लेखक: महेन्द्र तिवारी
सामान्य तौर पर जब भी राष्ट्रीयता या देश के नागरिक होने की बात आती है, तो पासपोर्ट को सबसे बड़ा और प्रामाणिक दस्तावेज़ माना जाता है। किसी विदेशी यात्रा पर जाते समय यही दस्तावेज़ हमारी पहचान और भारतीयता की गवाही देता है। लेकिन भारतीय कानूनी और संवैधानिक व्यवस्था के गहरे पन्नों को पलटें, तो एक बेहद चौंकाने वाला और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि भारतीय पासपोर्ट को भारत की नागरिकता का अंतिम और अकाट्य प्रमाण नहीं माना जाता है। कानून की नजर में यह केवल एक प्रथम दृष्टया साक्ष्य यानी शुरुआती सुबूत भर है, जिसे किसी गंभीर कानूनी विवाद की स्थिति में नागरिकता के अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस कानूनी पहेली को समझने के लिए हमें भारत के दो अलग-अलग कानूनों के बीच के बुनियादी अंतर को समझना होगा। पहला है पासपोर्ट अधिनियम 1967, जिसके तहत पासपोर्ट जारी किए जाते हैं, और दूसरा है नागरिकता अधिनियम 1955, जो किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण करता है। इन दोनों कानूनों के उद्देश्य और कार्यक्षेत्र बिल्कुल अलग हैं। पासपोर्ट मूल रूप से एक यात्रा दस्तावेज़ है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के दौरान धारक की पहचान स्थापित करना और भारत सरकार की ओर से विदेशी सरकारों से उसे सुरक्षा प्रदान करने का अनुरोध करना है। दूसरी ओर, नागरिकता एक गंभीर संवैधानिक दर्जा है, जो केवल नागरिकता अधिनियम 1955 के कड़े प्रावधानों जैसे जन्म, वंश, पंजीकरण या देशीकरण के आधार पर ही मिल सकता है।
भारतीय पासपोर्ट और नागरिकता: प्रमाणिकता का सवाल
व्यावहारिक धरातल पर देखें तो पासपोर्ट एक स्वतंत्र दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह अन्य सहायक दस्तावेजों जैसे जन्म प्रमाण पत्र, शैक्षणिक अंकतालिकाओं, मतदाता पहचान पत्र या आधार कार्ड के आधार पर तैयार किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति कपटपूर्ण तरीके से या गलत जानकारी देकर ये शुरुआती दस्तावेज़ बनवा लेता है और उनके आधार पर पासपोर्ट प्राप्त करने में सफल हो जाता है, तो मात्र पासपोर्ट की भौतिक उपस्थिति उसे कानूनी रूप से भारत का नागरिक नहीं बना देती। जैसे ही धोखाधड़ी या अवैध तरीके से दस्तावेज हासिल करने का सच उजागर होता है, संबंधित अधिकारी उस पासपोर्ट को तुरंत रद्द करने के लिए अधिकृत होते हैं। भारत के न्यायिक इतिहास में भी यह बात पूरी तरह साफ की जा चुकी है। देश के सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों ने अपने कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि पासपोर्ट, आधार कार्ड या मतदाता सूची में नाम होना नागरिकता का अंतिम आधार नहीं हो सकता। न्यायालयों का मानना है कि ये दस्तावेज़ मुख्य रूप से देश के भीतर किसी व्यक्ति की पहचान और उसके निवास स्थान को प्रमाणित करते हैं, न कि उसकी वास्तविक नागरिकता को।
नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 9(2) इस विषय पर केंद्र सरकार को व्यापक और अंतिम अधिकार देती है। इस कानून के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता पर कोई सवाल या कानूनी विवाद खड़ा होता है, तो उसका फैसला करने की शक्ति केवल और केवल केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास है। पासपोर्ट जारी करने वाले अधिकारी के पास किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से नागरिक घोषित करने या उसकी नागरिकता के विवाद को न्यायिक रूप से सुलझाने का कोई अधिकार नहीं होता। इसके अलावा, भारत का संविधान किसी भी परिस्थिति में दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता है। यदि कोई भारतीय नागरिक किसी अन्य देश की नागरिकता स्वेच्छा से स्वीकार कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता नागरिकता अधिनियम 1955 की धारा 9(1) के तहत स्वतः ही समाप्त हो जाती है, भले ही उसके पास भौतिक रूप से भारतीय पासपोर्ट मौजूद हो। ऐसी स्थिति में वह पासपोर्ट अवैध और निष्प्रभावी हो जाता है। इसलिए, हालांकि रोज़मर्रा के प्रशासनिक कार्यों, बैंक खातों को खुलवाने या विदेश यात्राओं के लिए पासपोर्ट राष्ट्रीयता का सबसे विश्वसनीय साधन है, लेकिन जब कभी ट्रिब्यूनल या अदालतों में किसी व्यक्ति की नागरिकता को कानूनी रूप से चुनौती दी जाती है, तब पासपोर्ट धारक को अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत अपने या अपने पूर्वजों के जन्म और निवास से जुड़े मूल ऐतिहासिक साक्ष्य ही प्रस्तुत करने पड़ते हैं। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

