकरण बदले हुए दिख रहे हैं।

    मजे की बात यह है कि बीजेपी ने जिताऊ आधार पर परिवारवाद की अनदेखी करते हुए कोल्हान क्षेत्र की सीटों पर पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटे, बहू और पत्नी को चुनाव मैदान में उतारा है, इसीलिए चुनाव संग्राम कड़ा रहेगा। अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा पोटका से, चंपाई सोरेन सरायकेला तो बेटे बाबूलाल को घाटशिला और पूर्व सीएम रघुवर दास की बहू पूर्णिमा जमशेदपुर पूर्व और मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा जगन्नाथपुर सीट से चुनाव लड़ रहीं हैं, जो सीटें जातिगत वोटों के लिहाज से बहुत मायने रखतीं हैं, इसीलिए यहां सवाल यह बना रहेगा कि प्रदेश में मुख्य चेहरे किस तरह यहां अपनी प्रतिष्ठा बचा पाते हैं।

     

     

     

    पूर्व मुख्यमंत्रियों के कामकाज की बात करें तो मधु कोड़ा ने अपनी सरकार के दौरान कई महत्वपूर्ण फैसले लिए थे, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि को धूमिल किया। वहीं, अर्जुन मुंडा की आदिवासी राजनीति के बड़े चेहरे के रूप में पहचान है। उन्होंने विकास की कई योजनाएं बनाईं, लेकिन स्थानीय मुद्दों के प्रति उनकी संवेदनशीलता पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं।
    बाबूलाल मरांडी की झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के तौर एक मजबूत पहचान है। उनकी सरकार के दौरान कई सामाजिक कल्याण की योजनाएं शुरू हुईं, लेकिन बाद में डोमिसाइल के कारण उन्हें सत्ता से दूर होना पड़ा। रघुवर दास के कार्यकाल में विकास के कईं उदाहरण आज भी लोग देते हैं, वे विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाते रहे हैं और हमेशा दुष्प्रचार को नजरअंदाज किया जिसका खामियाजा भी 2019 में भुगतना पड़ा फिर भी वे कभी अपने सिद्धांत से समझौता नहीं किया
    जबकि चंपई दौरान ने अपने छोटे से कार्यकाल में कई फैसले लिए, लेकिन उन्हें हेमंत सोरेन के जेल से बाहर होने के बाद सीएम की कुर्सी छोड़नी पड़ी।

     

     

     

    कोल्हान क्षेत्र में आदिवासी वोटों का प्रभाव स्पष्ट है। इन वोटों को सुरक्षित रखने के लिए सभी दलों को विशेष योजनाएं बनानी होंगी। यहां महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। लिहाजा, राजनीतिक दलों को महिला मुद्दों पर ध्यान देना होगा। इसके अलावा, झारखंड की राजनीति में जातीय समीकरण भी महत्वपूर्ण हैं। विभिन्न जातियों के नेता अपने-अपने समुदायों को साधने की कोशिश कर रहे हैं।
    कुल मिलाकर, कोल्हान में चुनावी समीकरण बेहद जटिल हैं
    क्योंकि कांग्रेस ,भाजपा और झामुमो तीनों को इस बार बागियों के साथ भीतरघात झेलना होगा पूर्व मुख्यमंत्रियों की प्रतिष्ठा इस बार की चुनावी लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। मतदाता जिस तरह विकास, रोजगार और सामाजिक कल्याण के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। उस नजरिए से आगामी चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन- सी पार्टी और नेता इस क्षेत्र में अपनी पैठ बनाने में सफल होते हैं।

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