जेपीसी को सत्ता के खेल से बाहर निकालकर वास्तविक लोकतांत्रिक विमर्श का मंच बनाया जाना आवश्यक
देवानंद सिंह
भारतीय संसदीय लोकतंत्र में संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी एक ऐसा उपकरण है, जिसे बनाने का मूल उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना था, लेकिन समय के साथ यह उपकरण जितना प्रभावशाली दिखता है, उतना ही विवादास्पद भी साबित हुआ है। सिद्धांततः यह समिति संसद के भीतर विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों को साथ लाकर बड़े वित्तीय घोटालों, संवेदनशील विधेयकों और नीतिगत प्रश्नों पर निष्पक्ष जांच का मंच प्रदान करती है। पर व्यवहार में इसकी संरचना और कार्यप्रणाली बार-बार यह संदेह जगाती रही है कि यह मंच सत्ता पक्ष के हितों का विस्तार मात्र है। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इसी बुनियादी प्रश्न को फिर से उठाया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री यदि 30 दिन तक जेल में रहते हैं तो उन्हें पद छोड़ना होगा—ऐसे प्रावधान वाले विधेयक पर गठित जेपीसी पर भरोसा करना कठिन है। उनका कहना है कि जब समिति की संरचना ही सत्ता पक्ष के वर्चस्व पर आधारित हो, तो उससे किसी भी निष्पक्षता की उम्मीद करना लोकतंत्र के साथ छल के बराबर है।

यह बहस केवल किसी एक विधेयक या प्रावधान तक सीमित नहीं है। दरअसल, यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, राजनीतिक शुचिता और जनता की अपेक्षाओं से जुड़ा गहरा सवाल है। भारत जैसे विशाल और बहुदलीय लोकतंत्र में जनता संसद से यह अपेक्षा करती है कि वह केवल कानून बनाने का मंच न होकर जवाबदेही का भी संस्थान बने, लेकिन जेपीसी का इतिहास बताता है कि यह समिति बार-बार विवादों में घिरी है और विपक्ष ने इसे सत्ता पक्ष के बहुमत की तानाशाही का औजार करार दिया है।
जेपीसी की यात्रा को देखें तो 1987 का बोफोर्स घोटाला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कांग्रेस सरकार ने इस मामले में समिति गठित की, लेकिन समिति में कांग्रेस का वर्चस्व इतना अधिक था कि छह प्रमुख विपक्षी दलों ने इसका बहिष्कार कर दिया। 1988 में आई रिपोर्ट को विपक्ष ने खारिज कर दिया और परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस अगले चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई। यह शुरुआत ही थी जब विपक्ष ने स्पष्ट कर दिया कि जेपीसी से निष्पक्षता की उम्मीद व्यर्थ है। 1992 में हर्षद मेहता घोटाले पर कांग्रेस सरकार ने फिर जेपीसी बनाई। लंबी कार्यवाही हुई, लेकिन जब 1996 के चुनाव आए तो जनता ने कांग्रेस को बाहर कर दिया। 2002-03 में जब भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने केतन पारेख और स्टॉक मार्केट घोटाले पर जेपीसी बनाई, तब भी विपक्ष ने इसे राजनीतिक ड्रामा करार दिया और 2004 के चुनावों में भाजपा हार गई। इसी तरह 2011-13 में 2जी स्पेक्ट्रम और वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले पर कांग्रेस सरकार ने दबाव में आकर जेपीसी बनाई, लेकिन विपक्ष ने इसकी रिपोर्ट को पक्षपाती कहा और 2014 में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।

इन घटनाओं की श्रृंखला से यह पैटर्न साफ झलकता है कि जेपीसी शायद ही कभी अपनी विश्वसनीयता कायम कर पाई हो। नतीजतन, ओ’ब्रायन का यह कहना असंगत नहीं लगता कि जेपीसी बनाने वाली सरकारें अक्सर अगले चुनाव हार जाती हैं। इसे वे जनता का संकेत मानते हैं कि समिति एक निष्पक्ष मंच नहीं रह गई, बल्कि सत्ताधारी दल के हितों को साधने का जरिया बन चुकी है। सवाल यह भी है कि क्या जनता ऐसे समितियों को सच्चाई छिपाने की कवायद मानकर सत्ता पक्ष को दंडित करती है?
सत्ता पक्ष का तर्क हमेशा यह रहता है कि जेपीसी संसद का अंग है और इसमें विपक्ष सहित सभी दलों के सदस्य शामिल होते हैं। इसलिए इसकी रिपोर्ट संवैधानिक वैधता रखती है और लोकतंत्र की प्रक्रिया को मजबूत करती है। लेकिन विपक्ष का कहना है कि समिति में बहुमत हमेशा सत्ता पक्ष का होता है, लिहाज़ा निष्कर्ष एकतरफा रहते हैं। ओ’ब्रायन ने यह तथ्य भी गिनाया कि 2014 के बाद बनी 11 जेपीसी में से सात का गठन संसद सत्र के अंतिम दिन हुआ। इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि क्या इन्हें केवल औपचारिकता निभाने और विपक्ष को शांत करने के लिए बनाया गया था। इसके विपरीत 2004 से 2014 के बीच गठित तीन जेपीसी में से कोई भी अंतिम दिन नहीं बनी थी। यह अंतर अपने आप में सत्ता के इरादों पर सवाल खड़ा करता है।

विवाद केवल घोटालों की जांच तक सीमित नहीं रहा है। हाल के वर्षों में विधेयकों पर भी जेपीसी की भूमिका सवालों के घेरे में रही है। वक्फ संशोधन विधेयक इसका ताज़ा उदाहरण है, जिसमें समिति ने विपक्ष के संशोधनों और आपत्तियों को जगह नहीं दी और सीधे सत्ता पक्ष की रेखा को आगे बढ़ाया। इसी तरह अब जो नया विवाद उठ रहा है—प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री के 30 दिन जेल में रहने की स्थिति में पद से हटने का प्रावधान, वह सतही तौर पर जवाबदेही का प्रतीक प्रतीत होता है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि इसका राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है। जब केंद्रीय एजेंसियों पर पहले से ही राजनीतिक उपयोग का आरोप लगता है, तब विपक्ष की आशंका निराधार नहीं कही जा सकती। उनका डर है कि सत्ता पक्ष इस प्रावधान का इस्तेमाल राज्यों की निर्वाचित सरकारों को गिराने के हथियार के रूप में कर सकता है।

असल प्रश्न यही है कि क्या जेपीसी जैसी समितियां लोकतंत्र में जवाबदेही को मजबूत करती हैं या फिर सत्ता पक्ष के लिए विपक्ष को नियंत्रित करने का साधन बन जाती हैं। इसके समर्थक कहते हैं कि यह संसद के भीतर पारदर्शिता और विमर्श का मंच है, जिसकी रिपोर्टें भविष्य की नीतियों और सुधारों के लिए आधार बनती हैं। पर आलोचकों का मानना है कि जब निष्कर्ष पहले से तय होते हैं और विपक्ष की राय को दरकिनार किया जाता है, तो यह लोकतंत्र को केवल औपचारिकता तक सीमित कर देता है।
डेरेक ओ’ब्रायन ने जिस जेपीसी के श्राप की बात की है, वह केवल एक राजनीतिक जुमला भर नहीं है। 1987 में बोफोर्स पर बनी जेपीसी के बाद कांग्रेस हारी, 1992 में हर्षद मेहता मामले की जेपीसी के बाद भी कांग्रेस हारी, 2002-03 में केतन पारेख घोटाले पर भाजपा की जेपीसी के बाद भाजपा हारी, और 2011-13 में 2जी व वीवीआईपी हेलीकॉप्टर पर बनी जेपीसी के बाद कांग्रेस हारी। यह सिलसिला यह संकेत देता है कि जनता समिति को निष्पक्ष जांच का मंच न मानकर सच छिपाने का प्रयास समझती है, और सरकार को दंडित करती है।
लेकिन यदि जेपीसी लगातार संदेह के घेरे में है, तो लोकतंत्र के लिए रास्ता क्या है? कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े घोटालों और संवेदनशील विधेयकों की जांच न्यायिक निगरानी में होनी चाहिए ताकि किसी भी दल का दबाव न हो। कुछ का सुझाव है कि समिति में सत्ता पक्ष और विपक्ष को बराबर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए ताकि रिपोर्ट संतुलित हो। एक अन्य सुझाव यह है कि समिति की रिपोर्ट और जांच की पूरी प्रक्रिया एक स्वतंत्र संसदीय सचिवालय के अधीन हो, जो सरकार से अप्रभावित रहे। इसके अलावा समिति की कार्यवाही को अधिक पारदर्शी और सार्वजनिक बनाना चाहिए ताकि जनता के सामने सच्चाई उजागर हो सके और विपक्ष की आपत्तियों को भी दर्ज किया जा सके।
दरअसल सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की है। लोकतंत्र संस्थाओं की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास पर चलता है। यदि, जेपीसी जैसी समितियां बार-बार सत्ता पक्ष की छाया में काम करती दिखेंगी और विपक्ष की बातों को दरकिनार करेंगी, तो वे अपनी उपयोगिता खो देंगी। ओ’ब्रायन का बयान इसी अविश्वास का प्रतीक है और यह केवल विपक्ष की नाराज़गी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर चेतावनी है।

भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं है। यह संसद, न्यायपालिका, मीडिया और अन्य संस्थाओं की पारदर्शिता, संतुलन और जवाबदेही पर टिका है। यदि, संसद की जांच समितियां ही जनता का विश्वास खो देंगी, तो इसका असर लंबे समय में पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ेगा। इसलिए असली आवश्यकता यही है कि जेपीसी को सत्ता के खेल से बाहर निकालकर वास्तविक लोकतांत्रिक विमर्श का मंच बनाया जाए। तभी यह समिति जनता के हितों की रक्षा कर पाएगी और लोकतंत्र की सेहत को मजबूत करेगी। यदि, ऐसा नहीं हुआ, तो जेपीसी का नाम सुनते ही लोगों के मन में पारदर्शिता की जगह राजनीति का खेल ही उभरेगा और यह लोकतंत्र की आत्मा के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा।

