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    Home » इतिहास के पन्नों से : 1992 बिहार भवन की गूंज और आज की राजनीति
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    इतिहास के पन्नों से : 1992 बिहार भवन की गूंज और आज की राजनीति

    1992 में सरयू राय का लिखा पत्र आज भी प्रासंगिक है क्योंकि उस समय लोकतांत्रिक असहमति की परंपरा थी
    News DeskBy News DeskJuly 16, 2025No Comments3 Mins Read
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    इतिहास के पन्नों से

    1992 बिहार भवन की गूंज और आज की राजनीति

    1992 में सरयू राय का लिखा पत्र आज भी प्रासंगिक है क्योंकि उस समय लोकतांत्रिक असहमति की परंपरा थी

    देवानंद सिंह
    बिहार की राजनीति अक्सर अप्रत्याशित घटनाओं और व्यक्तित्वों की तीव्र टकराहटों से परिभाषित होती रही है। वर्ष 1992 में दिल्ली स्थित बिहार भवन में घटित “गाली कांड” इसका एक प्रतीकात्मक उदाहरण है, जिसकी प्रतिध्वनि आज भी बिहार की राजनीतिक परछाइयों में सुनी जा सकती है। वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर की पुस्तक “Single Man: The Life & Times of Nitish Kumar of Bihar” में वर्णित यह प्रकरण न केवल नेताओं के बीच तीखी वैचारिक और व्यक्तिगत खाई को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि सार्वजनिक जीवन में निजी अहंकार और वर्चस्व की लड़ाई किस हद तक जा सकती है।

     

    लालू यादव और ललन सिंह के बीच उस दिन हुआ टकराव, और नीतीश कुमार की प्रतिक्रिया — यह सब एक ऐसे मोड़ की तरफ इशारा करता है जहाँ बिहार की राजनीति ने करवट ली। यह केवल एक “गाली गलौज” या “धक्का मुक्की” की घटना नहीं थी, बल्कि उस वैचारिक अलगाव की नींव थी जो आगे चलकर नीतीश और लालू के रिश्तों को दशकों तक प्रभावित करता रहा। यह वही दौर था जब राजनीतिक गठबंधन तात्कालिक लाभ के आधार पर बनते-बिगड़ते थे, परंतु निजी कड़वाहटें स्थायी प्रभाव छोड़ जाती थीं।

     

    आज जब बिहार चुनाव फिर से दस्तक दे रहे हैं, इस घटना की चर्चा प्रासंगिक हो उठी है। यह इसलिए नहीं कि पुराने जख्म कुरेदे जाएं, बल्कि इसलिए कि जनता समझे कि नेताओं के बीच की वर्तमान एकता या विरोध कितनी गहरी जड़ें रखती है। राजनीति में विचारधारा से अधिक अहम भूमिका संबंधों और स्वभाव की होती है — और बिहार भवन कांड इसका जीवंत उदाहरण है।

     

    सवाल उठता है कि क्या आज की पीढ़ी के नेता इससे कोई सबक ले रहे हैं? क्या राजनीति को व्यक्तिगत गरिमा और जनहित के आधार पर नहीं गढ़ा जाना चाहिए, बजाय इसके कि उसे अपमान, गाली और धमकी का मंच बना दिया जाए? दुर्भाग्यवश, वर्तमान राजनीति में भी ऐसे दृश्य अब अपवाद नहीं, आम होते जा रहे हैं।

    इस घटना के माध्यम से नीतीश कुमार के संयम और राजनीतिक दूरदृष्टि को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। जब उन्होंने सरयू राय को पत्र लिखवाया और अपनी असहमति को एक औपचारिक दस्तावेज में दर्ज किया — वह दरअसल लोकतांत्रिक असहमति की परंपरा थी, जो अब धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।

     

    Sona

    आज जब मतदाता फिर से अपने जनप्रतिनिधि चुनने की तैयारी कर रहे हैं, यह जरूरी है कि वे नेताओं की इतिहास में दर्ज इन घटनाओं को पढ़ें, समझें और सोचें — क्या वही लोग आज भी भरोसे के लायक हैं? राजनीति में व्यक्तित्व नहीं, विचार और व्यवहार निर्णायक होने चाहिए।

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