Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » लोकतंत्र केवल चुनावों और सरकारों से नहीं चलता, बल्कि उसकी असली ताकत मौलिक अधिकारों की रक्षा में
    Breaking News Headlines उत्तर प्रदेश ओड़िशा खबरें राज्य से चाईबासा जमशेदपुर जामताड़ा झारखंड दुमका धनबाद पटना पश्चिम बंगाल बिहार बेगूसराय मुंगेर मुजफ्फरपुर रांची राजनीति राष्ट्रीय संथाल परगना संथाल परगना संपादकीय समस्तीपुर सरायकेला-खरसावां हजारीबाग

    लोकतंत्र केवल चुनावों और सरकारों से नहीं चलता, बल्कि उसकी असली ताकत मौलिक अधिकारों की रक्षा में

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीSeptember 5, 2025No Comments7 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    बिहार की औद्योगिक छलांग
    ईरान मिडिल ईस्ट तनाव
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    लोकतंत्र केवल चुनावों और सरकारों से नहीं चलता, बल्कि उसकी असली ताकत मौलिक अधिकारों की रक्षा में
    देवानंद सिंह
    भारत का संविधान नागरिकों को जो सबसे बड़ी गारंटी देता है, वह है मौलिक अधिकारों की रक्षा। इनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आज़ादी को सबसे अहम माना जाता है। लेकिन समय-समय पर ये अधिकार सत्ता, समाज और न्यायिक प्रक्रियाओं की जटिलताओं के बीच दबाव में आते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय श्रीनिवास ओक का हालिया वक्तव्य इस सच्चाई को एक बार फिर हमारे सामने रखता है। वे मानते हैं कि आज इन दोनों मौलिक अधिकारों पर सबसे बड़ा ख़तरा मंडरा रहा है।

     

    यह बात उन्होंने महज़ किसी विशेष राजनीतिक परिस्थिति या एक सरकार के संदर्भ में नहीं कही, बल्कि उनके अनुसार सत्ता में चाहे कोई भी पार्टी हो, मौलिक अधिकारों को सीमित करने की प्रवृत्ति भारतीय राज्य व्यवस्था में बार-बार सामने आई है। उनके लंबे न्यायिक करियर का अनुभव उन्हें इस निष्कर्ष तक लाता है कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए समाज और न्यायपालिका दोनों को अधिक सतर्क होना पड़ेगा।

    भारत जैसे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक ढांचे की आत्मा कहा जाता है, पर जस्टिस ओक साफ़ कहते हैं कि यह आज केवल कार्यपालिका से ही नहीं, बल्कि नागरिकों से भी ख़तरे में है। यानी सत्ता द्वारा बनाए गए क़ानून, दमन या पुलिसिया कार्रवाई ही नहीं, बल्कि नागरिकों की असहिष्णुता भी इस अधिकार को सीमित कर रही है।

     

    आज के समय में सोशल मीडिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जहां एक ओर यह नागरिकों को बोलने का मंच देता है, वहीं दूसरी ओर ट्रोलिंग, धमकियां और सामूहिक निंदा का माहौल किसी भी व्यक्ति को चुप करा देता है। इस तरह लोकतंत्र में नागरिक स्वयं ही एक-दूसरे की अभिव्यक्ति पर पहरा लगाने लगते हैं। जस्टिस ओक का यह कहना कि हमें सच सुनना पसंद नहीं है, दरअसल भारतीय समाज की उस प्रवृत्ति की ओर इशारा है, जिसमें आलोचना को तुरंत देशविरोध, धर्मविरोध या व्यक्तिगत हमले की संज्ञा दे दी जाती है। परिणाम यह होता है कि समाज का विवेक धीरे-धीरे सिकुड़ने लगता है। संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। परंतु व्यवहार में इसकी स्थिति चिंताजनक है। किसी व्यक्ति पर आरोप लगने मात्र से गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है। जांच बिना गिरफ्तारी के भी हो सकती है।

     

    लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत में अक्सर आरोपियों को महीनों, बल्कि सालों तक जेल में रखा जाता है। कई बार तो मुक़दमा शुरू भी नहीं होता और व्यक्ति अपनी ज़िंदगी का अहम हिस्सा जेल में गुज़ार देता है। दिल्ली दंगों के अभियुक्तों का उदाहरण जस्टिस ओक ने दिया, जिनमें से कई लगभग पांच वर्षों से बिना मुकदमा चले जेल में हैं। यह न केवल अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, बल्कि न्याय की बुनियादी अवधारणा के खिलाफ भी है।

    भारत की न्याय व्यवस्था में ज़मानत अपवाद नहीं बल्कि नियम होना चाहिए। परंतु ज़मीनी स्तर पर स्थिति उलट है। अब डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से आसानी से ज़मानत नहीं मिलती और लोगों को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ता है। इसका कारण कहीं न कहीं जजों की मानसिकता, मीडिया कवरेज का दबाव और समाज की अपेक्षाएं भी हैं। जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया लंबे समय से विवादों में रही है। कॉलेजियम प्रणाली को लेकर जस्टिस ओक का दृष्टिकोण स्पष्ट है। वे मानते हैं कि इसमें खामियां हो सकती हैं, पर अभी तक इससे बेहतर कोई व्यवस्था सामने नहीं आई है। कार्यपालिका को नियुक्तियों पर वीटो का अधिकार देना न्यायपालिका की स्वतंत्रता को पूरी तरह कमजोर कर देगा।

     

    सवाल यह भी उठता है कि क्या कॉलेजियम पर्याप्त रूप से समावेशी है? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायाधीशों की कमी पर उठे सवाल इसके प्रमाण हैं। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने भी इस पर आलोचना की कि कॉलेजियम ने सिफ़ारिश में वरिष्ठ महिला जजों की अनदेखी की। जस्टिस ओक ने स्वीकार किया कि कम से कम एक महिला न्यायाधीश पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए था। यह मुद्दा केवल लैंगिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की व्यापक प्रतिनिधित्व क्षमता और जनता के विश्वास से भी जुड़ा हुआ है। अगर, न्यायपालिका समाज की विविधता को प्रतिबिंबित नहीं करेगी तो उसकी वैधता सवालों के घेरे में आती रहेगी। न्यायपालिका की निष्पक्षता उसकी सबसे बड़ी पूंजी है, लेकिन समय-समय पर भ्रष्टाचार के आरोप इस संस्था पर भी लगते रहे हैं। जस्टिस ओक इस तथ्य को नकारते नहीं हैं। उनका कहना है कि शिकायतें ट्रायल कोर्ट स्तर पर अधिक आती हैं, हालांकि ठोस सबूत बहुत कम होते हैं।

     

    मुद्दा केवल वास्तविक भ्रष्टाचार का नहीं है, बल्कि उस धारणा का भी है जो जनता के मन में बैठ जाती है। दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के घर से बरामद नकदी का मामला इस धारणा को और गहरा करता है। ऐसे प्रकरण जनता का विश्वास हिला देते हैं और पूरी न्यायिक प्रणाली को संदेह के घेरे में ले आते हैं। क्या मीडिया कवरेज जजों के फैसलों को प्रभावित करता है? जस्टिस ओक मानते हैं कि यह पूरी तरह न्यायाधीश के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। कई जज ऐसे होते हैं जिन्हें इस बात की परवाह नहीं होती कि मीडिया क्या कहेगा, लेकिन कुछ पर असर दिखता है।

     

    दरअसल, न्यायिक प्रक्रिया की सार्वजनिकता एक लोकतांत्रिक मूल्य है, लेकिन जब यह अत्यधिक हो जाती है तो न्यायिक निष्पक्षता को खतरा पैदा कर सकती है। यदि न्यायाधीश यह सोचने लगे कि उनके आदेश को मीडिया कैसे प्रस्तुत करेगा, तो फैसले में न्याय के बजाय छवि की चिंता अधिक हावी हो सकती है। भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती लंबित मामलों का पहाड़ है। आज पांच करोड़ से अधिक मामले अदालतों में अटके हुए हैं। यह आंकड़ा किसी भी लोकतंत्र के लिए भयावह है।

    लंबित मामलों के कारण ही जनता का न्यायपालिका पर भरोसा कम हो रहा है। न्याय में देरी को न्याय से वंचित होना कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति सालों तक मुकदमा लड़ता रहता है और उसका जीवन अदालतों के चक्कर काटते बीत जाता है, तो स्वाभाविक है कि उसका विश्वास प्रणाली से उठने लगेगा। लिहाजा, एक ओर जजों की संख्या बढ़ाई जाए, वहीं दूसरी ओर सरकार को एक ठोस ‘लिटिगेशन पॉलिसी’ बनानी चाहिए। हर मामले को अदालत में लाना आवश्यक नहीं है। कई विवाद प्रशासनिक सुधारों और प्रभावी नीतियों से अदालतों में आने से पहले ही सुलझाए जा सकते हैं। भारतीय संविधान यह गारंटी देता है कि जिनके पास वकील रखने की क्षमता नहीं है, उन्हें राज्य मुफ्त कानूनी सहायता देगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि लीगल एड के वकीलों की गुणवत्ता कई बार बेहद कमज़ोर होती है।
    अगर, लीगल एड प्रभावी नहीं है, तो गरीब और वंचित वर्ग के नागरिकों के लिए न्याय तक पहुंच महज़ एक सपना बनकर रह जाता है। यह व्यवस्था मौलिक अधिकारों के समानता और न्याय की अवधारणा को खोखला कर देती है। वकील अब लंबी-लंबी दलीलें देने लगे हैं और निचली अदालतों से ज़मानत पाना मुश्किल हो गया है, भारतीय न्यायपालिका के भीतर आई मानसिकता के बदलाव की ओर इशारा करता है। यह बदलाव सिर्फ प्रक्रियागत नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक और राजनीतिक दबाव भी शामिल हैं।

    न्यायपालिका आज एक कठिन मोड़ पर खड़ी है। एक ओर उसे कार्यपालिका से स्वतंत्र रहना है, दूसरी ओर समाज की अपेक्षाओं और मीडिया के दबाव को भी संतुलित करना है। इसके साथ-साथ लंबित मामलों का बोझ और भ्रष्टाचार की छाया भी उससे निपटने की मांग करती है।

    कुल मिलाकर, जस्टिस अभय ओक की चेतावनी हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल चुनावों और सरकारों से नहीं चलता, बल्कि उसकी असली ताकत मौलिक अधिकारों की रक्षा में है। अगर, नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आज़ादी नहीं मिलेगी, तो लोकतंत्र खोखला हो जाएगा। न्यायपालिका को इस चुनौती का सामना करना है। उसे अपने भीतर पारदर्शिता, समावेश और दक्षता लानी होगी। साथ ही, नागरिक समाज को भी यह समझना होगा कि अधिकारों की रक्षा केवल अदालतों से नहीं होती, बल्कि हमारी आपसी सहिष्णुता और संविधान के प्रति सम्मान से भी होती है।जस्टिस ओक के शब्दों में, हमें सच सुनना सीखना होगा। यह केवल न्यायपालिका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए सबसे बड़ा सबक है।

    बल्कि उसकी असली ताकत मौलिक अधिकारों की रक्षा में लोकतंत्र केवल चुनावों और सरकारों से नहीं चलता
    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleभारतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीतियां
    Next Article साईबर अपराधियों के विरुद्ध जामताड़ा पुलिस की बड़ी कार्रवाई, एक युवक गिरफ्तार

    Related Posts

    जमशेदपुर में अस्मिता बॉक्सिंग सिटी लीग संपन्न, 98 बालिका खिलाड़ियों ने दिखाया दमखम

    April 28, 2026

    जमीन विवाद में लोको पायलट की गोली मारकर हत्या, जांच में जुटी पुलिस

    April 28, 2026

    मोहरदा पीएम आवास में देरी पर भड़के सरयू राय, जुडको के खिलाफ सीएजी जांच की मांग

    April 28, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    जमशेदपुर में अस्मिता बॉक्सिंग सिटी लीग संपन्न, 98 बालिका खिलाड़ियों ने दिखाया दमखम

    जमीन विवाद में लोको पायलट की गोली मारकर हत्या, जांच में जुटी पुलिस

    मोहरदा पीएम आवास में देरी पर भड़के सरयू राय, जुडको के खिलाफ सीएजी जांच की मांग

    जमशेदपुर में जल संकट पर फूटा गुस्सा: जुगसलाई नगर परिषद का घेराव, समाधान की मांग तेज

    रात में जला ट्रांसफॉर्मर, सुबह समाधान—मानिक मलिक के नेतृत्व में बेड़ाडीपा में लौटी बिजली

    समाहरणालय में जन शिकायत निवारण दिवस, उप विकास आयुक्त ने सुनीं आमजन की समस्याएं

    सिदगोड़ा में पुलिस की बड़ी कार्रवाई, युवक के पास से देशी पिस्टल बरामद

    जमशेदपुर फायरिंग कांड का खुलासा, अवैध हथियार के साथ आरोपी गिरफ्तार

    जमशेदपुर में अवैध शराब के खिलाफ बड़ी कार्रवाई, एक गिरफ्तार, भारी मात्रा में शराब बरामद

    बागबेड़ा कॉलोनी रोड नंबर-3 में बिजली व्यवस्था मजबूत, 500 मीटर नया केबल बिछाया गया

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.