लेखक: देवानंद सिंह
छात्रों की आवाज को सियासत से आगे सुनने की जरूरत आज सबसे अधिक है।
छात्रों की आवाज: शिक्षा और रोजगार पर बहस
देश में शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती और रोजगार को लेकर युवाओं की चिंता लगातार सार्वजनिक बहस का विषय बनी हुई है। मध्य प्रदेश के इंदौर में राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हुई है। कांग्रेस ने भाजपा और आरएसएस पर शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने तथा संस्थानों पर प्रभाव बढ़ाने के आरोप लगाए हैं। राहुल गांधी ने भी छात्रों के सवाल पूछने के अधिकार और व्यवस्था में जवाबदेही की आवश्यकता पर जोर दिया है।
कांग्रेस के इन आरोपों को राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। दूसरी ओर, भाजपा और आरएसएस के दृष्टिकोण को भी उसी गंभीरता से सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी संस्था या राजनीतिक संगठन पर लगाए गए आरोपों का मूल्यांकन तथ्यों, नीतियों और ठोस प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छात्र और युवा हैं। उनके लिए यह सवाल अधिक मायने रखता है कि परीक्षा व्यवस्था कितनी पारदर्शी है, भर्ती प्रक्रिया कितनी समयबद्ध है, शिक्षा की गुणवत्ता कैसी है और पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार के अवसर कितने उपलब्ध हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता या पेपर लीक की कोई भी घटना लाखों विद्यार्थियों की मेहनत और भरोसे को प्रभावित करती है। इसी तरह भर्ती प्रक्रिया में लंबे समय तक रिक्तियां बने रहना, परीक्षा परिणाम में देरी या न्यायिक विवादों के कारण नियुक्तियां अटकना युवाओं में असुरक्षा पैदा करता है। इसलिए सरकारों और संबंधित संस्थानों की पहली जिम्मेदारी ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें विद्यार्थी अपनी मेहनत के परिणाम को लेकर आश्वस्त रह सकें। शिक्षा मंत्रालय को इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।
सवाल पूछना लोकतंत्र की ताकत है
राहुल गांधी ने कहा है कि व्यवस्था छात्रों से सवाल पूछे जाने से डरती है और वह सवाल करने वाले विद्यार्थियों के बजाय ‘अंधभक्त’ चाहती है। यह एक राजनीतिक आरोप और राजनीतिक भाषा है, लेकिन इसके पीछे उठाया गया मूल प्रश्न महत्वपूर्ण है—क्या विद्यार्थियों को अपनी समस्याओं और नीतियों पर सवाल पूछने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल पूछना विरोध नहीं, बल्कि जवाबदेही का हिस्सा है। वहीं, सवालों का जवाब तथ्यों और नीतिगत स्पष्टीकरण के साथ देना सत्ता और संस्थानों की जिम्मेदारी है। असहमति को राजनीतिक विरोध मानकर खारिज करना भी उचित नहीं और हर सरकारी नीति को बिना तथ्य के गलत ठहराना भी स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद नहीं है।
आरएसएस पर बहस भी तथ्य आधारित हो
आरएसएस को लेकर राजनीतिक दलों के बीच लंबे समय से अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं। कांग्रेस उसके प्रभाव और भाजपा के साथ उसके संबंधों को लेकर सवाल उठाती रही है, जबकि आरएसएस स्वयं सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्र निर्माण से जुड़े अपने दृष्टिकोण को सामने रखता है।
ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पर आरएसएस की भूमिका को लेकर बहस हो तो वह भी ठोस नीतियों, संस्थागत भूमिका और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। किसी संगठन को लेकर व्यापक निष्कर्ष केवल राजनीतिक मंच से लगाए गए आरोपों के आधार पर निकालना उचित नहीं होगा।
सत्ता और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी
सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी सबसे अधिक इसलिए है क्योंकि नीतियां, प्रशासन और शिक्षा से जुड़े संस्थागत फैसले सरकार के हाथ में होते हैं। उसे छात्रों की शिकायतों का जवाब, परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और भर्ती प्रक्रिया में समयबद्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।
विपक्ष की भूमिका भी केवल सरकार पर आरोप लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे छात्रों की समस्याओं को सामने लाने के साथ-साथ वैकल्पिक नीतियों और व्यावहारिक समाधान पर भी चर्चा करनी चाहिए। राजनीति में शिक्षा ऐसा क्षेत्र होना चाहिए, जहां दलगत मतभेदों के बावजूद न्यूनतम साझा सहमति बन सके।
छात्र किसी दल के नहीं, देश के भविष्य हैं
आज का छात्र केवल नौकरी की तलाश में रहने वाला युवा नहीं है। वह देश की अर्थव्यवस्था, तकनीक, प्रशासन, उद्योग और सामाजिक जीवन का आने वाला आधार है। इसलिए शिक्षा को राजनीतिक संघर्ष का मैदान बनाने के बजाय ऐसी व्यवस्था का केंद्र बनाना होगा, जहां प्रतिभा, मेहनत और अवसर के बीच भरोसेमंद संबंध हो।
सत्ता से सवाल करना छात्रों का अधिकार है। विपक्ष का उन सवालों को उठाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। आरएसएस जैसे सामाजिक संगठनों का अपना दृष्टिकोण रखना भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा है। लेकिन इन सभी के ऊपर छात्रों का भविष्य है।
देश को ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जहां विद्यार्थी सवाल पूछने से न डरें, सरकार जवाब देने से न बचे, विपक्ष समाधान देने से पीछे न हटे और किसी भी सामाजिक या राजनीतिक संगठन का प्रभाव शिक्षा की गुणवत्ता और अवसरों की निष्पक्षता पर हावी न हो।
यही लोकतंत्र में शिक्षा की वास्तविक कसौटी होनी चाहिए सवाल की स्वतंत्रता, अवसर की समानता और व्यवस्था की जवाबदेही।

