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    पश्चिमी सिंहभूम में हाथी का आतंक जारी, हाथी और हालात, दोनों बेकाबूवन विभाग और प्रशासन के दावे और वादे फेल

    dhiraj KumarBy dhiraj KumarJanuary 10, 2026No Comments3 Mins Read
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    पश्चिमी सिंहभूम में हाथी का आतंक जारी, हाथी और हालात, दोनों बेकाबूवन विभाग और प्रशासन के दावे और वादे फेल

    राष्ट्र संवाद संवाददाता मृत्युंजय बर्मन

    पश्चिमी सिंहभूम जिले के मझगांव प्रखंड अंतर्गत बेनिसागर क्षेत्र में शनिवार को भी हाथियों का आतंक जारी रहा। झारखंड व ओडिशा सीमा पर सक्रिय एक बिछड़ा हुआ दंतैल हाथी अब पूरी तरह जानलेवा साबित हो चुका है, लेकिन वन विभाग और प्रशासन की तमाम कवायदों के बावजूद उसे काबू में नहीं किया जा सका है।

    गजराज से यमराज बना यह ‘खूनी हाथी’ एक बार फिर झारखंड की सीमा में दाखिल हो गया। बताते हैं कि चाईबासा वन विभाग ने देर शाम घंटों मशक्कत के बाद हाथी को ओडिशा के जंगलों की ओर खदेड़ा दिया था लेकिन सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए ओडिशा के वनकर्मियों ने उसे वापस झारखंड की ओर मोड़ दिया। नतीजतन, देर रात हाथी ने फिर चाईबासा सीमा में प्रवेश कर लिया और वन विभाग की टीमें एक बार फिर केवल ‘सर्च ऑपरेशन’ तक सीमित रह गईं।

    हाथी को काबू करने के लिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा और गुजरात से बुलाई गई अत्याधुनिक संसाधनों से लैस ‘वनतारा रेस्क्यू टीम’ भी नाकाम साबित हुई। विभाग ने तीन बार ट्रैंक्यूलाइज गन से हाथी को बेहोश करने की कोशिश की, लेकिन तीनों प्रयास विफल रहे। अभियान के दौरान हाथी ने हाथियों को भगाने के एक विशेषज्ञ पर जानलेवा हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल विशेषज्ञ को अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इस घटना ने पूरे बचाव अभियान की तैयारियों और रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    गौरतलब है कि यह दंतैल हाथी 1 जनवरी से अब तक आधिकारिक रूप से 21 लोगों की जान ले चुका है। सवाल है कि इतनी बड़ी संख्या में मौतों के बाद भी उसे नियंत्रित करने की कोई ठोस और प्रभावी योजना क्यों नहीं बन पाई। हाथी की तेज रफ्तार, प्रतिदिन लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय करना, को भी विभाग अपनी असफलता छिपाने का बहाना बना रहा है।

    स्थिति को और गंभीर बनाता है झारखंड व ओडिशा सीमा पर आपसी समन्वय का अभाव। ग्रामीणों के अनुसार हाथी रात भर सीमा क्षेत्र में घूमता रहा, लेकिन समय रहते न तो गांवों को अलर्ट किया गया और न ही प्रभावी रोकथाम की गई। सवाल उठ रहा है कि जब लोकेशन ट्रैकिंग की सुविधा उपलब्ध है, तो प्रशासन हर बार लाशें गिरने के बाद ही क्यों सक्रिय होता है।

    विडम्बना देखिये, हाथियों को भगाने के एक विशेषज्ञ, जो अभियान के दौरान हाथी की चपेट में आ गया और गंभीर रुप से घायल होकर हॉस्पिटल में दम तोड़ दिया, उसी का विभाग ग्रामीणों को सुरक्षा का भरोसा देता है। वह खुद अपने प्रशिक्षित कर्मियों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, आधुनिक संसाधन और ठोस प्रशिक्षण देने में नाकाम साबित हुआ है। जब ‘रक्षक’ ही असुरक्षित हैं, तो आम ग्रामीणों से आत्मरक्षा की उम्मीद करना अपने आप में एक क्रूर मजाक जैसा प्रतीत होता है

    इधर, बेनिसागर और आसपास के गांवों में लोग भय और आक्रोश दोनों से भरे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन केवल घटनाओं के बाद सक्रिय होता है, जबकि समय रहते चेतावनी प्रणाली, रात्री गश्ती और सुरक्षित निकासी की व्यवस्था नहीं की गई। 21 मौतों और अब एक विशेषज्ञ की जान जाने के बाद भी यदि हाथी आजाद घूम रहा है, तो यह वन विभाग और प्रशासन की गंभीर विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण माना जा रहा है।

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