लेखक: देवानंद सिंह
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल अब केवल भारत की कूटनीतिक मांग नहीं रह गया है, बल्कि यह बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना का स्वाभाविक परिणाम बनता जा रहा है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का सुरक्षा परिषद में सुधार और विस्तार के पक्ष में खुलकर बोलना तथा भारत को इस मांग को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख देशों में शामिल करना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। रूस और चीन की ओर से भारत की बड़ी भूमिका का समर्थन इस बहस को और वजन देता है।
लेकिन इस समय सबसे जरूरी है कि इस घटनाक्रम को भावनाओं के बजाय यथार्थ की कसौटी पर देखा जाए। भारत को स्थायी सदस्यता का समर्थन मिलना और भारत को वीटो का अधिकार मिल जाना दो अलग-अलग बातें हैं। वीटो का अधिकार अभी भारत को नहीं मिला है और न ही इसके तत्काल मिलने की कोई औपचारिक घोषणा हुई है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि भारत की दावेदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में पहुंच चुकी है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ऐतिहासिक विसंगति
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना उस समय की देन है, जब दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध से निकल रही थी। 1945 में जिन पांच देशों को स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार मिला, उस समय की वैश्विक शक्ति-व्यवस्था आज पूरी तरह बदल चुकी है। एशिया आज विश्व अर्थव्यवस्था का प्रमुख केंद्र है। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, उसकी जनसंख्या और बाजार दोनों विशाल हैं और वह आर्थिक, सामरिक तथा तकनीकी क्षेत्र में लगातार अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। इसके बावजूद दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्था में भारत की स्थायी भूमिका नहीं होना निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक विसंगति है।
भारत का दावा इसलिए भी मजबूत है क्योंकि उसने दशकों से संयुक्त राष्ट्र की शांति व्यवस्था में योगदान दिया है। विकासशील देशों की आवाज उठाने से लेकर वैश्विक संकटों में जिम्मेदार भूमिका निभाने तक भारत ने यह साबित किया है कि वह केवल अपने राष्ट्रीय हित की बात करने वाला देश नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में जिम्मेदार भागीदार बनने की क्षमता रखता है।
यही कारण है कि सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग को अब टाला जाना कठिन होता जा रहा है। यदि संयुक्त राष्ट्र वास्तव में दुनिया की सामूहिक आवाज है, तो उसकी सबसे शक्तिशाली संस्था में दुनिया के बड़े हिस्से का पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को वर्तमान व्यवस्था में जितना प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, उतना नहीं मिला है।
भारत को वीटो का अधिकार: रूस और चीन का समर्थन
भारत के लिए रूस और चीन का समर्थन विशेष महत्व रखता है। दोनों ही सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और वीटो शक्ति रखते हैं। रूस का समर्थन भारत के लिए पुराना और लगातार रहा है, जबकि चीन का समर्थन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन स्वयं मौजूदा व्यवस्था का स्थायी सदस्य है। हालांकि चीन के समर्थन को लेकर भी भारत को सतर्क कूटनीति की आवश्यकता होगी। किसी घोषणा या बयान को अंतिम सफलता मान लेना उचित नहीं होगा।
असल चुनौती अब यह है कि भारत अपने पक्ष में बने समर्थन को व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति में बदल पाए। सुरक्षा परिषद में सुधार आसान प्रक्रिया नहीं है। मौजूदा स्थायी सदस्यों के हित, क्षेत्रीय समीकरण और वीटो की व्यवस्था इसमें बड़ी बाधा हैं। इसलिए भारत को लंबी कूटनीतिक लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा।
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न है—अगर भारत को स्थायी सदस्यता मिलती है तो क्या उसे वीटो भी मिलेगा? भारत के लिए यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल स्थायी सदस्यता, बिना समान अधिकारों के, मौजूदा असमानता को पूरी तरह समाप्त नहीं करेगी। यदि नए स्थायी सदस्यों को पुराने स्थायी सदस्यों के समान अधिकार नहीं दिए जाते, तो सुरक्षा परिषद में दो श्रेणी की स्थायी सदस्यता पैदा हो जाएगी। यह सुधार के मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी की दृष्टि और वैश्विक दक्षिण की आवाज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि वैश्विक दक्षिण को केवल नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने वाला भी होना चाहिए, इसी व्यापक परिवर्तन की मांग है। दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं है। आर्थिक शक्ति कई केंद्रों में बंट रही है और राजनीतिक प्रभाव भी तेजी से बदल रहा है। ऐसे में 1945 की शक्ति-संरचना के आधार पर 2026 की दुनिया को संचालित करना लंबे समय तक संभव नहीं हो सकता।
भारत को भी इस मौके का इस्तेमाल केवल वीटो पाने की मांग तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उसे दुनिया के विकासशील देशों की सामूहिक आवाज को और मजबूत करना चाहिए। अफ्रीकी देशों, लैटिन अमेरिका और एशिया के देशों के साथ भारत की कूटनीतिक साझेदारी इस अभियान को नई ताकत दे सकती है।
गुटेरेस का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह उस सोच को अंतरराष्ट्रीय वैधता देता है, जिसके अनुसार संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को आज की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। लेकिन भारत को अभी उत्सव मनाने के बजाय अपनी कूटनीतिक रणनीति को और तेज करने की जरूरत है।
भारत का वीटो अभी आया नहीं है, लेकिन वीटो की बहस अब दुनिया के केंद्र में जरूर आ गई है। यह भारत की बढ़ती शक्ति और बदलती विश्व व्यवस्था का संकेत है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बदलाव को केवल स्वीकार करता है या संयुक्त राष्ट्र की संरचना में उसे स्थायी रूप भी देता है।
समय की मांग साफ है—विश्व व्यवस्था बदली है तो उसकी संस्थाएं भी बदलनी चाहिए। और अगर संयुक्त राष्ट्र को वास्तव में विश्व का संगठन बने रहना है, तो भारत को निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में स्थान देना अब टालने का नहीं, स्वीकार करने का विषय होना चाहिए।

