देवानंद सिंह
छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से बीते कुछ दिनों में जो खबरें आई हैं, वे दशकों से देश को जकड़े एक आंतरिक सुरक्षा संकट के अंत का संकेत देती हैं। दो दिनों के भीतर 258 नक्सलियों का आत्मसमर्पण, यह केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के इतिहास में हिंसा और विकास के बीच लंबी जद्दोजहद के एक निर्णायक मोड़ का प्रतीक है। कभी जो नक्सलवाद 200 जिलों तक फैलकर लाल गलियारा बना चुका था, वह अब सिमटकर मात्र 11 जिलों तक रह गया है। यह आंकड़ा न सिर्फ सुरक्षा बलों के साहस का परिणाम है, बल्कि उन नीतिगत परिवर्तनों और सामाजिक साझेदारियों का भी सबूत है, जिन्होंने इस लड़ाई को केवल बंदूक से नहीं, बल्कि संवाद, विकास और भागीदारी से भी लड़ा।
नक्सलवाद की जड़ें जिस वैचारिकी में थीं, यानी भूमि सुधार, सामाजिक समानता और राज्य के शोषण के खिलाफ संघर्ष, वह धीरे-धीरे हिंसा और वर्चस्व की लड़ाई में बदल गई। बीते कुछ वर्षों में यह विचारधारा अपने ही समर्थकों के बीच अविश्वास और थकान का शिकार हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ इस साल अब तक 312 नक्सली मारे गए हैं, 836 गिरफ्तार हुए हैं, और करीब 1600 ने आत्मसमर्पण किया है। यह रुझान इस बात का संकेत है कि जंगलों में छिपे हथियारबंद गुट अब खुद को असुरक्षित और असहाय महसूस करने लगे हैं।
सबसे बड़ा झटका नक्सल आंदोलन को तब लगा जब मई 2025 में सीपीआई (माओवादी) के जनरल सेक्रेटरी नरसिम्हा उर्फ नंबाला केशव राव (बसवराजू) को सुरक्षाबलों ने ढेर कर दिया। बसवराजू केवल संगठन का चेहरा नहीं थे, बल्कि रणनीतिक सोच और कमांड के अंतिम स्तंभ भी माने जाते थे। उनके मारे जाने के बाद संगठन नेतृत्वविहीन हो गया। इसके अलावा, पिछले सालों में माओवादी पोलित ब्यूरो के कई सदस्य मारे गए या पकड़े गए, जिससे नक्सल ढांचे की रीढ़ लगभग टूट गई।
कभी नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकार का नाम लेना भी खतरे से खाली नहीं था। पर अब वही इलाका “सरकार के साथ” खड़ा दिख रहा है। इसका श्रेय केवल सैन्य रणनीति को नहीं, बल्कि उन बहुस्तरीय नीतियों को भी जाता है, जिनके तहत 2015 में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय नीति और कार्ययोजना को मंजूरी दी थी। इस योजना में
सुरक्षा, विकास और अधिकार तीन मुख्य स्तंभ रखे गए।
पहले चरण में फोकस सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने पर था। विशेष बलों की तैनाती, इंटेलिजेंस नेटवर्क का विस्तार, और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय ने नक्सलियों की गतिशीलता को सीमित किया। इसके बाद धीरे-धीरे प्रशासनिक ढांचा उन क्षेत्रों में पहुंचा जहां दशकों तक शासन का कोई नामोनिशान नहीं था। दूसरा चरण विकास और पुनर्वास पर केंद्रित था। सड़कों, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं ने स्थानीय आबादी का भरोसा जीता। एक समय में नक्सली इन इलाकों में समानता और इंसाफ़ के नाम पर शासन करते थे, लेकिन जब सरकार ने इन समुदायों को आत्मनिर्भरता और रोजगार के अवसर दिए, तो लोगों को एहसास हुआ कि बंदूक नहीं, विकास ही असली मुक्ति का रास्ता है।
तीसरा और सबसे अहम पहलू आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा था। वनाधिकार कानून, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम और स्थानीय निर्णय प्रक्रिया में आदिवासियों की भागीदारी जैसे कदमों ने सरकार और समाज के बीच की दूरी को घटाया। किसी भी विद्रोह को केवल हथियार से नहीं, बल्कि विचार से हराया जा सकता है। नक्सल विरोधी अभियान की सफलता का सबसे बड़ा कारण यह है कि अब आदिवासी समाज नक्सलियों के साथ नहीं, बल्कि शांति और विकास के साथ खड़ा है। दशकों तक नक्सलियों ने इन्हीं समुदायों को भय, हिंसा और गलत सूचनाओं के दम पर अपने नियंत्रण में रखा। वे सरकारी योजनाओं को रोकते थे, स्कूल जलाते थे, सड़कों को नुकसान पहुंचाते थे, ताकि क्षेत्र विकास से कटे रहें और लोग उनके प्रभाव में बने रहें, लेकिन अब जब शिक्षा और संचार के माध्यम से इन इलाकों में जागरूकता आई है, तो स्थानीय लोग खुद नक्सलियों से मुंह मोड़ने लगे हैं। आत्मसमर्पण करने वालों में बड़ी संख्या उन्हीं युवाओं की है जिन्हें कभी जनता की सेना के नाम पर हथियार थमाए गए थे।
नक्सल आंदोलन की बुनियाद जिस वैचारिक ढांचे पर रखी गई थी, वह अब खोखली हो चुकी है। जो आंदोलन कभी सामाजिक न्याय की मांग से शुरू हुआ था, वह अब निर्दोष ग्रामीणों की हत्या, सरकारी परियोजनाओं की तबाही और पुलिसकर्मियों के अपहरण तक सीमित हो गया। इस हिंसक मोड़ ने इसकी नैतिक वैधता पूरी तरह खत्म कर दी। आत्मसमर्पण करने वाले कई नक्सली खुले तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि उन्हें अब अपने रास्ते पर विश्वास नहीं रहा। यह बदलाव बताता है कि बंदूक से परिवर्तन लाने की कोशिश आखिरकार आत्मघाती होती है। समाज में स्थायी बदलाव केवल लोकतंत्र और संवाद से ही संभव है, हालांकि नक्सलवाद के ढलान पर आने के बावजूद जश्न का यह समय नहीं है। अभी भी कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां नक्सलियों की पकड़ बनी हुई है, विशेषकर छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड के कुछ हिस्सों में। इन इलाकों में सशस्त्र गतिविधि भले कम हो गई हो, लेकिन विचारधारात्मक प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्थायी शांति स्थापित करना है, इसके लिए केवल हथियार डालने वालों का पुनर्वास नहीं, बल्कि स्थानीय विकास योजनाओं में तीव्रता जरूरी है। 2015 की नीति के तहत जिन कार्यक्रमों की शुरुआत हुई थी, जैसे अस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, वन धन योजना और ई-गवर्नेंस मिशन, उन्हें अब गति देने का वक्त है। हर निर्णय के केंद्र में स्थानीय समुदाय होना चाहिए। खासकर, आदिवासियों की सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि वे अपने भविष्य के निर्माता खुद बन सकें। यदि, यह विकास ऊपर से थोपा गया दिखेगा, तो असंतोष की नई जड़ें पनप सकती हैं।
नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों और जनता के बीच संबंध कभी अविश्वास पर आधारित थे। लेकिन अब धीरे-धीरे वह रिश्ता बदल रहा है, जहां कभी पुलिस कैंप देखकर लोग भयभीत हो जाते थे, अब वहीं बच्चे खेलते नजर आते हैं। यह परिवर्तन केवल रणनीति का नहीं, बल्कि भावना का भी है। सरकार को इस भावना को और मजबूत करना होगा। पुनर्वास नीतियों में शिक्षा, कौशल विकास, और आजीविका योजनाओं को प्रमुखता दी जानी चाहिए। आत्मसमर्पण करने वालों को सामाजिक संसाधन की तरह देखना होगा, न कि केवल पूर्व अपराधी के रूप में।
कुल मिलाकर, भारत के इतिहास में नक्सलवाद शायद सबसे लंबी और जटिल आंतरिक चुनौती रही है। यह आंदोलन न तो केवल बंदूक की लड़ाई था, न ही केवल विचारों की, बल्कि शासन, असमानता और अवसरों के अभाव का परिणाम था। आज जब यह आंदोलन अपने अंतिम चरण में है, तो यह भी याद रखना जरूरी है कि शांति केवल तब स्थायी होगी, जब न्याय, विकास और सम्मान हर नागरिक तक पहुंचे। सरकार और समाज दोनों के लिए यह अवसर है कि वे इस उपलब्धि को अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत के रूप में देखें, जिस दिन जंगलों में रहने वाला हर नागरिक यह महसूस करेगा कि लोकतंत्र उसका भी है, विकास उसका भी अधिकार है, और न्याय उसकी भी पहुंच में है, उसी दिन भारत नक्सलवाद को हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज कर सकेगा।

