देवानंद सिंह
राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर चुनाव आयोग पर अब तक के सबसे गंभीर आरोपों में से एक लगाया। उनका दावा था कि लोकसभा चुनावों के साथ-साथ महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों में वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है, इतनी बड़ी कि चुनावी नतीजों की दिशा ही बदल गई। यह आरोप केवल चुनावी रणनीति की बयानबाज़ी नहीं, बल्कि एक संवैधानिक संस्था की साख पर सीधा हमला है। उन्होंने जिस तरह महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के साथ-साथ लोकसभा चुनाव में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेराफेरी के आरोप लगाए, वह देश की चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता के मूल पर चोट करने वाला मुद्दा है। यह आरोप केवल कौन जीता-कौन हारा की बहस से आगे बढ़कर उस बिंदु तक जाता है, जहां सवाल यह उठता है कि क्या हम अपनी लोकतांत्रिक मशीनरी पर भरोसा कर सकते हैं।
राहुल गांधी ने आंकड़ों के साथ दावा किया कि महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मात्र पांच महीनों में एक करोड़ नए मतदाता जुड़ गए, जो पिछले पांच वर्षों में जुड़े मतदाताओं से भी अधिक हैं। यह वृद्धि न केवल जनसंख्या के प्राकृतिक अनुपात से अधिक है, बल्कि चुनावी नतीजों के पैटर्न को भी संदिग्ध बनाती है। हरियाणा में, उनके अनुसार, आठ सीटों पर महज 22,779 वोटों का अंतर निर्णायक रहा, जबकि एक सीट पर एक लाख वोट चोरी हुए। कर्नाटक के महादेवपुरा में एक लाख से अधिक फर्जी या डुप्लीकेट वोट होने का आरोप और एक ही व्यक्ति के नाम का अलग-अलग राज्यों में पंजीकृत होना, इस पूरी कहानी को और गंभीर बना देता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट उपलब्ध न कराना, सीसीटीवी फुटेज नष्ट करना, और फॉर्म 6 का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग, ये सब चुनाव आयोग और भाजपा की मिलीभगत का प्रमाण हैं। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल चुनावी अनियमितता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की वैधता को सीधे चुनौती है। चुनाव आयोग ने इन आरोपों को भ्रामक करार देते हुए कहा कि यदि राहुल गांधी के पास सबूत हैं तो उन्हें शपथपत्र के साथ लिखित रूप में प्रस्तुत किया जाए। आयोग का तर्क है कि मतदाता सूची जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत पारदर्शी प्रक्रिया से तैयार होती है, और इस पर आपत्ति अदालत में चुनाव याचिका के माध्यम से की जा सकती है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने यह भी बताया कि कांग्रेस को नवंबर 2024 और जनवरी 2025 में मतदाता सूची उपलब्ध कराई जा चुकी थी।
यह प्रतिक्रिया तकनीकी रूप से सही हो सकती है, लेकिन इसमें वह राजनीतिक और नैतिक संवेदनशीलता नज़र नहीं आती जिसकी अपेक्षा एक संवैधानिक संस्था से की जाती है। लोकतंत्र में, केवल कानूनी रास्ता खुला है कहना पर्याप्त नहीं है, जनता के भरोसे को बहाल करने के लिए सक्रिय और पारदर्शी जांच अनिवार्य है। भाजपा ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उन्हें कांग्रेस की हार छिपाने का बहाना बताया। देवेंद्र फडणवीस, प्रह्लाद जोशी और संबित पात्रा ने पलटवार किया कि यदि चुनावों में धांधली होती, तो कांग्रेस के उम्मीदवार झारखंड या जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में कैसे जीत जाते। यह तर्क राजनीतिक रूप से प्रभावी हो सकता है, लेकिन यह मूल प्रश्न—वोटर लिस्ट की सटीकता का उत्तर नहीं देता।
वहीं, कांग्रेस के लिए यह एक मौका है कि वह खुद को लोकतंत्र की रक्षा के एजेंडे के साथ प्रस्तुत करे, लेकिन इसके लिए उसे ठोस और प्रमाणित सबूत जनता के सामने रखने होंगे। बिना ठोस प्रमाण, यह मुद्दा महज चुनावी बयानबाज़ी के शोर में खो सकता है। भारत की चुनावी मशीनरी बहु-स्तरीय निगरानी और नियम-कायदों से संचालित होती है, मतदाता सूची का संकलन, मतदान प्रक्रिया, मतगणना, और नतीजों की घोषणा, सब पर कई परतों में चेक और बैलेंस मौजूद हैं। तकनीकी रूप से, इतने बड़े पैमाने पर संगठित हेराफेरी असंभव के करीब मानी जाती है, लेकिन असंभव और कभी नहीं में फर्क है।
अतीत में भी मतदाता सूची में मृत व्यक्तियों के नाम बने रहना, प्रवासी मतदाताओं का पंजीकरण, एक ही पते पर असामान्य संख्या में मतदाताओं का होना, और डुप्लीकेट एंट्री जैसी समस्याएं देखी गई हैं। अधिकतर मामलों में यह प्रशासनिक लापरवाही होती है, लेकिन जब यह बड़े पैमाने पर और सुनियोजित ढंग से हो, तो मामला अलग हो जाता है। लोकतंत्र केवल मतपेटियों और बैलेट पेपरों पर आधारित नहीं है, यह उस भरोसे पर टिका है कि हर वोट गिना जाता है और हर वोट मायने रखता है। यदि जनता यह मानने लगे कि मतदाता सूची में हेराफेरी होती है और उसकी आवाज़ पहले से तय परिणामों में दब जाती है, तो चुनाव की वैधता और संस्थाओं की साख दोनों पर गहरा आघात होगा।
इसलिए, चुनाव आयोग के लिए यह केवल आरोपों को खारिज करने का मामला नहीं है, बल्कि यह अपनी साख को मजबूत करने का अवसर है। त्वरित, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच न केवल आरोपों को साफ करेगी, बल्कि भविष्य में किसी भी तरह की शंका को भी रोकने का काम करेगी। कुल मिलाकर, राहुल गांधी के आरोपों ने चुनावी पारदर्शिता पर राष्ट्रीय बहस को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। यह बहस केवल वर्तमान चुनावी नतीजों की वैधता तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाले बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के चुनावों की विश्वसनीयता से भी जुड़ी है।
राजनीतिक दलों के लिए चुनौती यह है कि वे अपने अल्पकालिक लाभ से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा बनाए रखें, और चुनाव आयोग के लिए चुनौती यह है कि वह कानूनी औपचारिकताओं के साथ-साथ नैतिक जिम्मेदारी निभाते हुए यह साबित करे कि भारत का लोकतंत्र अभी भी उतना ही मजबूत और निष्पक्ष है जितना इसे होना चाहिए, क्योंकि अंततः, लोकतंत्र की असली ताकत नतीजों में नहीं, बल्कि उस विश्वास में है कि हर नागरिक की आवाज़ सचमुच सुनी जाती है।

