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    Home » पत्रकारिता के मूल भाव को समझे पत्रकार
    Breaking News Headlines संपादकीय

    पत्रकारिता के मूल भाव को समझे पत्रकार

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 1, 2021Updated:October 1, 2021No Comments5 Mins Read
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    देवानंद सिंह

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमेरिका दौरा कई मायनों की वजह से चर्चा में रहा। इसके अलावा जो एक और घटना की चर्चा हुई, उसमें न्यूज एंकर अंजना ओम कश्यप का संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान को खरी-खोटी सुनाने वाली भारतीय विदेश सेवा की युवा अधिकारी स्नेहा दूबे के ऑफिस में बिना अनुमति के घुसना रहा। इस मामले में स्नेहा दूबे द्वारा अंजना ओम कश्यप को नम्रता के साथ जाने के लिए कहने की खूब तारीफ हो रही है, जबकि अंजना ओम कश्यप का बिना अनुमति के एक विदेश सेवा के अधिकारी के ऑफिस में घुसने वाली बात पर खूब आलोचना हो रही है। लोगों का ऐसा सोचना बिलकुल सही है, क्योंकि इस वक्त मीडिया जिस तरह का रोल प्ले कर रहा है, वास्तव में वह बहुत ही शर्मनाक है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान को खरी-खोटी सुनाने पर भारतीय विदेश सेवा की युवा अधिकारी स्नेहा दूबे की खूब तारीफ हो रही है। हर तरह की मीडिया में उनके द्वारा संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए बयान की खूब तारीफ हो रही है। वास्तव में, यह हमारे लिए गर्व की बात है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत पाकिस्तान को हर बार ही नंगा करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में स्नेहा दूबे द्वारा दिए गए बयान को ही लेकर प्रतिक्रिया लेने अंजना ओम कश्यप उनके ऑफिस में बिना अनुमति के ही घुस गईं। क्या इतनी बड़ी सीनियर पत्रकार के लिए यह उचित था कि वह बिना अनुमति के ही एक महत्वपूर्ण ऑफिस में घुस जाए ? क्या उनके पास इतनी भी समझ नहीं थी कि यहां तैनात अधिकारियों की जिम्मेदारियां भी बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, ऐसा नहीं कि वह जब चाहे, तब मीडिया के

    सवाल पर प्रतिक्रिया देने लग जाए, जिसका विदेश सेवा की अधिकारी को पूरा भान था, जबकि न्यूज एंकर का तरीका बेहद ही हल्का और नासमझ वाला था। वास्तव में, यह उनकी एक्सक्लूसिव के चक्कर में जबरदस्ती गले पड़ने वाली हरकत थी। टीवी डिबेट में गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने वाली इस महिला एंकर को एक पल में बड़ी नम्रता के साथ उस महिला अधिकारी ने जाने को कहकर यह समझा दिया कि हर जगह का एक सिस्टम होता है, आपको यह भान होना चाहिए था कि वह कोई आपका टीवी स्टूडियो नहीं था, बल्कि संयुक्त राष्ट्र महासभा का ऑफिस था और महिला अधिकारी एक जिम्मेदार पद पर तैनात है, ऐसा तो नहीं कि वह भी नेताओं की तरह आपके माइक पर धड़ाधड़ बोलना शुरू कर देती। एक्सक्लूसिव के चक्कर में भले ही एंकर यह भूल गई थीं, लेकिन महिला अधिकारी ने जिस तरह उन्हें जाने को कहा, शायद इससे एंकर को भविष्य के लिए कुछ तो सीख मिलेगी। इस घटनाक्रम के बाद जहां मीडिया के हल्केपन को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वहीं विदेश सेवा की अधिकारी स्नेहा दूबे की खूब तारीफ हो रही है, क्योंकि जिस शालीनता का परिचय उन्होंने दिया, वह न केवल तारीफ के काबिल है, बल्कि गोदी मीडिया के लिए एक सबक भी। क्योंकि एंकर को यह समझने कि जरूरत थी कि संयुक्त राष्ट्र जैसे बड़े मंच पर स्नेहा दूबे की वह टिप्पणी उनकी निजी नहीं, बल्कि भारत की टिप्पणी थी। फिर उस पर प्रतिकिया मांगने का क्या मतलब था ? शायद, मीडिया के सामने उन्हें बोलने की अनुमति भी नहीं होती हो, लिहाजा अधिकारी ने सवाल पर कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय एंकर को नम्रता के साथ जाने को कह दिया। यह कोई पहली घटना नहीं है, जब टीवी एंकर ने इस तरह का गैर जिम्मेदाराना पूर्ण रवैया अपनाया, बल्कि टीवी रिपोर्टरों के लिए यह बेहद ही आम हो गया है, उन्हें किसी से कोई मतलब नहीं, बस उन्हें अपनी टीआरपी बढ़ाने से मतलब होता है। अपने हिसाब से हर विषय को बना देते हैं। यही वजह है कि मीडिया की लगातार साख गिर रही है। मीडिया की सूरत तब अच्छी लगती है, जब वह स्वतंत्रता और निष्पक्षता के पंख लगाकर उड़ रहा हो, लेकिन आज जिस तरह मीडिया ने अपने ये पंख खुद ही काट लिए हैं और उसके पीछे एक ऐसा तंत्र काम कर रहा हो, जो उससे केवल अपनी ही वाहवाही कराने में जुटा हो, वह मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के लिए बड़ा ही शर्मनाक है। इसका जिम्मेदार कोई और नहीं, बल्कि खुद को बड़ा बड़ा मीडिया संस्थान और पत्रकार मानने वाले लोग ही हैं। ये लोग स्वतंत्रता और निष्पक्षता का चोला त्यागकर दलाली का चोला पहने हुए हैं। यही वजह है कि मीडिया को गोदी मीडिया की उपाधि से नवाजा जा चुका है। सरकारी प्रवक्ता की तरह जिस तरह मीडिया काम कर रही है, उसने मीडिया से लोगों के विश्वास को कम कर दिया है। तमाम आलोचना के बाद भी न्यूज चैनलों में सरकार का बखान करना बंद नहीं हो रहा है। इससे लगता है कि ऐसे संस्थानों को आमजन के मुद्दों से कुछ लेना देना ही नहीं है। लिहाजा, जब तक मीडिया स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करेगा और पत्रकारिता के मूल भाव को नहीं समझेगा, तब तक लोग लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर विश्वास नहीं करेंगे।

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