हाफ एनकाउंटर और फुल मटन पार्टी
बिहार की राजनीति में सियासी स्वाद और सुशासन पर संग्राम
राष्ट्र संवाद नजरिया
बिहार की सियासत इन दिनों दो ध्रुवों के बीच झूल रही है—एक ओर आरा में हुए ‘हाफ एनकाउंटर’ की गूंज है, तो दूसरी ओर विधानसभा के सेंट्रल हॉल में ‘फुल मटन पार्टी’ की महक। सावन के पवित्र माह में सत्ता पक्ष द्वारा आयोजित मटन भोज को लेकर विपक्ष ने जमकर निशाना साधा, जबकि चंदन मिश्रा हत्याकांड में हुए कथित आधे-अधूरे पुलिस एनकाउंटर पर सत्ता पक्ष ही सवालों के घेरे में आ गया है।

तेजस्वी यादव द्वारा मटन भोज पर दी गई प्रतिक्रिया को सत्ता पक्ष ने “मटन युद्ध” करार देते हुए विशुद्ध राजनीतिक हमला बताया। सम्राट चौधरी ने यहां तक कह दिया कि तेजस्वी का एजेंडा बांग्लादेशी वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमता है और वह बेवजह सत्तापक्ष की हर पहल को सांप्रदायिक रंग देने में लगे रहते हैं।
इधर, आरा में पुलिस की कार्रवाई को लेकर ‘हाफ एनकाउंटर’ की संज्ञा दी जा रही है। विपक्ष का आरोप है कि कानून व्यवस्था का हाल बेहाल है और पुलिस केवल दिखावे के लिए कार्रवाई कर रही है। कई सत्तापक्ष के विधायक भी अब शराबबंदी की विफलता की जगह ब्राउन शुगर जैसे नशे पर नियंत्रण की मांग करने लगे हैं।

बिहार में चुनावी वर्ष आते ही एक बार फिर पुरानी सियासी पिच पर नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ और लालू यादव के ‘जंगल राज’ की पुरानी बहस लौट आई है। यह तय है कि जनता से जुड़े मुद्दों की बजाय राजनीतिक बयानबाजी, भोज और बंदूक की राजनीति ही आने वाले दिनों में चुनावी माहौल को गर्माने वाली है।

सवाल यह है कि क्या बिहार की राजनीति कभी नीतिगत मुद्दों पर केंद्रित हो पाएगी, या फिर “हाफ एनकाउंटर बनाम फुल मटन” जैसी चर्चाएं ही जनहित की दिशा तय करती रहेंगी?

