मुंबई लोकल ट्रेन बम धमाकों का फैसला और उठते सवाल -ललित गर्ग- 11 जुलाई 2006 को मुंबई की भीड़भरी लोकल…
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दुनिया की लाखों जिन्दगियां में जहर घोलता अकेलापन -ललित गर्ग- ‘हर छठा व्यक्ति अकेला है’-यह निष्कर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ)…
(जब शिक्षा डर बन जाए) *डिग्रियों की दौड़ में दम तोड़ते सपने* _संभावनाओं की कब्रगाह बनते संस्थान_ *संस्थाएं डिग्रियां नहीं,…
बड़ी जीत है द रेजिस्टेंट फ्रंट का आतंकी संगठन घोषित होना -ललित गर्ग- पहलगाम में जब आतंकी हमले में निर्दोषों…
“स्क्रॉल संस्कृति और अंधविश्वास: तकनीक के युग में मानसिक गुलामी” – डॉ सत्यवान सौरभ आज का युग तकनीक और सूचना…
“डेटा की दलाली और ऋण की रेलमपेल : निजी बैंकों का नया लोकतंत्र” – प्रियंका सौरभ “नमस्ते महोदय/महोदया, क्या आप…
भारतीय नर्स निमिषा प्रिया मामले में उम्मीद की लौ बुझने न दे भारत देवानंद सिंह भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की…
अख़बारों में साहित्य की हत्या और शब्दकर्मियों की बेइज़्ज़ती आज के अधिकांश अख़बारों से साहित्यिक पन्ने या तो पूरी तरह…
स्कूलों को उड़ाने की धमकियांः सुरक्षा पर मंडराता खतरा -ललित गर्ग- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के करीब 45 स्कूलों में बम…
क्या बिहार में सुशासन अब जंगलराज में बदल रहा है? -ललित गर्ग- बिहार में एक बार फिर कानून-व्यवस्था को लेकर…
