सावधान! यह ‘सलाम’ आपको नहीं, आपके समय को है।
राष्ट्र संवाद संवाददाता
मुंबई (इंद्र यादव) आज के इस दौर में जहाँ रिश्तों की गहराई कम और दिखावे का शोर ज़्यादा है, वहाँ एक बुनियादी सच्चाई कहीं खो गई है। वह कड़वा सच यह है कि सम्मान व्यक्ति का नहीं, बल्कि उसकी स्थिति और समय का होता है। लेकिन विडंबना देखिए, इंसान इस अस्थायी सम्मान को अपनी स्थायी उपलब्धि मानकर अहंकार के उस सातवें आसमान पर चढ़ जाता है, जहाँ से गिरने की आवाज़ भी उसे सुनाई नहीं देती।
कुर्सी का मोह और ‘सलाम’ की हकीकत
समाज में हम अक्सर देखते हैं कि जब कोई व्यक्ति सत्ता के गलियारों में होता है या किसी बड़े कॉर्पोरेट पद पर आसीन होता है, तो उसके आगे-पीछे घूमने वालों की कतार लगी रहती है। लोग उसकी हर बात पर वाह-वाही करते हैं, चाहे वह तर्कहीन ही क्यों न हो।
भ्रम का जन्म: व्यक्ति को लगने लगता है कि यह भीड़ उसके ‘व्यक्तित्व’ की कायल है।
हकीकत का आईना: असल में वह भीड़ उस ‘पॉवर’ को सलाम कर रही होती है जिससे उनके स्वार्थ सिद्ध होते हैं। जिस दिन वह पद जाता है, वही ‘शुभचिंतक’ फोन उठाना भी बंद कर देते हैं। यह इंसान की नहीं, बल्कि उसकी स्थिति की हार है।
समय की चाल: आज ‘राजा’ तो कल ‘रंक’
समय एक ऐसा चक्र है जो कभी थमता नहीं। आज सूर्य आपके पक्ष में है, तो दुनिया आपकी चमक से चकाचौंध है। लेकिन समय बदलते ही परिदृश्य बदल जाता है।
“जब जेब में पैसा और हाथ में ताकत होती है, तो इंसान भूल जाता है कि वह कौन है। लेकिन जब जेब खाली और समय विपरीत होता है, तो पूरी दुनिया भूल जाती है कि वह कौन है।”
इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ बड़े-बड़े सूरमाओं का अहंकार वक्त की एक ही करवट ने मिट्टी में मिला दिया। जो लोग ‘समय’ के इस खेल को नहीं समझते, वे ही सबसे ज़्यादा मानसिक तनाव और अवसाद का शिकार होते हैं जब उनका ‘बुरा वक्त’ शुरू होता है।
‘स्व’ और ‘स्थिति’ के बीच का धुंधला अंतर
इंसान की सबसे बड़ी गलती यह है कि वह अपनी व्यावसायिक सफलता को अपना निजी गुण मान लेता है। वह भूल जाता है कि:
उसकी इज्जत उसके काम की वजह से है।
उसका रसूख उसकी आर्थिक स्थिति की वजह से है।
उसका वर्चस्व उसकी उम्र और ताकत की वजह से है।
जब तक ये बाहरी चीजें साथ हैं, सम्मान का ढोंग जारी रहता है। जैसे ही ये कारक हटते हैं, इंसान अपनी असली नग्न सच्चाई के साथ अकेला रह जाता है।
आत्ममंथन की जरूरत
आज के संपादकीय का सार यह है कि हमें ‘किराए के सम्मान’ और ‘अर्जित सम्मान’ के बीच का अंतर समझना होगा। यदि आपका सम्मान आपकी गाड़ी, बंगले या पद की वजह से है, तो समझ लीजिए कि आप एक रेत के महल में रह रहे हैं।
सलाह:इंसान को अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहिए। विनम्रता वह एकमात्र ढाल है जो समय बदलने पर भी आपके चरित्र को बचाए रखती है। यदि आप अपनी सफलता का श्रेय खुद को देने के बजाय ‘अच्छे वक्त’ और ‘अवसर’ को देंगे, तो अहंकार आप पर हावी नहीं हो पाएगा।
अंतिम शब्द
यह दुनिया एक रंगमंच है जहाँ हर किसी को एक निश्चित समय के लिए ‘नायक’ का रोल मिलता है। मंच से उतरने के बाद तालियां बजती रहेंगी या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि आपने मंच पर रहते हुए इंसानियत को कितना सम्मान दिया। याद रखिये, समय का दिया हुआ सम्मान समय के साथ ही वापस लौट जाता है; केवल आपका व्यवहार ही वह निवेश है जिसका ब्याज आपको ताउम्र मिलता रहता है।
बाकी, मुगालते पालने के लिए पूरी उम्र पड़ी है, पर हकीकत यही है कि आप ‘निमित्त’ मात्र हैं, ‘कर्ता’ नहीं।

