पुस्तक समीक्षा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और गिजुभाई बधेका के शैक्षिक विचार: आनंदघर की ओर लौटते कदम
दुर्गेश्वर राय, गोरखपुर
वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति की संरचनाओं और एक सदी पूर्व के गिजुभाई के उस मौलिक भारतीय चिंतन के बीच एक गहरा अंतर्संबंध है, जो बालक को देव मानकर उसकी अंतर्निहित शक्तियों और अधिकारों के सम्मान की पुरजोर वकालत करता है। डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया द्वारा रचित कृति राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और गिजुभाई बधेका के शैक्षिक विचार का तुलनात्मक अध्ययन भारतीय शिक्षा की आत्मा को पुनः खोजने का एक गम्भीर और अत्यंत संवेदनशील प्रयास है । यह पुस्तक आधुनिक नीतिगत सुधारों और एक सदी पूर्व के कालजयी शैक्षिक दर्शन के बीच एक स्नेहिल सम्बन्ध स्थापित करती है जो वर्तमान शिक्षा पद्धति को मानवीय संवेदनाओं से सींचने का सामर्थ्य रखती है । लेखक ने गिजुभाई की बाल मीमांसा को एनईपी 2020 के ढाँचे में पिरोकर यह सिद्ध किया है कि भविष्य की श्रेष्ठ शिक्षा की जड़ें हमारे अपने स्वदेशी चिंतन और ऐतिहासिक प्रयोगों में ही निहित हैं। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सघनता और वह सूक्ष्म दृष्टि है जिसके माध्यम से डॉ. सेठिया ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020, शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा- 2023 के प्रावधानों का गिजुभाई के विचारों के साथ बिन्दुवार मिलान किया है।
पुस्तक का आरम्भ गिजुभाई के उस वैश्विक और निस्वार्थ प्रेम से होता है जहाँ वे बच्चों के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट करते हुए कहते हैं कि जब तक बालक घर में मार और स्कूल में गालियाँ खाएंगे, उन्हें चैन नहीं पड़ेगा। लेखक ने इस बेचैनी को पूरी पुस्तक के वैचारिक आधार के रूप में स्थापित किया है। पुस्तक की भौतिक बनावट और मुद्रण गुणवत्ता पर दृष्टि डालें तो शैक्षिक संवाद मंच के प्रकाशन में क्विक ऑफसेट, नई दिल्ली द्वारा की गई इसकी छपाई अत्यंत प्रभावशाली और उच्च स्तरीय है। पन्नों का नेचुरल येलो शेड आँखों को एक सुकून भरा अनुभव प्रदान करने के साथ ही लंबी अवधि तक पढ़ने पर भी पाठक को थकान महसूस नहीं होने देता। द पर्पल पेपर स्टूडियो द्वारा तैयार किया गया इसका आवरण डिजाइन जिसमे जंजीरों को टूटते हुए दिखाया गया है, आकर्षक और अर्थपूर्ण है, जो पहली नजर में ही पाठक को अपनी ओर खींचता है। शिक्षण विधियों का जो विस्तार इस कृति में दिया गया है, वह गिजुभाई की उन 22 पद्धतियों का पुनरुद्धार है जो आज के मल्टीपल इंटेलिजेंस और कंस्ट्रक्टिविज्म के दौर में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई हैं। डॉ. सेठिया ने बड़ी कुशलता से यह स्पष्ट किया है कि एनईपी 2020 का 5+3+3+4 मॉडल और मातृभाषा में शिक्षा का आग्रह दरअसल गिजुभाई के उसी स्वप्न का विस्तार है जिसमें वे बालक को उसकी प्रकृति और परिवेश के साथ सहज रूप से विकसित होते देखना चाहते थे।
कृति में सम्मिलित विभिन्न विद्वानों के अभिमत इसकी गरिमा को और बढ़ाते हैं। कथाकार और शिक्षाविद् दिनेश कर्नाटक का यह कहना कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली लोगों की आमदनी के हिसाब से बँटी हुई है और गिजुभाई के सपनों से भटक गई है, एक कड़वा सत्य है जिसका यह पुस्तक समाधान प्रस्तुत करती है। सुप्रसिद्ध ब्लॉगर और शिक्षाविद् प्रवीण त्रिवेदी ने इसे नीति से अनुभव और संवाद की ओर बढ़ने वाली उपलब्धि माना है। वरिष्ठ लेखक, शिक्षाविद् और बाल मनोभावों के पारखी प्रमोद दीक्षित मलय ने इस पुस्तक के परिप्रेक्ष्य में विद्यालय को आनंदघर बनाने की जो सामूहिक चेतना की बात की है, वह इस पूरी कृति का नैतिक निचोड़ बनकर उभरती है।
लेखक डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया के स्वयं के जीवन और इस पुस्तक की विषय-वस्तु के बीच एक अनूठी और गहरी साम्यता दिखाई देती है। परिशिष्ट-दो में दी गई उनकी शैक्षिक यात्रा को पढ़कर यह अनुभव होता है कि वे गिजुभाई के विचारों को केवल पढ़ते नहीं हैं, बल्कि उन्हें जीते हैं। आदिवासी अंचल सोण्डवा के दूरस्थ गाँवों में वनवासियों के साथ उनका अनुभव और फिर डाइट मंदसौर में हजारों शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि उनके शब्द धरातल की मिट्टी से उपजे हैं। गिजुभाई के साहित्य पर उनकी पीएचडी और मूँछों वाली माँ के प्रति उनका समर्पण इस पुस्तक को एक प्रामाणिक शोध ग्रन्थ के साथ-साथ एक भावपूर्ण संस्मरण की श्रेणी में भी खड़ा कर देता है। समीक्षात्मक दृष्टि से यदि एक पक्ष पर विचार किया जाए, तो व्यावहारिक क्रियान्वयन की धरातलीय चुनौतियों पर थोड़ा और अधिक विस्तार अपेक्षित था। सरकारी तंत्र और व्यवस्था की जटिलताओं के बीच इन आदर्शवादी विचारों को पूरी तरह उतारने के संघर्षों का उल्लेख यदि और मुखरता से होता, तो यह कृति और भी अधिक यथार्थपरक हो सकती थी। हालांकि, गिजुभाई के सिद्धांतों की प्रासंगिकता को लेखक ने जिस तरह विकसित भारत 2047 के विजन से जोड़ा है, वह अत्यंत सराहनीय है।
कहानी कथन, अनुभवजन्य शिक्षा और प्रकृति अवलोकन जैसे सूत्र आज की डिजिटल पीढ़ी के लिए भी उतने ही प्रभावी हैं। यह पुस्तक समाज के विभिन्न वर्गों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षकों और शिक्षा प्रशिक्षकों के लिए यह एक तानाशाह की भूमिका से हटकर बाल मित्र बनने की प्रेरणा है, जो उन्हें कक्षा को आनंदघर बनाने के व्यावहारिक सूत्र प्रदान करती है। अभिभावकों के लिए यह एक नई दृष्टि प्रदान करती है कि घर ही बालक की पहली और सबसे शक्तिशाली शाला है, जहाँ उन्हें बच्चों पर अपनी इच्छाएँ थोपने के बजाय उनकी जिज्ञासा को समझना चाहिए। नीति निर्माताओं और शिक्षा अधिकारियों के लिए यह एक मार्गदर्शिका है कि कैसे नीतियों को मानवीय संवेदना और बाल-मनोविज्ञान से जोड़ा जाए। शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए यह गिजुभाई के साहित्य और भारतीय शिक्षा पद्धति पर आधारित एक अमूल्य संदर्भ ग्रंथ है। डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया की यह कृति शिक्षा को नीति के शुष्क दस्तावेजों से बाहर निकालकर जीवन के उमंग भरे धरातल पर ले जाती है। यदि हम वास्तव में एक ऐसी पीढ़ी चाहते हैं जो स्वावलंबी, निर्भय और सृजनशील हो, तो हमें इस पुस्तक में दिए गए बाल दर्शन को अपनी कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाना ही होगा।
पुस्तक : राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और गिजुभाई के शैक्षिक विचार
लेखक : डॉ. प्रमोद कुमार सेठिया
विधा : शोध आलेख
पृष्ठ : 128 मूल्य : रू० 650
दुर्गेश्वर राय
अरण्य विहार, गोरखपुर
(लेखक समीक्षक, शिक्षक और शैक्षिक संवाद मंच के संयोजक हैं)
