लेखक: देवानंद सिंह
घटती जन्म दर भारत की जनसंख्या को लेकर लंबे समय से यह धारणा रही है कि देश की सबसे बड़ी चुनौती तेजी से बढ़ती आबादी है। संसाधनों पर बढ़ता दबाव, रोजगार की समस्या, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं के लिए अक्सर जनसंख्या वृद्धि को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। लेकिन अब देश एक नए दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। सरकारी सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट-टीएफआर) घटकर 1.9 पर पहुंच गई है। यह पहली बार है जब यह दर रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से नीचे चली गई है। यह बदलाव केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय भविष्य से जुड़ा महत्वपूर्ण संकेत है।
घटती जन्म दर का परिचय
कुल प्रजनन दर का अर्थ है कि एक महिला अपने जीवनकाल में औसतन कितने बच्चों को जन्म देती है। किसी देश की जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए यह दर लगभग 2.1 होनी चाहिए। इससे कम होने का मतलब है कि आने वाले वर्षों में नई पीढ़ी अपने पूर्ववर्तियों की संख्या की भरपाई नहीं कर पाएगी और अंततः जनसंख्या में गिरावट शुरू हो सकती है। भारत में यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है जब दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश घटती जन्म दर और बढ़ती वृद्ध आबादी की समस्या से जूझ रहे हैं।
पहली नजर में यह स्थिति सकारात्मक लग सकती है। कम जनसंख्या वृद्धि का अर्थ है कि संसाधनों पर दबाव कम होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता बेहतर हो सकती है। परिवार छोटे होने से बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक निवेश संभव होगा। महिलाओं की शिक्षा और रोजगार में बढ़ती भागीदारी भी इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारण है। इसलिए इसे सामाजिक प्रगति और जागरूकता का संकेत भी माना जा सकता है।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू कहीं अधिक गंभीर है। दुनिया के कई देशों का अनुभव बताता है कि लगातार घटती जन्म दर अंततः आर्थिक और सामाजिक संकट को जन्म दे सकती है। जापान, दक्षिण कोरिया, इटली और चीन जैसे देशों में युवाओं की संख्या घटने और बुजुर्गों की आबादी बढ़ने से श्रमशक्ति में कमी आई है। उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है और सरकारों पर पेंशन तथा स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ बढ़ा है। यही कारण है कि विशेषज्ञ भारत के संदर्भ में “ओल्ड बिफोर रिच” यानी “अमीर बनने से पहले बूढ़ा हो जाने” की आशंका जता रहे हैं।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी रही है। यही युवा शक्ति देश की अर्थव्यवस्था को गति देती है और वैश्विक स्तर पर भारत को प्रतिस्पर्धी बनाती है। यदि आने वाले वर्षों में युवाओं की संख्या घटने लगती है और बुजुर्गों का अनुपात तेजी से बढ़ता है, तो इसका असर रोजगार, उद्योग, कृषि और सेवा क्षेत्र पर पड़ सकता है। कम कार्यशील आबादी का मतलब होगा कि आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है। साथ ही बुजुर्गों की देखभाल, स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर सरकारी खर्च बढ़ेगा।
हालांकि भारत की स्थिति अभी जापान या चीन जैसी नहीं है। देश के पास अभी भी एक बड़ा युवा वर्ग मौजूद है और आने वाले कुछ दशकों तक जनसांख्यिकीय लाभांश का अवसर बना रहेगा। लेकिन यह अवसर हमेशा नहीं रहेगा। यदि आज शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार सृजन और स्वास्थ्य क्षेत्र में पर्याप्त निवेश नहीं किया गया, तो युवा आबादी का यह लाभ भी हाथ से निकल सकता है। केवल बड़ी आबादी होना विकास की गारंटी नहीं है; उसे उत्पादक और कुशल बनाना भी उतना ही जरूरी है।
नीतिगत स्तर पर सरकार को अब दोहरी रणनीति अपनानी होगी। एक ओर युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे, वहीं दूसरी ओर भविष्य की वृद्ध आबादी के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र विकसित करना होगा। स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, पेंशन व्यवस्था को सुदृढ़ करना और बुजुर्गों के लिए अनुकूल सामाजिक ढांचा तैयार करना समय की मांग है। इसके साथ ही महिलाओं की कार्यभागीदारी बढ़ाने, परिवारों को आर्थिक सुरक्षा देने और संतुलित जनसंख्या नीति पर भी ध्यान देना होगा।
भारत के लिए घटती जन्म दर न तो पूरी तरह चिंता का विषय है और न ही केवल उपलब्धि का संकेत। यह एक ऐसा मोड़ है जो देश को भविष्य के लिए सचेत करता है। यदि इस बदलाव को समझते हुए दूरदर्शी नीतियां बनाई गईं, तो भारत अपनी युवा शक्ति का पूरा लाभ उठाकर विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है। लेकिन यदि इस संकेत को नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले दशकों में देश को उसी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है, जिससे आज कई विकसित देश जूझ रहे हैं। इसलिए यह समय उत्साह और सतर्कता, दोनों के संतुलन का है। जनसंख्या का प्रश्न केवल संख्या का नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य की दिशा तय करने वाला विषय है।
अधिक जानकारी के लिए टोटल फर्टिलिटी रेट की.wikipedia देखें।
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