धर्म का अर्थ है धारण करना। दूसरे शब्दों में, धर्म वह आचरण है जिसके अनुसार व्यक्ति अपने जीवन में जीता है। इसलिए, किसी भी धर्म के नाम से जोश में आकर नफरत फैलाने वाले कभी स्वीकार्य नहीं हैं।
कवि-आलोचक नलिनीधर भट्टाचार्य के शब्दों में, “मनुष्य की उच्चतर सत्ता अब सुप्त हो चुकी है। व्यावहारिक सत्ता सक्रिय और सशक्त हो चुकी है, उस पर विवेक का पूर्ण नियंत्रण नहीं रह गया है । माला ,तिलक, धोती पहनने से धर्म पालन नहीं होता । अपितु धर्म एक निष्ठापूर्वक आदर्श हैं ।
वर्तमान समय में धर्म के विषय में भिन्न लोगों ने भिन्न व्याख्याएँ दी हैं। इसलिए धार्मिक कट्टरता भी बढ़ गई है। कई लोगों ने यह भी कहा है कि धर्म प्रगति में बाधक है। अगर हम आदिपुरुष स्वयंभू मनू द्वारा प्रस्तुत धर्म की अवधारणा पर गौर करें, तो हम पाते हैं कि हर व्यक्ति को उसका पालन करना चाहिए। चाहे वह किसी भी मत को मानता हो।
आदिपुरुष मनू के अनुसार धर्म की लक्षण है ,
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ।।
अर्थात धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय, शोच, इंद्रिय संयम, बुद्धि, ज्ञान, सत्य और अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण है । जिस धर्म में ये दस लक्षण प्रकट होते हैं, वही सच्चा धर्म है।
समस्याओं या खतरों से विचलित हुए बिना अपना कर्तव्य निभाते रहने से धैर्य प्राप्त होता है। इसलिए, जिस व्यक्ति ने आपके साथ हिंसा या हानि की है, उससे बदला न ले ,कोई भी बूरी भावना न रखे ,भले ही आपमें ऐसा करने की क्षमता हो। बल्कि सबकुछ भगवान पर छोड़ दे । यही क्षमादान कहलाएगा ।
पाँचों कर्मेन्द्रियों को संयमित करके अपने कर्तव्य का पालन करने की क्रिया ही सच्चा आत्मसंयम है । दूसरों की चीज़ों का लालच, चोरी या गबन करने की गुणों को त्यागकर ही अस्तेय प्राप्ति संभव है ।
जो सत्य से प्रेम करता है और मधुर वचन बोलता है, उसे अपने वचनों में सत्यता प्राप्त होती है। इसलिए, सभी प्राणियों के आत्मा में राम-भाव रखकर मन में ईश्वर का नाम स्मरण करना आवश्यक है तभी मन शुद्ध होगी ।
गूढ़ विद्या ही सांसारिक और प्राकृतिक ज्ञान है। इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि ये आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित कर , अपना-पराया भाव छोड़कर सत्य की पथ पर चलने की कोशिश करना चाहिए । समाज, देश, परिवार और स्वयं में शांतिपूर्वक रहने के लिए धर्म के इन लक्षणों का पूर्णतः पालन करना आवश्यक है। जो लोग स्वयं को आधुनिक प्रगतिशील मानते हैं, वे धर्म के इन लक्षणों का उल्लेख किए बिना ही कुछ विचित्र टिप्पणियाँ करते हैं।
आज हमारे समाज में सामूहिक सोच का अभाव है। लोग वासना के नशे में चूर हैं। स्थूल सोच ने लोगों को आत्मकेंद्रिक बना दिया है, जिसके चलते समाज में भ्रष्टाचार और दुर्नीति व्याप्त हैं । ऐसी स्थिति में आम जनता को धार्मिक ध्रुवीकरण के पक्षधर पाखंडियों को पहचानना और उन्हें नकारना सीखना होगा। तभी मानव जाति की पहचान धरती पर सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में बची रहेगी, अन्यथा धर्म पर आधारित मानवीय व्यक्तित्व इस सुंदर धरती को अमानवों का निवासस्थल के रूप में चिह्नित करते रहेंगे।
मूल लेखिका : मनीषा शर्मा
अनुवादक :रितेश शर्मा
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