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    Home » “हम पूरी तरह भारतीय कैसे दिखें?” एक हत्या और हमारे समाज का आईना
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    “हम पूरी तरह भारतीय कैसे दिखें?” एक हत्या और हमारे समाज का आईना

    News DeskBy News DeskJanuary 13, 2026No Comments3 Mins Read
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    “हम पूरी तरह भारतीय कैसे दिखें?” एक हत्या और हमारे समाज का आईना

    देवानंद सिंह
    उत्तराखंड की शांत मानी जाने वाली राजधानी देहरादून में हुआ एंजेल चकमा की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज के भीतर छिपे उस कड़वे सच को उजागर करती है, जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं—नस्लवाद और भेदभाव।
    त्रिपुरा से पढ़ाई के लिए देहरादून आए दो भाई, एंजेल और माइकल चकमा, बेहतर भविष्य का सपना लेकर यहां पहुंचे थे। लेकिन 9 दिसंबर की वह शाम उनके परिवार के लिए ऐसा ज़ख़्म छोड़ गई, जो शायद कभी नहीं भर पाएगा। कथित तौर पर नस्लीय गालियों, विरोध करने पर हिंसा और अंततः एक युवा छात्र की मौत—यह सब सवाल खड़े करता है कि क्या भारत में “भारतीय” होने की भी कोई एक तय शक्ल-सूरत है?
    पुलिस भले ही इस हमले को नस्लीय भेदभाव से जोड़ने से इनकार कर रही हो, लेकिन पीड़ित परिवार और देशभर में उठे विरोध के स्वर कुछ और ही कहानी कहते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों से आने वाले लोग वर्षों से यह शिकायत करते रहे हैं कि उन्हें “चाइनीज़”, “नेपाली” या “बाहरी” कहकर अपमानित किया जाता है। यह मानसिकता न सिर्फ़ असंवैधानिक है, बल्कि भारत की बहुलतावादी आत्मा के भी खिलाफ़ है।

     

    सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई जैसे महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक, पूर्वोत्तर के छात्र और कामकाजी युवा अक्सर नस्लीय टिप्पणियों, सामाजिक बहिष्कार और हिंसा का सामना करते हैं। हर बार कुछ दिन का आक्रोश होता है, बयान आते हैं, मोमबत्तियां जलती हैं—और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है।
    यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम राष्ट्रीय एकता की बात तो करते हैं, लेकिन क्या हमने एक-दूसरे को स्वीकार करना सीखा है? “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” केवल नारा नहीं, बल्कि व्यवहार में उतरने वाला विचार होना चाहिए।
    ज़रूरत इस बात की है कि कानून अपना काम सख़्ती से करे और अगर नस्लीय कोण है तो उसे स्वीकार कर कार्रवाई हो। साथ ही समाज के स्तर पर भी आत्ममंथन ज़रूरी है—स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक जीवन में संवेदनशीलता, विविधता और सम्मान की शिक्षा दी जानी चाहिए।

     

    एंजेल चकमा की मौत एक चेतावनी है। अगर आज भी हम यह पूछते रहेंगे कि “कौन पूरी तरह भारतीय दिखता है”, तो कल यह सवाल किसी और के जीवन पर भारी पड़ सकता है।
    भारत की पहचान उसके रंग, चेहरे या बोली से नहीं, बल्कि उसके संविधान और मूल्यों से है और इन्हें बचाना हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है।

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