लेखक: देवानंद सिंह
सरकार की योजनाओं का उद्देश्य केवल बजट में राशि आवंटित करना या कागजों पर लक्ष्य तय करना नहीं है। असली कसौटी यह है कि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा और सरकारी धन का उपयोग कितनी पारदर्शिता एवं जवाबदेही के साथ हुआ। झारखंड विधानसभा में रखी गयी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट इसी बुनियादी सवाल को सामने लाती है।
सीएजी की रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
रिपोर्ट में परिवहन, ग्रामीण विकास, पेयजल एवं स्वच्छता, उत्पाद तथा वाणिज्य कर विभाग से जुड़े कई मामलों में प्रक्रियागत और निगरानी संबंधी कमियां सामने आयी हैं। आंकड़े गंभीर हैं, लेकिन इन आंकड़ों को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बना देना समस्या का समाधान नहीं होगा। सीएजी की रिपोर्ट का महत्व इस बात में है कि वह व्यवस्था की कमजोर कड़ियों की ओर संकेत करती है और सुधार का अवसर देती है।
मनरेगा में 50 लाख से अधिक कार्यों का अधूरा रहना और मजदूरी भुगतान की बड़ी राशि लंबित होना चिंता का विषय है। मनरेगा ग्रामीण रोजगार के साथ-साथ स्थानीय परिसंपत्तियों के निर्माण का महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि काम समय पर पूरे नहीं होते और मजदूरी भुगतान में देरी होती है तो इसका सीधा असर ग्रामीण परिवारों पर पड़ता है। इसी तरह जल जीवन मिशन में बड़ी संख्या में ग्रामीण घरों तक नल का पानी नहीं पहुंच पाना बताता है कि लक्ष्य तय करने के साथ जमीनी क्रियान्वयन पर लगातार निगरानी की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री आवास योजना में पात्र परिवारों का लक्ष्य से बाहर रह जाना और अपात्र लोगों का सूची में शामिल होना भी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है। किसी भी कल्याणकारी योजना में सबसे महत्वपूर्ण है कि सही व्यक्ति तक सही समय पर लाभ पहुंचे। पात्र व्यक्ति वंचित हो और अपात्र व्यक्ति लाभ की सूची में आ जाये, तो इससे न केवल योजना की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, बल्कि जरूरतमंदों के अधिकार पर भी असर पड़ता है।
वित्तीय प्रबंधन से जुड़े आंकड़े भी विशेष ध्यान मांगते हैं। 1.60 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि से संबंधित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों का लंबित रहना महज एक प्रशासनिक आंकड़ा नहीं है। सरकारी धन जनता के कर और सार्वजनिक संसाधनों से आता है। इसलिए प्रत्येक खर्च का हिसाब समय पर और स्पष्ट रूप से उपलब्ध होना जरूरी है। उपयोगिता प्रमाण-पत्रों के लंबित रहने के कारणों की विभागवार समीक्षा और जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।
सरकार की जवाबदेही और आगे का रास्ता
परिवहन विभाग में नाबालिगों को गियर वाली बाइक का लाइसेंस जारी होने का मामला हो या जीएसटी में करोड़ों रुपये की विसंगतियां, ये घटनाएं तकनीक और नियम होने के बावजूद निगरानी तंत्र की कमजोरी की ओर संकेत करती हैं। तकनीकी व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है, जब उसके साथ मानवीय निगरानी, नियमित ऑडिट और जिम्मेदारी की स्पष्ट व्यवस्था भी हो।
सीएजी की रिपोर्ट पर सरकार को रक्षात्मक होने के बजाय इसे सुधार के दस्तावेज के रूप में लेना चाहिए। जहां गलती हुई है, वहां कारण सामने आने चाहिए; जहां लापरवाही हुई है, वहां जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और जहां व्यवस्था में तकनीकी कमी है, वहां उसे तत्काल दुरुस्त किया जाना चाहिए।
विपक्ष के लिए भी यह रिपोर्ट सरकार पर सवाल उठाने का संवैधानिक आधार है, लेकिन उससे आगे बढ़कर समाधान की दिशा में चर्चा जरूरी है। जनता को आरोपों की राजनीति से अधिक परिणाम चाहिए।
झारखंड जैसे विकासशील राज्य में सीमित संसाधनों का अधिकतम और पारदर्शी उपयोग बेहद महत्वपूर्ण है। सीएजी ने आईना दिखाया है। अब जरूरत इस बात की है कि उस आईने में दिख रही कमियों को नजरअंदाज न किया जाए। सरकारी योजनाओं की सफलता आंकड़ों में नहीं, बल्कि जनता के जीवन में दिखाई देने वाले बदलाव में तय होनी चाहिए।

