लेखक: देवानंद सिंह
भारत और सोने का रिश्ता केवल निवेश का नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और भावनाओं का भी है। शादी-ब्याह से लेकर त्योहारों तक, सोना भारतीय परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण उपभोक्ताओं में भारत का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। लेकिन अब यही सोना सरकार के लिए आर्थिक अवसर के रूप में भी दिखाई दे रहा है।
सोना भारतीय परिवारों: सांस्कृतिक महत्व से आर्थिक अवसर तक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में देशवासियों से कुछ समय तक नया सोना खरीदने से परहेज करने की अपील ने एक नई बहस को जन्म दिया है। सरकार का तर्क है कि सोने का अत्यधिक आयात देश के व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ाता है। ऐसे में यदि घरों, तिजोरियों और मंदिरों में वर्षों से निष्क्रिय पड़ा सोना आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बन सके, तो इससे देश को बड़ा लाभ मिल सकता है।
अनुमान है कि भारतीय परिवारों और धार्मिक संस्थानों के पास 30 से 32 हजार टन, जबकि कुछ आकलनों के अनुसार 35 हजार टन तक सोना मौजूद है। इसकी कीमत कई ट्रिलियन डॉलर आंकी जाती है। यह एक ऐसा विशाल भंडार है जो कागजों पर संपत्ति है, लेकिन अर्थव्यवस्था के लिए सक्रिय पूंजी नहीं बन पा रहा है। सरकार की सोच यही है कि यदि इस सोने का मात्र एक प्रतिशत हिस्सा भी हर वर्ष बाजार में लौट आए, तो सोने के आयात में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है और विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत हो सकती है।
गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम की चुनौतियाँ
हालांकि यह लक्ष्य सुनने में जितना आसान लगता है, व्यवहार में उतना ही कठिन है। भारतीय समाज में सोना केवल धातु नहीं, बल्कि पीढ़ियों की बचत और संकट के समय की सुरक्षा माना जाता है। लोग बैंक या अन्य वित्तीय साधनों की तुलना में सोने पर अधिक भरोसा करते हैं। यही वजह है कि पहले भी गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम जैसी योजनाओं को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। लोगों को अपने पारिवारिक आभूषण बैंक में जमा करने या उन्हें पिघलाकर आर्थिक परिसंपत्ति में बदलने को लेकर संकोच रहा है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती विश्वास पैदा करने की होगी। यदि नागरिकों को यह भरोसा नहीं होगा कि उनका सोना पूरी सुरक्षा के साथ संरक्षित रहेगा और उन्हें उचित आर्थिक लाभ मिलेगा, तो वे अपनी तिजोरियां खोलने के लिए तैयार नहीं होंगे। केवल अपील या नीतिगत घोषणा से यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।
आयात कम करने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का अवसर
दूसरी ओर, यह भी सच है कि लगातार बढ़ते सोने के आयात से देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है। भारत अपनी अधिकांश जरूरतों के लिए विदेशों पर निर्भर है और हर साल अरबों डॉलर का सोना आयात करता है। यदि घरेलू स्तर पर उपलब्ध सोने का पुनर्चक्रण और पुनः उपयोग बढ़ाया जाए, तो इससे आयात बिल कम होगा, चालू खाता घाटा नियंत्रित रहेगा और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव भी घटेगा।
सरकार का उद्देश्य केवल लोगों का सोना हासिल करना नहीं, बल्कि निष्क्रिय संपत्ति को आर्थिक गतिविधि से जोड़ना है। लेकिन इस दिशा में सफलता तभी मिलेगी जब नीतियां सरल, पारदर्शी और आकर्षक हों। लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि वे अपनी परंपरागत संपत्ति खो नहीं रहे, बल्कि उसे आर्थिक शक्ति में बदल रहे हैं।
भारत की तिजोरियों में बंद 32 हजार टन सोना वास्तव में एक विशाल आर्थिक संसाधन है। सवाल यह नहीं है कि सरकार की नजर इस सोने पर है, बल्कि यह है कि क्या सरकार ऐसा भरोसेमंद तंत्र बना पाएगी जिससे जनता स्वयं इस निष्क्रिय संपत्ति को देश की आर्थिक प्रगति का हिस्सा बनाने के लिए आगे आए। यदि ऐसा संभव हुआ, तो यह केवल आयात बिल घटाने की रणनीति नहीं होगी, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक नई वित्तीय क्रांति साबित हो सकती है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]

